यूरोप और भारत में विरोध-प्रदर्शनों को लेकर मानवाधिकार संगठनों की भाषा और प्रतिक्रिया के समय में कथित अंतर ने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल खड़े किए हैं। भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति में स्पष्ट किया है कि मानवाधिकारों का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव बनाने या चुनिंदा देशों को निशाना बनाने के लिए नहीं होना चाहिए। भारत का सवाल है कि क्या अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं सभी देशों के लिए समान मानदंड अपनाती हैं या उनकी प्रतिक्रिया राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार बदल जाती है?
भारत की ओर से विदेश मंत्रालय की उप सचिव बरखा ताम्रकार ने दो टूक कहा कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार तंत्रों के साथ भारत का जुड़ाव हमेशा से रहा है, लेकिन यह संवाद, परामर्श, सहयोग, गैर-भेदभाव और पारदर्शिता के सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए। उन्होंने सदस्य देशों से मानवाधिकार रिपोर्टों को सही संदर्भ में देखने और अपुष्ट आरोपों के आधार पर किसी देश की नकारात्मक छवि बनाने से बचने की अपील की।
यूरोप में क्या हो रहा है और मानवाधिकार संगठनों की प्रतिक्रिया क्या है?
यूरोप में अक्टूबर 2026 के दौरान कई देशों में सामाजिक और राजनीतिक असंतोष के बीच प्रदर्शन हुए। फ्रांस में शिक्षा व्यवस्था और स्कूलों की स्थिति को लेकर छात्र सड़कों पर उतरे, जबकि इटली में हिंसक झड़पों, तोड़फोड़ और पुलिसकर्मियों पर हमलों के बाद सरकार ने सुरक्षा नियम सख्त करने की घोषणा की।
फ्रांस में छात्र प्रदर्शनों के दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर ह्यूमन राइट्स वॉच (HRW) ने चिंता जताई। संगठन की 14 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक, 21 सितंबर से शुरू हुए छात्र प्रदर्शनों के दौरान 6,800 से अधिक लोगों को हिरासत में लिए जाने की खबर थी। संगठन ने पुलिस द्वारा अत्यधिक बल के इस्तेमाल पर सवाल उठाए। रिपोर्ट में एक 15 वर्षीय छात्र के पुलिस के स्टन ग्रेनेड से हाथ गंवाने और 14 वर्षीय छात्र के जबड़े में चोट लगने का भी उल्लेख किया गया। संगठन ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले बच्चों के अधिकारों की रक्षा और पुलिस कार्रवाई की जांच की मांग की।
इटली में प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी की सरकार ने हिंसक प्रदर्शनों से निपटने के लिए सख्त सुरक्षा उपायों की घोषणा की। प्रस्तावित प्रावधानों में हिंसक गतिविधियों, तोड़फोड़ और सार्वजनिक सुरक्षा को खतरे में डालने वाले कृत्यों के लिए सख्त दंड की व्यवस्था शामिल है। कुछ मामलों में पांच साल तक की जेल और 20,000 यूरो तक के जुर्माने का प्रावधान भी घोषित किया गया।
इन घटनाओं के बीच भारत से जुड़ी प्रतिक्रिया की तुलना करते हुए सवाल उठाया जा रहा है कि यूरोप में बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों के बाद संवाद और आनुपातिक कार्रवाई की भाषा क्यों प्रमुख रही, जबकि भारत में प्रदर्शनकारियों की हिरासत को लेकर तत्काल चिंता जताई गई।
हालांकि, यहां एक तथ्यात्मक अंतर समझना जरूरी है। यूरोप में हिरासत की संख्या का उल्लेख किसी बयान में नहीं होने का दावा तभी निर्णायक रूप से किया जा सकता है, जब संबंधित मूल बयान की शब्दावली की पुष्टि हो। इसी तरह, अलग-अलग तारीखों पर जारी बयानों की तुलना करते समय यह देखना होगा कि दोनों मामलों में घटनाओं की प्रकृति और उपलब्ध जानकारी कितनी समान थी।
भारत में प्रदर्शनकारियों की हिरासत पर क्या कहा गया?
भारत में अक्टूबर के पहले पखवाड़े में चुनाव आयोग के कामकाज और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर विरोध-प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारियों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया पर सवाल उठाए।
10 अक्टूबर को दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान बड़े पैमाने पर हिरासत की कार्रवाई हुई। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, उस दिन 2,000 से अधिक प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (OHCHR) ने 10 अक्टूबर को भारत में प्रदर्शनों से पहले और उनके दौरान हुई सामूहिक हिरासत पर चिंता जताई। कार्यालय ने अधिकारियों से सार्थक संवाद करने और शांतिपूर्ण सभा के अधिकार का सम्मान करने की अपील की।
भारत के विदेश मंत्रालय ने इस प्रतिक्रिया को खारिज करते हुए कहा कि ऐसी चिंताएं अनुचित हैं और भारत के आंतरिक मामलों में अस्वीकार्य हस्तक्षेप हैं।
भारत का सवाल है कि क्या किसी लोकतांत्रिक देश की कानून-व्यवस्था संबंधी कार्रवाई पर टिप्पणी करते समय तथ्यों, कानूनी प्रक्रिया और स्थानीय परिस्थितियों का पूरा संदर्भ लिया जाता है? क्या रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों और स्वतंत्र रूप से प्रमाणित निष्कर्षों के बीच स्पष्ट अंतर रखा जाता है?
बरखा ताम्रकार ने UN में क्या कहा?
संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति में भारत का पक्ष रखते हुए विदेश मंत्रालय की उप सचिव बरखा ताम्रकार ने मानवाधिकार रिपोर्टों की व्याख्या और आरोपों की विश्वसनीयता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट में दर्ज बातों से आगे बढ़कर निष्कर्ष नहीं निकाले जाने चाहिए।
उन्होंने कहा:
“हम प्रतिनिधिमंडलों से अपील करते हैं कि वे रिपोर्ट का सही संदर्भ में हवाला दें, किसी मानवीय संवाद को एक अंतिम फैसले या निर्णय के रूप में पेश न करें।”
ताम्रकार ने स्पष्ट किया कि भारत उचित दस्तावेजों के साथ सामने आने वाले विशिष्ट मामलों पर निर्धारित प्रक्रियाओं के माध्यम से चर्चा करने के लिए तैयार है। हालांकि, उन्होंने अपुष्ट दावों और अधूरे आंकड़ों के आधार पर देश की नकारात्मक छवि बनाने के प्रयासों का विरोध किया।
भारत का तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार व्यवस्था का उद्देश्य देशों के बीच सहयोग बढ़ाना होना चाहिए, न कि चुनिंदा देशों पर राजनीतिक दबाव बनाना। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन किसी भी मामले पर अंतरराष्ट्रीय टिप्पणी तथ्यों, सत्यापन और निष्पक्ष प्रक्रिया पर आधारित होनी चाहिए।
