सितंबर में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक ऐसा नक्शा पोस्ट किया, जिसने यूरोप और उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र में चिंता बढ़ा दी। इस नक्शे में आइसलैंड, ग्रीनलैंड, कनाडा और कई दूसरे इलाकों को अमेरिकी झंडे से ढका हुआ दिखाया गया था। आइसलैंड की सरकार ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई और अमेरिकी राजदूत को तलब कर पोस्ट को अनुचित बताया।
जरा सोचिए, लगभग चार लाख की आबादी वाले एक छोटे से देश के लिए ऐसा संदेश कितना असहज करने वाला हो सकता है। खासकर तब, जब ट्रंप प्रशासन पिछले कई महीनों से ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण बढ़ाने की बात करता रहा है। ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका की महत्वाकांक्षाओं ने पहले ही यूरोपीय सहयोगियों के बीच संप्रभुता और सुरक्षा से जुड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या ग्रीनलैंड के बाद आइसलैंड भी ट्रंप की रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं के दायरे में आ सकता है? क्या रेक्याविक को भी सतर्क होने की जरूरत है?
फिलहाल ऐसा कोई सार्वजनिक प्रमाण नहीं है, जिससे यह साबित हो कि अमेरिका आइसलैंड पर कब्जा करने की योजना बना रहा है। लेकिन ट्रंप के नक्शे और ग्रीनलैंड को लेकर उनके रुख ने इस सवाल को जरूर चर्चा में ला दिया है। इसकी वजह सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि आइसलैंड की भौगोलिक स्थिति और उत्तरी अटलांटिक में उसका रणनीतिक महत्व भी है।
GIUK गैप: आइसलैंड क्यों है अमेरिका और NATO के लिए अहम?
आइसलैंड उत्तरी अटलांटिक महासागर में ऐसी जगह स्थित है, जहां से यूरोप और उत्तरी अमेरिका की सुरक्षा से जुड़े कई महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग गुजरते हैं। ग्रीनलैंड और ब्रिटेन के बीच स्थित समुद्री क्षेत्र को GIUK गैप कहा जाता है। GIUK का अर्थ है Greenland, Iceland और United Kingdom।
शीत युद्ध के दौरान यह क्षेत्र अमेरिका और NATO के लिए बेहद महत्वपूर्ण था। सोवियत संघ की पनडुब्बियां जब आर्कटिक क्षेत्र से निकलकर उत्तरी अटलांटिक की ओर बढ़ती थीं, तब उनकी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए इस समुद्री मार्ग की निगरानी जरूरी थी। सोवियत संघ के विघटन के बाद भी इस क्षेत्र का रणनीतिक महत्व कम नहीं हुआ है। रूस की नौसेना और उसकी पनडुब्बियों की गतिविधियां आज भी NATO की सुरक्षा संबंधी चिंताओं में शामिल हैं।
इसके अलावा, उत्तरी अमेरिका और यूरोप के बीच समुद्री संपर्क तथा महत्वपूर्ण समुद्री और संचार ढांचे की सुरक्षा भी इस व्यापक क्षेत्र से जुड़ी हुई है। यही वजह है कि आइसलैंड का महत्व उसकी छोटी आबादी या सीमित सैन्य क्षमता से कहीं ज्यादा है।
आइसलैंड NATO का संस्थापक सदस्य है, लेकिन उसके पास अपनी कोई स्थायी सेना नहीं है। देश की सुरक्षा व्यवस्था लंबे समय से सहयोगी देशों, खासकर अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग पर निर्भर रही है। 1951 में अमेरिका और आइसलैंड के बीच रक्षा समझौता हुआ था, जिसके तहत अमेरिका ने आइसलैंड की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अमेरिकी सेना केफ्लाविक एयरबेस का इस्तेमाल करती रही है और वहां अमेरिकी सैन्य विमानों की गतिविधियां भी होती रही हैं। यानी अमेरिका को आइसलैंड में अपनी रणनीतिक मौजूदगी स्थापित करने के लिए किसी नए कब्जे की जरूरत नहीं है। दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद रक्षा व्यवस्था ही उसे इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका देती है।
यहीं से एक अहम सवाल उठता है: क्या ट्रंप प्रशासन मौजूदा व्यवस्था के तहत आइसलैंड में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों और सुरक्षा संबंधी पहुंच को और बढ़ाना चाहेगा? ऐसा कोई कदम आइसलैंड की संप्रभुता से समझौता किए बिना भी संभव हो सकता है, लेकिन इसके लिए दोनों देशों के बीच बातचीत और लागू समझौतों के तहत सहमति जरूरी होगी।
ग्रीनलैंड से क्या सीख रहा है ट्रंप प्रशासन?
ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी नीति इस पूरे विवाद को समझने की एक अहम कड़ी है। ट्रंप लंबे समय से ग्रीनलैंड के रणनीतिक महत्व पर जोर देते रहे हैं। आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा, रूस की सैन्य गतिविधियां, चीन की बढ़ती दिलचस्पी और महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों तक पहुंच जैसे मुद्दे अमेरिका की चिंताओं में शामिल हैं।
ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति उसे मिसाइल चेतावनी, अंतरिक्ष निगरानी और उत्तरी अटलांटिक की सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण बनाती है। वहां अमेरिका का Pituffik Space Base पहले से मौजूद है। यह सैन्य और अंतरिक्ष निगरानी संबंधी गतिविधियों के लिए अहम आधार है।
ग्रीनलैंड के संदर्भ में किसी भी नए रक्षा समझौते या सुरक्षा व्यवस्था का आकलन करते समय एक बात स्पष्ट रखना जरूरी है: अमेरिकी सैन्य पहुंच बढ़ने का अर्थ अपने आप संप्रभुता का हस्तांतरण नहीं होता। ग्रीनलैंड डेनमार्क के साम्राज्य के भीतर एक स्वशासित क्षेत्र है और उसके लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार का सवाल भी महत्वपूर्ण है। अमेरिका की रणनीतिक पहुंच, डेनमार्क की संप्रभुता और ग्रीनलैंड के लोगों के अधिकार तीन अलग-अलग विषय हैं।
इसका व्यापक सबक यह है कि किसी क्षेत्र में सैन्य ठिकानों, निगरानी प्रणालियों और रक्षा सहयोग का विस्तार किए बिना भी औपचारिक विलय के जरिए नियंत्रण हासिल करना जरूरी नहीं है। देश आपसी समझौतों के माध्यम से सैन्य पहुंच और सुरक्षा सहयोग बढ़ा सकते हैं।
आइसलैंड के मामले में भी यही अंतर समझना होगा। अमेरिका पहले से वहां रक्षा सहयोग का हिस्सा है। इसलिए भविष्य में सैन्य गतिविधियों का विस्तार संभव होने और आइसलैंड पर कब्जे की योजना होने के बीच बड़ा फर्क है। अभी उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के आधार पर दोनों को एक ही बात मानना सही नहीं होगा।
ट्रंप के नक्शे और उनकी बयानबाजी ने आशंकाएं जरूर बढ़ाई हैं, लेकिन किसी देश पर नियंत्रण स्थापित करने की वास्तविक योजना का निष्कर्ष निकालने के लिए ठोस प्रमाण जरूरी हैं। फिलहाल आइसलैंड को लेकर ऐसा प्रमाण सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है।
एल्युमिनियम, ऊर्जा और डेटा सेंटर: आइसलैंड का आर्थिक महत्व
आइसलैंड का महत्व केवल सैन्य रणनीति तक सीमित नहीं है। उसकी अर्थव्यवस्था और ऊर्जा संसाधन भी उसे अंतरराष्ट्रीय निवेश के लिए आकर्षक बनाते हैं। देश में जलविद्युत और भू-तापीय ऊर्जा के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। इनसे अपेक्षाकृत स्थिर बिजली आपूर्ति हासिल करने की संभावना रहती है, जो ऊर्जा की अधिक खपत करने वाले उद्योगों के लिए उपयोगी है।
एल्युमिनियम उत्पादन इसका एक प्रमुख उदाहरण है। इस उद्योग में बिजली की खपत बहुत अधिक होती है और आइसलैंड के ऊर्जा संसाधन इसे इस तरह के उत्पादन के लिए आकर्षक बनाते हैं। इसी तरह डेटा सेंटर और अन्य डिजिटल बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं के लिए भी देश की ऊर्जा उपलब्धता और ठंडी जलवायु महत्वपूर्ण हो सकती है।
अमेरिका और आइसलैंड के बीच व्यापार, निवेश और तकनीकी सहयोग की संभावनाएं इन क्षेत्रों में मौजूद हैं। लेकिन यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि इन आर्थिक हितों के कारण ट्रंप प्रशासन आइसलैंड पर दबाव डालने या उसे अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश करेगा। आर्थिक आकर्षण और राजनीतिक दबाव के बीच अंतर करना जरूरी है।
यूरोप के साथ आइसलैंड के रिश्ते भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं। आइसलैंड यूरोपीय संघ का सदस्य नहीं है, लेकिन यूरोपीय आर्थिक क्षेत्र (European Economic Area यानी EEA) का हिस्सा है। इसके जरिए वह यूरोपीय एकल बाजार से व्यापक रूप से जुड़ा हुआ है। यूरोपीय संघ की सदस्यता पर बातचीत दोबारा शुरू करने के सवाल पर देश के भीतर राजनीतिक बहस होती रही है।
इसलिए आइसलैंड को सिर्फ अमेरिका और NATO के नजरिए से देखना अधूरा होगा। उसकी अपनी आर्थिक प्राथमिकताएं, यूरोप के साथ संस्थागत संबंध और घरेलू राजनीतिक फैसले भी उसकी विदेश नीति को प्रभावित करते हैं।
क्या आइसलैंड सचमुच ट्रंप का अगला निशाना है?
ग्रीनलैंड और आइसलैंड की परिस्थितियों में बुनियादी अंतर है। ग्रीनलैंड डेनमार्क के साम्राज्य के भीतर स्वशासित क्षेत्र है, जबकि आइसलैंड एक स्वतंत्र गणराज्य है। उसकी अपनी निर्वाचित सरकार, स्वतंत्र विदेश नीति और NATO की सदस्यता है। अमेरिका के साथ उसका रक्षा संबंध भी दशकों पुराना है।
इसलिए ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप के रुख को आइसलैंड पर कब्जे की संभावित योजना का सीधा प्रमाण नहीं माना जा सकता। हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति की बयानबाजी और अमेरिकी झंडे वाले नक्शे जैसी घटनाएं यह सवाल जरूर उठाती हैं कि वॉशिंगटन अपने सहयोगी देशों के साथ संबंधों को किस नजर से देख रहा है।
आइसलैंड के लिए व्यावहारिक चुनौती यह होगी कि वह अमेरिका के साथ अपने सुरक्षा सहयोग को बनाए रखते हुए अपनी संप्रभुता और निर्णय लेने की स्वतंत्रता की रक्षा कैसे करता है। दोनों देशों के साझा हित हैं, विशेषकर उत्तरी अटलांटिक की सुरक्षा, रूस की सैन्य गतिविधियों पर निगरानी और महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की रक्षा। लेकिन साझा हितों का अर्थ यह नहीं है कि किसी छोटे देश की चिंताओं को नजरअंदाज किया जा सकता है।
आखिरकार, इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि ट्रंप कल आइसलैंड पर कब्जे की घोषणा कर देंगे या नहीं। ऐसा होने का फिलहाल कोई सार्वजनिक प्रमाण नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या अमेरिका अपने सहयोगियों को बराबरी के रणनीतिक साझेदार के रूप में देखता है, या उनकी भौगोलिक स्थिति, सैन्य ठिकानों और आर्थिक संसाधनों को अपनी वैश्विक शक्ति बढ़ाने के साधन के तौर पर प्राथमिकता देता है।
ग्रीनलैंड विवाद ने इस बहस को तेज किया है। आइसलैंड के लिए फिलहाल सतर्क रहने की वजह किसी प्रमाणित कब्जे की योजना से ज्यादा यह है कि बदलती वैश्विक प्रतिस्पर्धा में उसकी रणनीतिक अहमियत बढ़ रही है। ऐसे माहौल में संप्रभुता, सहयोग और शक्ति के बीच संतुलन ही आने वाले समय में अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों के रिश्तों की असली परीक्षा होगा।
