राष्ट्र सेविका समिति की 90 वर्षों की गौरवपूर्ण यात्रा नारी शक्ति, व्यक्तित्व निर्माण, संस्कार, सेवा, सामाजिक जागरण और राष्ट्र के प्रति समर्पण की प्रेरणादायी गाथा है। यह केवल एक संगठन के विस्तार की कहानी नहीं, बल्कि महिलाओं की क्षमताओं को पहचानने, उनमें आत्मविश्वास विकसित करने और उन्हें समाज तथा राष्ट्र के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित करने की यात्रा है।
‘प्रभाव’ और ‘परिवर्तन’ एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। किसी अच्छे विचार, प्रेरक व्यक्तित्व अथवा सकारात्मक वातावरण का प्रभाव जब व्यक्ति के विचारों और व्यवहार पर पड़ता है, तो परिवर्तन की प्रक्रिया प्रारंभ होती है। व्यक्ति में आया सकारात्मक परिवर्तन परिवार को प्रभावित करता है, संस्कारित परिवार समाज को दिशा देता है और जागरूक समाज राष्ट्र को सशक्त बनाता है। राष्ट्र सेविका समिति की 90 वर्षों की यात्रा इसी विचार को साकार करने का प्रयास है।
स्थापना एवं मौसीजी का दूरदर्शी नेतृत्व
राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना 25 अक्टूबर 1936 को महाराष्ट्र के वर्धा में वंदनीय लक्ष्मीबाई केलकर जी के दूरदर्शी नेतृत्व में हुई। वे श्रद्धापूर्वक ‘मौसीजी’ के नाम से जानी जाती हैं। मौसीजी का मानना था कि महिलाएँ केवल परिवार की आधारशिला ही नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के विकास की महत्वपूर्ण शक्ति भी हैं। महिलाओं की प्रतिभा, क्षमता और नेतृत्व को उचित दिशा देकर राष्ट्र निर्माण में उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जा सकती है।
समिति की स्थापना के पीछे महिलाओं के सर्वांगीण विकास और समाज में उनकी सक्रिय भूमिका की स्पष्ट दृष्टि थी। समिति का ध्येय महिलाओं को ‘सुशीला, सुधीरा और समर्था’ बनाना है। सुशीला अर्थात सद्गुणों एवं अच्छे चरित्र से युक्त, सुधीरा अर्थात साहसी और दृढ़ संकल्प वाली तथा समर्था अर्थात सक्षम, आत्मविश्वासी और कर्तव्यनिष्ठ। ये तीनों गुण महिला सशक्तीकरण और राष्ट्र निर्माण के लिए महत्वपूर्ण आधार प्रदान करते हैं।
मौसीजी की दूरदर्शिता ने महिलाओं को संगठित होकर कार्य करने, अपनी क्षमताओं को विकसित करने और सामाजिक दायित्वों को समझने की प्रेरणा दी। उनका विचार था कि महिला का विकास केवल व्यक्तिगत उन्नति तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसका सकारात्मक प्रभाव परिवार, समाज और राष्ट्र पर भी दिखाई देना चाहिए।
संस्कार, परिवार और राष्ट्र निर्माण
राष्ट्र सेविका समिति की विचारधारा में संस्कार और संगठन का विशेष महत्व है। परिवार समाज की पहली पाठशाला है, जहाँ बच्चों में अनुशासन, सहयोग, संवेदना, जिम्मेदारी और दूसरों के प्रति सम्मान जैसे गुण विकसित होते हैं। परिवार में प्राप्त संस्कार व्यक्ति के व्यक्तित्व और उसके सामाजिक व्यवहार को आकार देते हैं।
भारतीय संस्कृति में महिलाओं ने सदैव परिवार, समाज, शिक्षा और राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। गार्गी, मैत्रेयी और लोपामुद्रा जैसी विदुषियों से लेकर रानी लक्ष्मीबाई, जिजामाता, अहिल्याबाई होलकर और भगिनी निवेदिता जैसी प्रेरणादायी विभूतियों तक, भारतीय इतिहास महिलाओं के ज्ञान, साहस, नेतृत्व और समर्पण के उदाहरणों से समृद्ध है।
इन आदर्शों से प्रेरणा लेते हुए नई पीढ़ी में संस्कार, आत्मविश्वास और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करना आवश्यक है। परिवार और सामाजिक कार्य एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। परिवार में अच्छे संस्कारों का वातावरण बनाना, बच्चों को अपनी संस्कृति से परिचित कराना और उनमें समाज के प्रति संवेदनशीलता विकसित करना भी राष्ट्र निर्माण का महत्वपूर्ण कार्य है।
शाखा: व्यक्तित्व निर्माण की आधारशिला
राष्ट्र सेविका समिति की कार्यपद्धति में शाखा का महत्वपूर्ण स्थान है। शाखा केवल नियमित गतिविधियों का केंद्र नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण, अनुशासन, नेतृत्व और सामूहिकता विकसित करने का माध्यम है। दैनिक एवं साप्ताहिक शाखाओं में होने वाले अभ्यास और संवाद सेविकाओं को समयबद्धता, आत्मविश्वास, सहयोग तथा जिम्मेदारी का महत्व समझाते हैं।
समिति में वर्ष प्रतिपदा, गुरु पूर्णिमा, रक्षाबंधन, विजयादशमी और मकर संक्रांति जैसे पाँच प्रमुख वार्षिक उत्सव मनाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त संकल्प दिवस, संपर्क दिवस और सेवा दिवस भी मनाए जाते हैं। इन आयोजनों का उद्देश्य केवल उत्सव मनाना नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, सामाजिक संपर्क, सेवा और सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना को मजबूत करना है।
शाखा में नियमित सहभागिता से सेविकाओं को अपनी बात स्पष्ट रूप से रखने, दूसरों के विचारों को समझने और सामूहिक रूप से कार्य करने का अवसर मिलता है। यही छोटे-छोटे अभ्यास आगे चलकर सामाजिक नेतृत्व और संगठनात्मक क्षमता के विकास में सहायक बनते हैं।
प्रशिक्षण एवं महिला नेतृत्व का विकास
महिलाओं की क्षमताओं को विकसित करने और उन्हें सामाजिक दायित्वों के लिए तैयार करने में प्रशिक्षण की महत्वपूर्ण भूमिका है। समिति में वर्ष 1937 में वर्धा में प्रथम शिक्षा वर्ग आयोजित हुआ, जिसमें 60 सेविकाओं ने भाग लिया। इसके बाद प्रशिक्षण गतिविधियों को विभिन्न स्तरों पर आगे बढ़ाया गया।
प्रशिक्षण वर्गों में शारीरिक अभ्यास, योग, सूर्यनमस्कार, खेल, प्रतियोगिताएँ, बौद्धिक चर्चा, वक्तृत्व और संगठनात्मक गतिविधियाँ शामिल होती हैं। इनसे शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक दृढ़ता, अनुशासन, निर्णय क्षमता और नेतृत्व कौशल विकसित करने का प्रयास किया जाता है। अनुभवी कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन सेविकाओं को अपने अनुभवों से सीखने और कार्यक्षमता बढ़ाने का अवसर प्रदान करता है।
समिति में घोष विभाग संगीत एवं वाद्य प्रशिक्षण से जुड़ा है। तरुणी विभाग की शुरुआत वर्ष 2014 में युवतियों से संबंधित गतिविधियों पर विशेष ध्यान देने के उद्देश्य से हुई। इन पहलों से स्पष्ट होता है कि महिलाओं की विभिन्न आयु वर्गों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए प्रशिक्षण और विकास के अवसर उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया है।
सेवा कार्य: संवेदना से सामाजिक परिवर्तन तक
राष्ट्र सेविका समिति की यात्रा में सेवा कार्यों का विशेष स्थान रहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलंबन, सामाजिक जागरूकता और जरूरतमंद लोगों की सहायता इसके प्रमुख आयाम हैं। सेवा का उद्देश्य केवल तत्काल सहायता उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि व्यक्तियों और परिवारों को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रोत्साहित करना भी है।
शिक्षा के क्षेत्र में छात्रावासों का संचालन, बालिकाओं को अवसर उपलब्ध कराना तथा ग्रामीण और वंचित समुदायों तक पहुँचना महत्वपूर्ण प्रयास हैं। ऐसे कार्य महिलाओं और बालिकाओं में शिक्षा, आत्मविश्वास और सामाजिक जागरूकता को बढ़ावा देने में सहायक होते हैं।
प्राकृतिक आपदाओं और संकट की परिस्थितियों में भी सेविकाओं ने सहायता एवं राहत कार्यों में योगदान दिया है। पुणे की पानशेत बाँध दुर्घटना, भोपाल गैस त्रासदी, विभिन्न क्षेत्रों में आए भूकंप, वर्ष 2004 की सुनामी तथा वर्ष 2013 की उत्तराखंड आपदा जैसी घटनाओं के दौरान किए गए सेवा कार्यों का उल्लेख समिति की यात्रा में मिलता है। कोविड-19 महामारी के दौरान भी सेवा गतिविधियाँ संचालित की गईं।
ये अनुभव बताते हैं कि कठिन परिस्थितियों में संवेदनशीलता, तत्परता और सामूहिक सहयोग समाज को संबल प्रदान करते हैं। सेवा का वास्तविक अर्थ जरूरतमंद व्यक्ति को सहायता के साथ विश्वास, सम्मान और अपनत्व प्रदान करना भी है।
संगठन का विस्तार एवं सांस्कृतिक जागरण
वर्धा से प्रारंभ हुई राष्ट्र सेविका समिति की यात्रा देश के विभिन्न क्षेत्रों तक पहुँची। शाखाओं, मिलनों, प्रशिक्षण वर्गों और सेवा गतिविधियों के माध्यम से संगठनात्मक कार्यों का विस्तार हुआ। समिति ने समय-समय पर सामने आई सामाजिक और राष्ट्रीय परिस्थितियों में भी अपनी भूमिका निभाने का प्रयास किया।
समिति के कार्यों में सांस्कृतिक जागरण, भारतीय इतिहास के प्रति जागरूकता, स्वदेशी भावना और प्रेरणादायी महिलाओं के योगदान को नई पीढ़ी तक पहुँचाना महत्वपूर्ण रहा है। प्रकाशन विभाग के माध्यम से विभिन्न भाषाओं में पुस्तकों का प्रकाशन भी किया गया है। साहित्य, प्रदर्शनियों और अन्य संचार माध्यमों के जरिए भारतीय संस्कृति एवं जीवन-मूल्यों से संबंधित जानकारी लोगों तक पहुँचाने का प्रयास किया जाता है।
संगठन के विस्तार में प्रचारिका और विस्तारिका पद्धति की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इनके माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों में संगठनात्मक गतिविधियों को आगे बढ़ाने में सहयोग मिलता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदू सेविका समिति की गतिविधियाँ भी संगठन के व्यापक विस्तार का हिस्सा हैं।
बदलते समय में नई चुनौतियाँ
समय के साथ समाज की आवश्यकताएँ और कार्य करने के तरीके बदलते हैं। आज महिलाओं के सामने परिवार और सामाजिक दायित्वों के बीच संतुलन, सुरक्षा, शिक्षा, नेतृत्व के अवसर और डिजिटल तकनीक के प्रभावी उपयोग जैसी अनेक चुनौतियाँ हैं।
इन परिस्थितियों में महिलाओं को आत्मविश्वास, कौशल, नवाचार और सामाजिक सहभागिता के अधिक अवसर उपलब्ध कराना आवश्यक है। डिजिटल माध्यमों का सकारात्मक उपयोग संगठनात्मक संवाद, सूचना के प्रसार और कार्यों के बेहतर समन्वय में सहायक हो सकता है। साथ ही, पर्यावरण संरक्षण, सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक समरसता जैसे विषयों पर भी ध्यान देना जरूरी है।
किसी भी संगठन की सफलता केवल कार्यक्रमों की संख्या से निर्धारित नहीं होती। यह देखना भी आवश्यक है कि गतिविधियों से व्यक्तियों के जीवन में कितना सकारात्मक परिवर्तन आया, कितनी महिलाओं में नेतृत्व विकसित हुआ और समाज की समस्याओं के समाधान में कितना योगदान दिया गया।
90 वर्षों से आगे: संकल्प और व्यक्तिगत भूमिका
राष्ट्र सेविका समिति के 90 वर्ष पूर्ण होना गौरव के साथ-साथ आत्ममंथन और भविष्य के लिए नए संकल्प लेने का अवसर भी है। इस लंबी यात्रा से प्रेरणा लेते हुए प्रत्येक सेविका अपने परिवार, शाखा, गाँव और समाज में सकारात्मक परिवर्तन की शुरुआत कर सकती है।
इसके लिए नियमित सहभागिता, समय का सदुपयोग, सेवा कार्यों में योगदान, पर्यावरण संरक्षण, शिक्षा के प्रति जागरूकता और परिवार में अच्छे संस्कारों का वातावरण विकसित करना महत्वपूर्ण है। वरिष्ठ एवं अनुभवी कार्यकर्ताओं से संपर्क बनाए रखना और उनके अनुभवों से सीखना भी संगठनात्मक कार्यों को मजबूत बनाने में सहायक है।
व्यक्तिगत संकल्प तभी सार्थक होता है, जब वह व्यवहार में दिखाई दे। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने दायित्वों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करे और समाज के प्रति संवेदनशील रहे, तो छोटे-छोटे प्रयास मिलकर बड़े परिवर्तन का आधार बन सकते हैं।
