विजयादशमी: “संगठन में शक्ति” का प्रतीक

विजयादशमी का अर्थ है काम, क्रोध आदि दस आंतरिक शत्रुओं पर विजय का संकल्प लेना और समाज में संगठित होकर अपनी शक्ति को बढ़ाना । यही सच्ची विजय है, यही सर्वोदय की विजय है।

विजयादशमी: "संगठन में शक्ति" का प्रतीक

विजयादशमी केवल एक त्यौहार नहीं, यह हमारी राष्ट्रीय चेतना का जीवंत प्रतीक है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि जब-जब आसुरी शक्तियाँ बढ़ती हैं, तब-तब संगठित दैवी शक्ति उनका अंत करती है।

*संगठित मातृशक्ति का प्रतीक – माँ दुर्गा*

अश्विन शुक्ल दशमी के दिन ही माँ दुर्गा ने महिषासुर पर विजय प्राप्त की थी। कथा बहुत गहरी है। महिषासुर उन्मत्त हो गया था, उसने देवताओं को भी त्रस्त कर दिया था। देवता शूरवीर थे, पराक्रमी थे, पर विघटित थे। इसलिए वे बार-बार पराजित हो रहे थे। अंत में वे एक साथ आए। उनके संगठित तेज से माँ दुर्गा का प्राकट्य हुआ। हर देवता ने अपने जीवन भर की साधना, अपनी श्रेष्ठ पूंजी, अपना उत्तम शस्त्र देवी को अर्पित किया। माँ दुर्गा सिंह पर आरूढ़ हैं – वह सिंह जनशक्ति का प्रतीक है। उन सभी शस्त्रों से सुसज्जित होकर देवी ने दुष्ट का संहार किया।

इसका संदेश स्पष्ट है – संगठित शक्ति ही अजेय शक्ति है। हममें से हर व्यक्ति को साधना करके कोई न कोई विशेषता, निपुणता प्राप्त करनी है, और फिर उसे राष्ट्र-देवता के चरणों में अर्पित कर देना है। तभी राष्ट्र बलशाली और विजयशाली बनेगा।

*शस्त्र का अर्थ – रक्षण, न कि आतंक*

नवरात्रि में अश्विन प्रतिपदा से माँ की आराधना शुरू होती है और नवमी को शस्त्र-पूजन किया जाता है। हमारे लगभग सभी देवी-देवता शस्त्रधारी हैं। पर हमारे शस्त्र आतंक फैलाने के लिए या कमजोरों को दबाने के लिए नहीं हैं। वे खल के निर्दालन और सज्जनों के रक्षण के लिए हैं। आज के युग में वाणी भी एक बड़ा शस्त्र है, वह दोधारी है। माँ दुर्गा के पास दो शक्तियाँ हैं – अनुग्रह और निग्रह। सज्जनों पर अनुग्रह और दुर्जनों पर निग्रह, यही उनका जीवन-सूत्र है। हमें भी यही सीखना है।

*सीमोल्लंघन – स्वार्थ की सीमा को लांघना*

प्राचीन काल में एक सुंदर व्यवस्था थी। वर्षा ऋतु में युद्ध बंद रहते थे। सभी अपनी खेती में लगे रहते थे। अश्विन मास तक फसल तैयार हो जाती, खेती का काम पूरा हो जाता और रास्ते भी सेना के चलने योग्य बन जाते। तब नवमी को शस्त्र पूजकर दशमी को वीर युद्ध के लिए प्रस्थान करते थे, राज्य की सीमाओं को लांघते थे। आज हमें भी सीमोल्लंघन करना है, पर वह सीमा राज्य की नहीं। हमें अपने स्वार्थ की, अपने व्यक्तिवाद की, अपने अहंकार की सीमा लांघनी है। जब हम स्वार्थ की सीमा लांघेंगे, तभी हमारे भीतर राष्ट्रीय दृष्टिकोण जागेगा, जीवन का लक्ष्य स्पष्ट होगा। तभी सच्चा सीमोल्लंघन होगा। जब एक-एक व्यक्ति स्वार्थ को छोड़कर आगे बढ़ेगा, तभी विजयादशमी सार्थक होगी। हमें अपने भीतरी शत्रुओं – काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर पर भी विजय पानी है। अहंकार को जीतने पर ही जीवन में सच्ची विजय मिलती है।

*इस पर्व से जुड़ी प्रेरक कथाएँ*

इस पर्व के साथ कई सुंदर इतिहास जुड़े हैं।

एक कथा कौत्स ऋषि की है। शिक्षा पूर्ण होने पर शिष्य कौत्स ने गुरु वरतन्तु को दक्षिणा देनी चाही। गुरु ने मना किया – “बेटा, ज्ञान का सही उपयोग करो, वही मेरी दक्षिणा है।” पर शिष्य अड़ा रहा। तब गुरु ने परीक्षा के लिए कहा – “100 कोटि स्वर्ण मुद्राएँ ले आओ।” सोचा, यह असंभव सुनकर चुप हो जाएगा।

पर कौत्स रघु राजा के पास पहुँचा। रघु ने कुछ दिन पहले ही अपनी सारी संपत्ति दान कर दी थी। उन्होंने कहा, “वत्स, कल आओ।” रात भर राजा चिंतित रहा कि अब तो इंद्र से युद्ध करके ही स्वर्ण लाना होगा। इंद्र को यह बात पता चली, उसने रातों-रात राजा की कुटिया के पास स्वर्ण मुद्राओं की वर्षा कर दी।

दूसरे दिन रघु ने कहा – “ये रहीं मुद्राएँ।” कौत्स ने जितनी आवश्यक थीं, उतनी ही लीं, एक अधिक नहीं। रघु ने बची हुई मुद्राओं को फिर से दान कर दिया। जिस वृक्ष के नीचे यह वर्षा हुई थी, उसी के पत्तों को सोने का प्रतीक मानकर आज विजयादशमी पर हम बड़ों को देते हैं। इसका भाव है – हम अपरिग्रही और निर्मोही बनें।

दूसरी बड़ी घटना राम-रावण युद्ध की है। रावण वध केवल एक राजा की दूसरे राजा पर विजय नहीं, यह संस्कार की असंस्कार पर विजय है। यह अधिनायकवाद पर जनसत्ता की विजय है। अयोध्या के राजकुमार राम, जो चक्रवर्ती राज्य को छोड़कर वल्कल पहनकर भी प्रसन्न रहे, जो अयोध्या से रामेश्वरम तक सामान्य जन की तरह चले, जिन्होंने शबरी के झूठे बेर खाए और अहिल्या का उद्धार किया – उन्होंने लंका जीती, पर उसे अपने पास नहीं रखा। उन्होंने वह राज्य विभीषण को सौंप दिया, जिसने अधर्मी भाई का विरोध कर धर्म का ध्वज उठाया था।

तीसरी कथा पांडवों की है। अज्ञातवास के एक वर्ष बाद पांडवों ने शमी वृक्ष में छिपाए अपने शस्त्र इसी दिन निकाले और कौरवों पर विजय पाई। इसलिए इस दिन शमी-पत्र भगवान को अर्पित किए जाते हैं।

*दो युग-प्रवर्तक संगठनों का जन्मदिन*

यही वह पावन तिथि है जब भारत के भाग्य को बदलने वाले दो संगठनों का जन्म हुआ। 1925 की विजयादशमी पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई, और 25 अक्टूबर 1936 को वंदनीय लक्ष्मीबाई केलकर – मौसीजी – द्वारा राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना हुई।

आज संघ अपने 100 वर्ष पूरे कर रहा है और समिति अपने 90वें वर्ष में प्रवेश कर रही है। स्थापना काल से ही इन दोनों संगठनों ने एक ही लक्ष्य रखा है – भारत के प्रत्येक नागरिक का शारीरिक, सामाजिक और बौद्धिक विकास, ताकि वह संस्कारवान और अनुशासित बने और भारत फिर से विश्वगुरु के आसन पर बैठे।

*विजय का सच्चा अर्थ*

विजय का हमारा अर्थ बहुत पवित्र है। विजय का अर्थ किसी दूसरे की भूमि, धन या अधिकार छीनना नहीं है। विजय का अर्थ है स्वधर्म और स्वदेश की रक्षा। रावण दहन कर हम सत्य के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। इसमें किसी का पराभव नहीं होता। राक्षसों की सभ्यता नष्ट नहीं हुई, केवल रावण के अहंकार का नाश हुआ और उसे दैवी संस्कृति का सहकार मिला।

विजय का एक और सबसे बड़ा आधार है – संगठन। जब देवताओं की बिखरी हुई शक्तियाँ पराजित होने लगीं, तब उन्होंने भी एकत्रित होने का संकल्प लिया। उनके एकजुट तेज ने ही माँ दुर्गा के रूप में साकार होकर विजय का मार्ग प्रशस्त किया। यह सत्य शाश्वत है – संगठित हुए बिना विजय की कामना केवल कल्पना है।

विजयादशमी का अर्थ है काम, क्रोध आदि दस आंतरिक शत्रुओं पर विजय का संकल्प लेना और समाज में संगठित होकर अपनी शक्ति को बढ़ाना । यही सच्ची विजय है, यही सर्वोदय की विजय है।

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