भारतीय नौसेना में शामिल हुआ INS समर्थक, 887 करोड़ रुपये में बना स्वदेशी जहाज कई मिशनों में आएगा काम

भारतीय नौसेना ने शुक्रवार को कर्नाटक के कारवार स्थित नौसेना बेस पर INS समर्थक को अपने बेड़े में शामिल किया। यह स्वदेशी तकनीक से बना एक बहुउद्देशीय जहाज है, जो समुद्र में निगरानी, गश्त, सैन्य परीक्षण और आपदा राहत

भारतीय नौसेना में शामिल हुआ INS समर्थक

भारतीय नौसेना में शामिल हुआ INS समर्थक

भारतीय नौसेना ने शुक्रवार को कर्नाटक के कारवार स्थित नौसेना बेस पर INS समर्थक को अपने बेड़े में शामिल किया। यह स्वदेशी तकनीक से बना एक बहुउद्देशीय जहाज है, जो समुद्र में निगरानी, गश्त, सैन्य परीक्षण और आपदा राहत जैसे कई काम कर सकता है। इसे मेक इन इंडिया पहल के तहत लार्सन एंड टुब्रो (L&T) ने बनाया है।

INS समर्थक नौसेना में शामिल किए जाने वाले चार बहुउद्देशीय जहाजों में पहला है। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, यह जहाज कई तरह के रणनीतिक और सैन्य अभियानों में उपयोगी साबित होगा। इसके प्रतीक चिह्न में समुद्र से निकलता हुआ हाथी दिखाया गया है। इसका आदर्श वाक्य विजयार्थमा एकनिष्ठता है, जिसका अर्थ है- विजय ही हमारा एकमात्र लक्ष्य है।

कई तरह के मिशनों में काम करेगा INS समर्थक

INS समर्थक को मुख्य रूप से समुद्री निगरानी और गश्त के लिए तैयार किया गया है। हालांकि, इसकी जिम्मेदारियां केवल इन कामों तक सीमित नहीं हैं। यह कम तीव्रता वाले समुद्री अभियानों में भी हिस्सा ले सकता है।

इस जहाज की प्रमुख क्षमताएं इस प्रकार हैं:

इसमें स्वदेशी सेंसर, हथियार और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम लगाए गए हैं। इन्हें कठिन समुद्री परिस्थितियों में काम करने के हिसाब से तैयार किया गया है।

INS समर्थक का वजन क्षमता के लिहाज से 3,750 टन से अधिक है और इसकी लंबाई लगभग 107 मीटर है। यह अधिकतम 15 नॉट की रफ्तार से चल सकता है। जहाज में 75 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया गया है। इसमें डायनेमिक पोजिशनिंग सिस्टम भी लगा है, जो समुद्र में इसकी स्थिति को सटीक बनाए रखने में मदद करता है।

इस जहाज को बनाने के लिए मार्च 2022 में 887 करोड़ रुपये का अनुबंध किया गया था।

युद्धपोतों पर कम होगा अतिरिक्त काम का बोझ

INS समर्थक जैसे बहुउद्देशीय जहाज नौसेना के लिए इसलिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ये कई ऐसे काम संभाल सकते हैं, जिनके लिए पहले बड़े युद्धपोतों का इस्तेमाल करना पड़ता था।

युद्धपोतों को समुद्री परीक्षण, लक्ष्य खींचने, गश्त और आपदा राहत जैसे कामों में लगाने से उनकी मुख्य सैन्य जिम्मेदारियों पर असर पड़ सकता है। अब इन कामों को INS समर्थक जैसे विशेष जहाज संभाल सकते हैं। इससे विध्वंसक जहाजों और फ्रिगेट जैसे युद्धपोतों को महत्वपूर्ण सैन्य अभियानों के लिए उपलब्ध रखा जा सकेगा।

इसके अलावा, नए हथियारों और सेंसरों के परीक्षण में भी इस जहाज की भूमिका होगी। इससे नई तकनीक को विकसित करने और नौसेना में शामिल करने की प्रक्रिया में मदद मिल सकती है।

तेजी से बढ़ रहा है भारतीय नौसेना का बेड़ा

भारतीय नौसेना के पास अभी लगभग 150 जहाज और पनडुब्बियां हैं। इनमें करीब 135 अग्रिम पंक्ति के लड़ाकू जहाज बताए जाते हैं। इसके अलावा, भारतीय शिपयार्ड में लगभग 50 अन्य जहाजों का निर्माण चल रहा है।

पिछले कुछ वर्षों में नौसेना में स्वदेशी जहाजों को शामिल करने की गति बढ़ी है। नौसेना प्रमुख के अनुसार, अब लगभग हर 40 दिन में एक स्वदेशी युद्धपोत या पनडुब्बी नौसेना में शामिल की जा रही है। वर्ष 2025 में 12 युद्धपोत और एक पनडुब्बी शामिल की गई थी।

नौसेना ने वर्ष 2026 में 19 युद्धपोत शामिल करने की योजना बनाई थी। जुलाई में स्टील्थ फ्रिगेट INS महेंद्रगिरि और पनडुब्बी रोधी युद्धक जहाज INS मालवन को बेड़े में शामिल किया गया था। लगभग छह सप्ताह के दौरान पांच स्वदेशी जहाज नौसेना का हिस्सा बने थे।

इस महीने INS समर्थक के साथ पनडुब्बी रोधी जहाज INS मंगरोल को भी शामिल किया गया है। नौसेना इस साल 18 जहाजों को शामिल करने की दिशा में काम कर रही है।

इसके अलावा, रक्षा अधिग्रहण परिषद ने 2.35 लाख करोड़ रुपये की लागत से 74 और युद्धपोतों की खरीद को मंजूरी दी है। छह पनडुब्बियों से जुड़ी प्रोजेक्ट 75(I) योजना भी महत्वपूर्ण है।

चीन की नौसेना से मुकाबले में भारत कहां?

भारतीय नौसेना के विस्तार के बावजूद चीन की नौसेना के मुकाबले अभी बड़ा अंतर है। अमेरिकी रक्षा विभाग के अनुमानों के अनुसार, चीन की नौसेना के पास 370 से अधिक युद्धपोत हैं। इनमें विमानवाहक पोत, विध्वंसक युद्धपोत और पनडुब्बियां शामिल हैं।

भारत के करीब 150 जहाजों में छोटे जहाज और सहायता देने वाले पोत भी शामिल हैं। इसलिए केवल कुल जहाजों की संख्या की तुलना करने से दोनों देशों की लड़ाकू क्षमता का सही अंदाजा नहीं मिलता।

जहाज बनाने की गति में भी चीन आगे रहा है। पहले के एक विश्लेषण के अनुसार, चीन हर साल 14 से 22 बड़े युद्धपोत बनाता था, जबकि भारत में यह संख्या एक या दो थी। भारत ने हाल के वर्षों में निर्माण की गति बढ़ाई है, लेकिन चीन अब भी बड़े विध्वंसक जहाज, उभयचर युद्धपोत और पनडुब्बियां तेजी से बना रहा है।

चीन ने नवंबर 2025 में अपना तीसरा विमानवाहक पोत फुजियान नौसेना में शामिल किया था। भारत के पास दो विमानवाहक पोत हैं- INS विक्रमादित्य और INS विक्रांत।

अनुमानों के अनुसार, चीन के पास वर्ष 2030 तक 435 युद्धपोत हो सकते हैं। भारत का लक्ष्य 2035 तक अपने बेड़े को लगभग 175 प्लेटफॉर्म तक पहुंचाना है। नौसेना की बाद की योजनाओं में 2030 के दशक के मध्य तक 200 से अधिक जहाजों का लक्ष्य भी सामने आया है।

हिंद महासागर में भारत की भौगोलिक स्थिति मजबूत

चीन की तुलना में जहाजों की संख्या कम होने के बावजूद भारत को अपनी भौगोलिक स्थिति का फायदा मिलता है। भारत हिंद महासागर के बीचोंबीच स्थित है और यहां से समुद्री गतिविधियों पर नजर रखना आसान होता है।

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह मलक्का जलडमरूमध्य के पास स्थित हैं। इस समुद्री रास्ते से चीन के ऊर्जा व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है। ऐसे में भारत की नौसेना इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

दूसरी ओर, चीन हिंद महासागर में अपनी मौजूदगी बढ़ाने के लिए दूसरे देशों के बंदरगाहों तक पहुंच बनाने और शोध जहाजों तथा पनडुब्बियों की गतिविधियां बढ़ाने पर काम कर रहा है।

पनडुब्बियों और बड़े युद्धपोतों में अभी चुनौती

भारतीय नौसेना के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक पानी के नीचे युद्ध करने की क्षमता को मजबूत करना है। भारत की प्रोजेक्ट 75(I) पनडुब्बियों का इंतजार अभी बाकी है। वहीं, पाकिस्तान भी चीन में बने आधुनिक हमला करने वाले पनडुब्बी बेड़े को मजबूत कर रहा है।

बड़े युद्धपोतों और सैनिकों तथा सैन्य उपकरणों को समुद्र के रास्ते उतारने वाले जहाजों के निर्माण में भी चीन भारत से आगे है। चीन का जहाज निर्माण उद्योग दुनिया के सबसे बड़े उद्योगों में शामिल है। भारत को अपनी उत्पादन क्षमता और निर्माण की गति बढ़ाने के लिए लगातार काम करना होगा।

हिंद महासागर में मजबूत पकड़ बनाने की तैयारी

भारतीय नौसेना का मुख्य उद्देश्य चीन के हर जहाज की बराबरी करना नहीं, बल्कि हिंद महासागर में भारत की समुद्री सुरक्षा और नियंत्रण क्षमता को मजबूत करना है।

INS समर्थक इस दिशा में उपयोगी साबित हो सकता है। यह निगरानी, परीक्षण, राहत और अन्य सहायक कार्यों को संभालकर बड़े युद्धपोतों को महत्वपूर्ण अभियानों के लिए उपलब्ध रखने में मदद करेगा।

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नौसेना हर 40 दिन में एक स्वदेशी युद्धपोत या पनडुब्बी शामिल करने की गति को कितने समय तक बनाए रख पाती है। खासकर बड़े युद्धपोतों और पनडुब्बियों के निर्माण में तेजी आने से आने वाले वर्षों में भारत और चीन की नौसैनिक क्षमताओं के बीच का अंतर कितना कम होता है, यह अहम रहेगा।

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