जियो-जीने दो की नसीहत पर ही अफसर ने कैंसर ऑपरेशन को छोड़ी कोरोना ड्यूटी (आईएएनएस विशेष)

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नई दिल्ली, 23 मई (आईएएनएस)। जब मैं जिले में कोरोना से बचाव की तैयारियों में जुटा था तभी पता चला कि, मुझे गले का कैंसर है। इस बात को मैंने किसी को नहीं बताया। सोचा अगर अपनी बीमारी का जिक्र करुंगा तो, महकमा और मातहत यह न सोच लें कि मैं, कोरोना ड्यूटी से पिंड छुड़ाने के लिए बहाना बना रहा हूं।

कई दिन तक कैंसर की तकलीफ में ही ड्यूटी करता रहा। पत्नी को पता चला तो वे बोलीं, कि जियो और जीने दो। आप ठीक होंगे तो महकमे की और जनता की सेवा में दुबारा जुट जाओगे। इसके बाद भी मैं कई दिन तक अपने कैंसर ऑपरेशन को टालता रहा। सोच रहा था कि कोरोना संबंधी जिले में जो तैयारियां मैं करवा रहा हूं, वे कहीं अधूरी न छूट जायें। मैंने पत्नी से कह दिया था कि, वे मथुरा से दिल्ली न आयें। संभव है कि वे दिल्ली से मथुरा वापसी में बच्चों के लिए कोरोना करियर न बन जायें। परिवार में किसी को नहीं बताया। उस रात मैं दिल्ली में पुलिस डिपार्टमेंट की ओर से नाइट-जीओ की ड्यूटी पर था। पूरी रात डूयूटी की। सुबह गले में तकलीफ हुई। तब लगा कि शायद अब सबकुछ तबाह हो सकता है। लिहाजा सीनियर अफसरों को बताकर मैं नाइट ड्यूटी से ही सीधा अस्पताल में जाकर दाखिल हो गया। अस्पताल में मेरे गले में मौजूद कैंसर का ऑपरेशन हुआ। ऑपरेशन के बाद जब ड्यूटी ज्वाइन करने फिर पहुंचा, तो ज्वांइट सीपी मैडम ने वापस कर दिया। यह कहकर कि जिंदगी बचाओ पहले। जिंदगी बचा ले गये तो नौकरी तो आगे भी बाकी पड़ी है करते रहोगे।

यह तमाम बेबाक मुंहजुबानी शनिवार को बयान की, मौत के मुंह से निकलकर आये आनंद कुमार मिश्रा (39) ने। दिल्ली पुलिस के कोरोना वॉरियर युवा जाबांज पुलिस अफसर आनंद 2010 बैच दानिप्स कैडर (दिल्ली अंडमान निकोबार पुलिस सेवा) के अधिकारी हैं। आनंद कुमार इन दिनों पश्चिमी परिक्षेत्र के बाहरी दिल्ली जिले में एडिश्नल डीसीपी-2 के पद पर तैनात हैं। इससे पहले आनंद दिल्ली के नंद नगरी, सीलमपुर, क्राइम ब्रांच, कल्याणपुरी आदि सर्किल में एसीपी (सहायक पुलिस आयुक्त) रह चुके हैं।

कहने देखने को आनंद कुमार मिश्रा के परिवार में यूपी पुलिस में डिप्टी एसपी पद पर तैनात पत्नी आलोक दुबे (फिलहाल मथुरा में सीओ सिटी), पिता महेंद्र कुमार मिश्रा, मां अरुणा, बड़े भाई नलज, छोटे भाई अभिषेक, छोटी बहन नेहा, दो बेटे प्रखर (कक्षा-2 का छात्र)-प्रियंवद (तीन साल) हैं। आनंद ने इनमें से किसी को भी शरुआती दौर में भनक नहीं लगने दी कि, उन्हें कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी हो चुकी है।

बकौल आनंद कुमार मिश्रा, फरवरी 2020 में गले में सूजन आई। बकौल एडिश्नल डीसीपी आनंद, मार्च अप्रैल 2020 आते आते गले में कैंसर की गांठ में तकलीफ और बढ़ गयी। 2 अप्रैल को डॉक्टर ने बता दिया कि, थायराईड कैंसर है। जल्दी से जल्दी ऑपरेशन की इसका इलाज है। अपने गले में कैंसर की बात पहली बार डॉक्टर के मुंह से सुनी तो, आंखों के सामने अंधेरा छा गया। फिर सोचा नहीं मैं अगर डर गया तो पूरी पुलिस और परिवार पर इसका विपरीत असर पड़ेगा। सो एक मिनट चुप रह कर ही डॉक्टर से बाकी आगे की प्लानिंग पूछने लगा।

बकौल दिल्ली पुलिस के इस जांबांज कोरोना कर्मवीर एडिश्नल डीसीपी के मुताबिक, एम्स व अन्य अस्पतालों में कई जांच हुईं। हर एक की रिपोर्ट में गले का कैंसर कन्फर्म हो गया। अब तक परिवार और दिल्ली पुलिस महकमे में किसी को नहीं बताया। सिवाय दो दोस्तों जितेंद्र सिंह व एक अन्य दोस्त (नाम नहीं खोलना चाहते) के। तीनों ने तय किया कि, बात ऑपरेशन के वक्त कहीं ऊपर नीचे न हो, लिहाजा पत्नी को बताने का तय हुआ। उन्हें बताया तो वे बोलीं, मैं मथुरा से छुट्टी लेकर आ जाती हूं दिल्ली। मैंने उनसे कहा, पति को बचाने के लिए दो-दो पाप सिर पर मत चढ़ाओ। तुम्हारे दिल्ली आने की जरुरत नहीं है। पहले मथुरा में अपनी कोरोना ड्यूटी दो। डिपार्टमेंट और मथुरा के लोग कहीं यह न सोच लें कि, तुम कोरोना से डरकर दिल्ली भाग आयी हो। दूसरे जब तुम दिल्ली से वापस मथुरा जाओगी तो संभव है कि, तुम खुद यहां से बच्चों व मथुरा के अन्य लोगों के लिए कोरोना करियर बनकर न पहुंच जाओ।

आनंद मिश्रा के मुताबिक, कैंसर की बात पुख्ता होने के बाद भी मैं चुपचाप कोरोना से बचाव के इंतजाम करने कराने में लगा रहा। मुझे गले में दर्द तो था, मगर मैं यह सोचकर रुक जाता था कि, अगर मैंने अपनी तकलीफ बताकर छुट्टी ली, तो भले ही कोई मेरे मुंह पर न बोले, मगर पीछे कोई भी सोच सकता है कि, मैं कोरोना से डरकर ड्यूटी से पीछे हट गया हूं। लिहाजा मैंने सोचा जब तक शरीर चल रहा है तब तक चलाऊंगा। एक बार मैंने पत्नी से जिक्र भी किया कि मैं, कुछ दिन की छुट्टी लेकर आराम कर लूं। तो वे भी बोलीं नहीं अगर ऑपरेशन कराना है तो छुट्टी लो, वरना दिन भर घर में पड़े पड़े कैंसर के बारे में ही सोचते रहोगे।

कोरोना की ड्यूटी देते-देते सीधे कैंसर के ऑपरेशन के लिए अस्पताल में दाखिल होने वाले दिन का जिक्र करते हुए वे बोले, जहां तक मुझे याद आ रहा है उस दिन 21 अप्रैल को दिन में डूयूटी करता रहा। रात में बुखार आया। दर्द भी होने लगा गले में। डॉक्टर ने फोन पर दवा बताई वो ले ली। 21-22 अप्रैल 2020 की रात मेरी नाइट जीओ की ड्यूटी थी। वो ड्यूटी भी रात भर करता रहा। जब तकलीफ बरादाश्त नहीं हुई तो, नाइट ड्यूटी से ही अगले दिन सीधे राजीव गांधी कैंसर हॉस्पिटल में जाकर भर्ती हो गया। दो तीन दिन में ही मेरा ऑपरेशन कर दिया गया। दिन-रात कोरोना की ड्यूटी करते करते वहीं से सीधे अस्पताल में दाखिल हो जाने पर क्या क्या विचार मन में आ रहे थे? कितनी बार लगा कि मौत के जबड़े में फंस चुके हो? पूछने पर आनंद बोले, नहीं कुछ नहीं लगा। सिर्फ सोच रहा था कि, तमाम उन फाइलों का क्या होगा जो सेनेटाइजेशन, कोरोना बचाव की किट, कोरोना से बचाव संबंधी पोस्टर्स जो जगह जगह लगवाने थे बाहरी दिल्ली जिले में, वे अब कौन लगवायेगा? सब तितर बितर हो चुका होगा दफ्तर भी। सब फाइलें ठहर गयी होंगीं जहां की तहां, मेरे अस्पताल पहुंचते ही।

जो शख्स जिद के चलते कोरोना ड्यूटी छोड़ना ही गंवारा नहीं कर रहा था, वो अचानक ड्यूटी से कैंसर ऑपरेशन के लिए कैसे सीधे अस्पताल में जाकर दाखिल हो गया? पूछने पर आनंद कुमार मिश्रा बोले, पत्नी बोलीं कि, जियो और जीने दो। जब जियोगे तभी तो आगे कुछ कर पाओगे। वरना क्या हाथ आयेगा? किसकी ड्यूटी करोगे और कौन तुम्हारी फाइलें निपटायेगा? मुझे उनकी बात सही लगी। सो तकलीफ बहुत ज्यादा बढ़ने पर सीधा अस्पताल चला गया।

जिस शख्स ने कोरोना ड्यूटी और खाकी वर्दी में पुलिस धर्म निभाने के लिए ईमानदारी से बाकी सब कुछ छोड़-भुला दिया था। यहां तक कि कैंसर सी घातक बीमारी से खुद को बचाने का इरादा भी काम की जद्दोजहद की में गुमा-घुमा दिया। उस शख्स ने जन्म देने वाले माता-पिता से कैसे सब कुछ छिपाया? पूछने पर बेबाक आनंद सौम्यतापूर्वक कहते हैं, मैं कृष्ण तो नहीं। न ही महाभारत का कोई पात्र हूं। चूंकि सवाल आपने किया है तो जबाब दे रहा हूं। भगवान कृष्ण ने भी महाभारत में दूध का दूध और पानी का पानी करने के लिए बहुत कुछ छिपाया था। उनके द्वारा काफी कुछ छिपाने का ही अंतिम परिणाम था सच और साहस की विजय। माता-पिता छोटी बहन सबको अंधेरे में रखा। क्योंकि वे सब मेरे कैंसर के नाम से ही खुद को हरा बैठते। मैंने निजी स्वार्थ के लिए नहीं। धर्म और अपने कर्म के लिए झूठ बोला।

मौत के मुंह से (कैंसर) निकलते ही फिर दुबारा तुरंत दूसरी मौत की ओर (कोरोना ड्यूटी) चले गये? जबकि डॉक्टरों ने हिफाजत और अभी एहतियात बरतने को कहा था? पूछने पर दिल्ली पुलिस का यह बेबाक जांबाज बोला, दफ्तर में जाना जरुरी था। उन अपनों के बीच जिनके बीच से मैं सीधा अस्पताल पहुंच गया था। शायद अपने उन्हीं किसी साथी की दुआ से मैं बचकर दुबारा दफ्तर पहुंच सका होऊं। कुर्सी पर बैठने से पहले भी दफ्तर में भगवान को शुक्रिया कहा। और दिल्ली पुलिस के अपने साथियों, अफसरान का शुक्रिया, जिनकी दुआओं-सहयोग से मैं जीवित हूं। वरना शुरूआती दौर में कई बार लगा था कि, कैंसर के सामने सरेंडर कर दूं। फिर सोचा हारुं भी तो कम से कम, वर्दी में बुजदिलों की मानिंद तो न हारुं-मरुं। लोग मरने वाले को भूल जाते हैं। मरने वाले की मौत कैसे हुई इसे याद रखते हैं।

कैंसर से जीते कोरोना में कूद पड़े? इस जानलेवा कदम को उठाने के पीछे प्रमुख वजह या संबल? पूछने पर वे बताते हैं, वेस्टर्न रेंज की ज्वाइंट सीपी मैडम शालिनी सिंह के वीडियो कांफ्रेंसिंग पर बोले वे अल्फाज, आनंद तुम अभी अस्पताल से निकले हो। ड्यूटी दफ्तर से नहीं। घर से जाकर करो। वर्क फ्रॉम होम।

–आईएएनएस


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