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तो फिर ताजमहल है क्या – मकबरा या फिर हिन्दू मंदिर?

Nitesh Kumar Harne द्वारा Nitesh Kumar Harne
9 January 2018
in इतिहास
Duniya ke saat ajoobe
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यमुना नदी के किनारे सफेद पत्थरों से निर्मित अलौकिक सुंदरता की तस्वीर ‘ताजमहल’ न केवल भारत में, बल्कि पूरे विश्व में अपनी पहचान बना चुका है। शाहजहाँ – मुमताज के प्रेम की दास्तान को दर्शाता भव्य ताजमहल सुन्दरता का अद्भुत नमूना है। ताजमहल को दुनिया के सात आश्चर्यों में शामिल किया गया है। हालांकि इस बात को लेकर हमेशा से सवाल उठते रहे हैं कि ताजमहल को शाहजहां ने बनवाया है या फिर किसी और ने।

हालांकि, ताजमहल का विवादों से गहरा नाता रहा है। यह सब शुरू हुआ जब उत्तर प्रदेश सरकार ने एक पर्यटन पुस्तिका जारी की जिसमें राज्य के प्रमुख पर्यटक आकर्षण थे लेकिन विश्व प्रसिद्ध ताजमहल को इसमें शामिल करने में विफल रहे । विवाद और बढ़ गया जब भाजपा नेता संगीत सोम ने कहा कि मकबरा “भारतीय संस्कृति पर एक धब्बा है”। भाजपा के सांसद विनय कटियार ने दावा किया कि इस स्मारक ताजमहल को एक प्राचीन हिंदू मंदिर तेजोमहालय नामक मंदिर पर बनाया गया था।

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इसके असली निर्माता पर अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए RTI कार्यकर्ता संतोष ए एस ने एक आरटीआई अर्जी लगाई जिसमें भारत के पुरातत्व सर्वेक्षण ने उत्तर दिया कि कोई भी वैज्ञानिक यह नहीं कह रहा है कि ताजमहल का निर्माण शाहजहां द्वारा किया गया था।

क्या ताजमहल का निर्माण वास्तव में शाहजहाँ द्वारा किया गया था ?

यहाँ ध्यान दिया जाना चाहिए कि 26 मार्च, 2015 को, आगरा के छह वकीलों ने जिला अदालत में एक याचिका दायर की, दावा करते हुए कि ताजमहल एक शिव मंदिर था जो कि तेजोमहालय के नाम से जाना जाता है और हिंदूओं को पूजा के लिए अपने परिसर में प्रवेश की अनुमति दी जानी चाहिए। वकील हरीशंकर जैन ने दावा किया कि “1212 ईस्वी में, राजा परमर्दी देव ने तेजोमहालय मंदिर महल का निर्माण किया था, जो वर्तमान में, आम भाषा में ताजमहल के रूप में जाना जाता है।

इस विषय पर केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने सरकार से पूछा है कि ताजमहल शाहजहां का बनवाया हुआ मकबरा है या राजपूत राजा की ओर से मुग़ल बादशाह को तोहफ़े में दिया गया प्राचीन शिव मंदिर (तेजोमहालय)? इतिहास का ये सवाल सूचना के अधिकार के तहत केंद्रीय सूचना आयोग के समक्ष पहुंचा और अब सूचना आयोग ने भारत के संस्कृति मंत्रालय से इस संबंध में जवाब मांगा है। इस मामले में देश भर की कई अदालतों में याचिका भी दाखिल की गई है। सुप्रीम कोर्ट में भी इसे लेकर याचिका दायर की गई थी जिसे खारिज कर दिया गया था। सूचना आयुक्त श्रीधर आचार्यलु ने एक हालिया आदेश में कहा कि मंत्रालय को इस मुद्दे पर विवाद खत्म करना चाहिए और सफेद संगमरमर से बने इस ऐतिहासिक मकबरे के बारे में संदेह दूर करना चाहिए।

अब आइये बताते है की पुरातन सर्वेक्षण विभाग जो के 1874 में बना है उसने अपने एक संस्करण में क्या लिखा है ?

ASI 1874: शाहजहां ने तेजोमहालय में जो तोड़फोड़ और हेराफेरी की, उसका एक सूत्र सन् 1874 में प्रकाशित पुरातत्व खाते (आर्किओलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया) के वार्षिक वृत्त के चौथे खंड में पृष्ठ 216 से 17 पर अंकित है। उसमें लिखा है कि हाल में आगरा के वास्तु संग्रहालय के आंगन में जो चौखुंटा काले बसस्ट का प्रस्तर स्तंभ खड़ा है वह स्तंभ तथा उसी की जोड़ी का दूसरा स्तंभ उसके शिखर तथा चबूतरे सहित कभी ताजमहल के उद्यान में प्रस्थापित थे।

हिन्दू मंदिर प्रायः नदी या समुद्र तट पर बनाए जाते हैं। ताज भी यमुना नदी के तट पर बना है, जो कि शिव मंदिर के लिए एक उपयुक्त स्थान है। शिव मंदिर में एक मंजिल के ऊपर एक और मंजिल में दो शिवलिंग स्थापित करने का हिन्दुओं में रिवाज था, जैसा कि उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर और सोमनाथ मंदिर में देखा जा सकता है। कुछ ऐसा ही ताजमहल में एक कब्र तहखाने में और एक कब्र उसके ऊपर की मंजिल के कक्ष में है।

जिन संगमरमर के पत्थरों पर कुरान की आयतें लिखी हुई हैं उनके रंग में पीलापन है जबकि शेष पत्थर ऊंची गुणवत्ता वाले शुभ्र रंग के हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि कुरान की आयतों वाले पत्थर बाद में लगाए गए हैं। ताज के दक्षिण में एक प्राचीन पशुशाला है। वहां पर तेजोमहालय की पालतू गायों को बांधा जाता था। मुस्लिम कब्र में गाय कोठा होना एक असंगत बात है।

ताजमहल में चारों ओर चार एक समान प्रवेशद्वार हैं, जो कि हिन्दू भवन निर्माण का एक विलक्षण तरीका है जिसे कि चतुर्मुखी भवन कहा जाता है। ताजमहल में ध्वनि को गुंजाने वाला गुम्बद है। हिन्दू मंदिरों के लिए गूंज उत्पन्न करने वाले गुम्बजों का होना अनिवार्य है। बौद्धकाल में इसी तरह के शिव मंदिरों का अधिक निर्माण हुआ था। ताजमहल का गुम्बद कमल की आकृति से अलंकृत है। आज हजारों ऐसे हिन्दू मंदिर हैं, जो कि कमल की आकृति से अलंकृत हैं। ताजमहल के गुम्बद में सैकड़ों लोहे के छल्ले लगे हुए हैं जिस पर बहुत ही कम लोगों का ध्यान जा पाता है। इन छल्लों पर मिट्टी के आलोकित दीये रखे जाते थे जिससे कि संपूर्ण मंदिर आलोकमय हो जाता था।

कई इतिहासकारों ने भी माना है की सुन्दरता का यह बेहद नायाब नमूना ताजमहल या मकबरा न होकर शिव मंदिर है जिसका नाम तेजो महल या तेजोमहालय था। विस्तार से समझने की कोशिश करते है की कुछ भारतीय अव्वल दर्जे के इतिहासकार बिना किसी अंग्रेजों के लिखे इतिहास की मदद लिए अपने सर्वेक्षण और अध्ययन में क्या पाते है।

प्रसिद्ध शोधकर्ता और इतिहासकार पुरुषोत्तम नागेश ओक अपनी पुस्तक “TAJ MAHAL – THE TRUE STORY” द्वारा इस बात में विश्वास रखते हैं कि, सारा विश्व इस धोखे में है कि खूबसूरत इमारत ताजमहल को मुग़ल बादशाह शाहजहाँ ने बनवाया था। ओक कहते हैं कि ताजमहल प्रारम्भ से ही बेगम मुमताज का मकबरा न होकर,एक हिंदू प्राचीन शिव मन्दिर है जिसे तब तेजोमहालय कहा जाता था। अपने अनुसंधान के दौरान ओक ने खोजा कि इस शिव मन्दिर को शाहजहाँ ने जयपुर के महाराज जय सिंह से अवैध तरीके से छीन लिया था और इस पर अपना कब्ज़ा कर लिया था।

शाहजहाँ के दरबारी लेखक “मुल्ला अब्दुल हमीद लाहौरी “ने अपने “बादशाहनामा” में मुग़ल शासक बादशाह का सम्पूर्ण वृतांत 1000 से ज़्यादा पृष्ठों में लिखा है। जिसके खंड एक के पृष्ठ 402 और 403 पर इस बात का उल्लेख है कि, शाहजहाँ की बेगम मुमताज-उल-ज़मानी जिसे मृत्यु के बाद, बुरहानपुर मध्य प्रदेश में अस्थाई तौर पर दफना दिया गया था और इसके 06 माह बाद,तारीख़ 15 ज़मदी-उल- अउवल दिन शुक्रवार,को अकबराबाद आगरा लाया गया फिर उसे महाराजा जयसिंह से लिए गए,आगरा में स्थित एक असाधारण रूप से सुंदर और शानदार भवन (इमारते आलीशान) में पुनः दफनाया गया,लाहौरी के अनुसार राजा जयसिंह अपने पुरखों कि इस आली मंजिल से बेहद प्यार करते थे ,पर बादशाह के दबाव में वह इसे देने के लिए तैयार हो गए थे। इस बात कि पुष्टि के लिए यहाँ ये बताना अत्यन्त आवश्यक है कि जयपुर के पूर्व महाराज के गुप्त संग्रह में वे दोनों आदेश अभी तक रक्खे हुए हैं जो शाहजहाँ द्वारा ताज भवन समर्पित करने के लिए राजा जयसिंह को दिए गए थे।

क्या मुमताज के नाम पर रखा मुमताज महल?

पुरुषोत्तम लिखते हैं कि ‘महल’ शब्द मुस्लिम शब्द नहीं है। अरब, ईरान, अफगानिस्तान आदि जगह पर एक भी ऐसी मस्जिद या कब्र नहीं है जिसके बाद महल लगाया गया हो । यह भी गलत है कि मुमताज के कारण इसका नाम मुमताज महल पड़ा, क्योंकि उनकी बेगम का नाम था मुमता-उल-जमानी। यदि मुमताज के नाम पर इसका नाम रखा होता तो ताजमहल के आगे से मुम को हटा देने का कोई औचित्य नजर नहीं आता।

किसी भवन का नामकरण किसी महिला के नाम के आधार पर रखने के लिए केवल अन्तिम आधे भाग (ताज)का ही प्रयोग किया जाए और प्रथम अर्ध भाग (मुम) को छोड़ दिया जाए यह समझ से परे है।

ओक दावा करते हैं कि, ताजमहल नाम तेजोमहालय का बिगड़ा हुआ संस्करण है, साथ ही साथ ओक कहते हैं कि मुमताज और शाहजहाँ कि प्रेम कहानी, चापलूस इतिहासकारों की भयंकर भूल और लापरवाह पुरातत्वविदों की सफ़ाई से स्वयं गढ़ी गई कोरी अफवाह मात्र है क्योंकि शाहजहाँ के समय का कोई शासकीय अभिलेख इस प्रेम कहानी की पुष्टि नहीं करता है ।

उस वक्त के भ्रमणकारियों ने उनकी यात्रा दौरान विश्व प्रसिद्ध ताजमहल के निर्माण का कोई उल्लेख नहीं किया है :

  • यूरोपियन यात्री जॉन अल्बर्ट मैनडेल्स्लो ने सन् 1638 (मुमताज कि मृत्यु के 07 साल बाद) में आगरा भ्रमण किया और इस शहर के सम्पूर्ण जीवन वृत्तांत का वर्णन किया, परन्तु उसने ताज के बनने का कोई भी सन्दर्भ नहीं प्रस्तुत किया, जबकि भ्रांतियों में यह कहा जाता है कि ताज का निर्माण कार्य 1631 से 1651 तक जोर शोर से चल रहा था।
  • फ्रांसीसी यात्री फविक्स बर्निअर एम.डी. जो औरंगजेब द्वारा गद्दीनशीन होने के समय भारत आया था और लगभग दस साल यहाँ रहा,के लिखित विवरण से पता चलता है कि,औरंगजेब के शासन के समय यह झूठ फैलाया जाना शुरू किया गया कि ताजमहल शाहजहाँ ने बनवाया था।
  • ताजमहल के सम्बन्ध में यह आम किवदंत्ती प्रचलित है कि ताजमहल के अन्दर मुमताज की कब्र पर सदैव बूँद बूँद कर पानी टपकता रहता है,, यदि यह सत्य है तो पूरे विश्व में किसी की भी कब्र पर बूँद बूँद कर पानी नही टपकाया जाता, जबकि प्रत्येक हिंदू शिव मन्दिर में ही शिवलिंग पर बूँद बूँद कर पानी टपकाने की व्यवस्था की जाती है, फ़िर ताजमहल (मकबरे) में बूँद बूँद कर पानी टपकाने का क्या मतलब?

क्या ताजमहल को सच्चे प्यार की निशानी कहना ठीक है? क्या शाहजहां और मुमताज में प्रेम था?

भारतीय इतिहास के पन्नों में यह लिखा है कि ताजमहल को शाहजहां ने मुमताज के लिए बनवाया था। वह मुमताज से प्यार करता था। दुनिया भर में ताजमहल को प्रेम का प्रतीक माना जाता है, लेकिन कुछ इतिहासकार इससे इत्तफाक नहीं रखते हैं। उनका मानना है कि ताजमहल को शाहजहां ने नहीं बनवाया था वह तो पहले से बना हुआ था। उसने इसमें हेर-फेर करके इसे इस्लामिक लुक दिया। दरअसल, इसे शाहजहां और मुमताज का मकबरा माना जाता है।

पुरुषोत्तम अनुसार क्योंकि शाहजहां ने मुमताज के लिए दफन स्थान बनवाया और वह भी इतना सुंदर तो इतिहासकार मानने लगे कि निश्चित ही फिर उनका मुमताज के प्रति प्रेम होना ही चाहिए। तब तथाकथित इतिहासकारों और साहित्यकारों ने इसे प्रेम का प्रतीक लिखना शुरू कर दिया। उन्होंने उनकी गाथा को लैला-मजनू, रोमियो-जूलियट जैसा लिखा जिसके चलते फिल्में भी बनीं और दुनिया भर में ताजमहल प्रेम का प्रतीक बन गया। यह आज तक जारी है।

ताजमहल को अगर  हटाकर देखा जाए तो ऐसी कोई भी ऐतिहासिक कहानी प्रचलित नहीं है जिसमें लैला मजनू जैसा शाहजहाँ और मुमताज के किस्से कहानी प्रसिद्ध हो। केवल ताजमहल का उल्लेख आने पर ही शाहजहाँ –मुमताज की प्रेमकहानी की याद क्यों आती है। अगर इतना ही प्रेम था तो बाकियों की तरह उनकी भी प्रेम के किस्से इतिहास में होने चाहिए थे। जो की कहीं भी देखने या पढ़ने को नहीं मिलता।

मुमताज बादशाह की चौथी बीवी थी। मुमताज की सुन्दरता को देखकर बादशाह ने उसके पति को मारकर उसे अपनी चौथी बीवी बनाया था। मुमताज ने कुल बादशाह के 14 बच्चों को जन्म दिया और अपने 14 वे बच्चे के जन्म के समय उसकी मृत्यु हुई थी। लेकिन इसके बाद जो किया उससे बादशाह शाहजहाँ और मुमताज के प्रेम की पोल खुलने लगती है। शाहजहाँ ने मुमताज के मरने के बाद उसकी बहन से शादी कर ली थी। अगर इतना ही प्रेम था तो उसके प्रेम के सहारे पूरा जीवन व्यतीत करना चाहिए था लेकिन ऐसा हुआ नहीं तो इसमें प्यार कहाँ था?

ताजमहल के हिन्दू मंदिर होने के तमाम सबूत इतिहास में मौजूद

इतिहासकार पुरुषोत्तम ओक ने अपनी किताब में लिखा है कि ताजमहल के हिन्दू मंदिर होने के कई सबूत मौजूद हैं। सबसे पहले यह कि मुख्य गुम्बद के किरीट पर जो कलश वह हिन्दू मंदिरों की तरह है। यह शिखर कलश आरंभिक 1800 ईस्वी तक स्वर्ण का था और अब यह कांसे का बना है। आज भी हिन्दू मंदिरों पर स्वर्ण कलश स्थापित करने की परंपरा है। यह हिन्दू मंदिरों के शिखर पर भी पाया जाता है। इस कलश पर चंद्रमा बना है। अपने नियोजन के कारण चन्द्रमा एवं कलश की नोक मिलकर एक त्रिशूल का आकार बनाती है, जो कि हिन्दू भगवान शिव का चिह्न है। इसका शिखर एक उलटे रखे कमल से अलंकृत है। यह गुम्बद के किनारों को शिखर पर सम्मिलन देता है।

बादशाह शाहजहां द्वारा ताजमहल बनाने के कोई सबूत मौजूद नहीं

इतिहास में पढ़ाया जाता है कि ताजमहल का निर्माण कार्य 1632 में शुरू और लगभग 1653 में इसका निर्माण कार्य पूर्ण हुआ। अब सोचिए कि जब मुमताज का इंतकाल 1631 में हुआ तो फिर कैसे उन्हें 1631 में ही ताजमहल में दफना दिया गया, जबकि ताजमहल तो 1632 में बनना शुरू हुआ था। यह सब मनगढ़ंत बाते हैं जो अंग्रेज और मुस्लिम इतिहासकारों ने 18वीं सदी में लिखी।

दरअसल 1632 में हिन्दू मंदिर को इस्लामिक लुक देने का कार्य शुरू हुआ। 1649 में इसका मुख्य द्वार बना जिस पर कुरान की आयतें तराशी गईं। इस मुख्य द्वार के ऊपर हिन्दू शैली का छोटे गुम्बद के आकार का मंडप है और अत्यंत भव्य प्रतीत होता है। आस पास मीनारें खड़ी की गई और फिर सामने स्थित फव्वारे को फिर से बनाया गया।

कार्बन टेस्ट : ताज के नदी के तरफ के दरवाजे के लकड़ी के एक टुकड़े की एक अमेरिकी प्रयोगशाला में की गई कार्बन जांच से पता चला है कि लकड़ी का वो टुकड़ा शाहजहां के काल से 300 वर्ष पहले का है, क्योंकि ताज के दरवाजों को 11वीं सदी से ही मुस्लिम आक्रामकों द्वारा कई बार तोड़कर खोला गया है और फिर से बंद करने के लिए दूसरे दरवाजे भी लगाए गए हैं।

ताजमहल के गुम्बद पर जो अष्टधातु का कलश खड़ा है वह त्रिशूल आकार का पूर्ण कुंभ है। उसके मध्य दंड के शिखर पर नारियल की आकृति बनी है। नारियल के तले दो झुके हुए आम के पत्ते और उसके नीचे कलश दर्शाया गया है। उस चंद्राकार के दो नोक और उनके बीचोबीच नारियल का शिखर मिलाकर त्रिशूल का आकार बना है। हिन्दू और बौद्ध मंदिरों पर ऐसे ही कलश बने होते हैं। कब्र के ऊपर गुंबद के मध्य से अष्टधातु की एक जंजीर लटक रही है। शिवलिंग पर जल सिंचन करने वाला सुवर्ण कलश इसी जंजीर पर टंगा रहता था। उसे निकालकर जब शाहजहां के खजाने में जमा करा दिया गया तो वह जंजीर लटकी रह गई।

पहले कहते थे इसे तेजोमहालय?

पुरुषोत्तम नागेश ओक ने ताजमहल पर शोधकार्य करके बताया कि ताजमहल को पहले ‘तेजोमहालय’ कहते थे। वर्तमान ताजमहल पर ऐसे 700 चिन्ह खोजे गए हैं जो इस बात को दर्शाते हैं कि इसका रिकंस्ट्रक्शन किया गया है। इसकी मीनारें बहुत बाद के काल में निर्मित की गई। वास्तुकला के विश्वकर्मा वास्तुशास्त्र नामक प्रसिद्ध ग्रंथ में शिवलिंगों में ‘तेज-लिंग’ का वर्णन आता है। ताजमहल में ‘तेज-लिंग’ प्रतिष्ठित था इसीलिए उसका नाम ‘तेजोमहालय’ पड़ा था।

शाहजहां के समय यूरोपीय देशों से आने वाले कई लोगों ने भवन का उल्लेख ‘ताज-ए-महल’ के नाम से किया है, जो कि उसके शिव मंदिर वाले परंपरागत संस्कृत नाम ‘तेजोमहालय’ से मेल खाता है। इसके विरुद्ध शाहजहां और औरंगजेब ने बड़ी सावधानी के साथ संस्कृत से मेल खाते इस शब्द का कहीं पर भी प्रयोग न करते हुए उसके स्थान पर पवित्र मकबरा शब्द का ही प्रयोग किया है।

ओक के अनुसार हुमायूं, अकबर, मुमताज, एतमातुद्दौला और सफदरजंग जैसे सारे शाही और दरबारी लोगों को हिन्दू महलों या मंदिरों में दफनाया गया है। इस बात को स्वीकारना ही होगा कि ताजमहल के पहले से बने ताज के भीतर मुमताज की लाश दफनाई गई न कि लाश दफनाने के बाद उसके ऊपर ताज का निर्माण किया गया।

ताजमहल (तेजोमहालय मंदिर) का वह गुप्त स्थान जिसमें छुपे हो सकते है सैकड़ों राज?

इतिहासकार ओक के अनुसार ताज एक सात मंजिला भवन है। शहजादे औरंगजेब के शाहजहां को लिखे पत्र में भी इस बात का विवरण है। भवन की चार मंजिलें संगमरमर पत्थरों से बनी हैं जिनमें चबूतरा, चबूतरे के ऊपर विशाल वृत्तीय मुख्य कक्ष और तहखाने का कक्ष शामिल है। मध्य में दो मंजिलें और हैं जिनमें 12 से 15 विशाल कक्ष हैं। संगमरमर की इन चार मंजिलों के नीचे लाल पत्थरों से बनी दो और मंजिलें हैं, जो कि पिछवाड़े में नदी तट तक चली जाती हैं। सातवीं मंजिल अवश्य ही नदी तट से लगी भूमि के नीचे होनी चाहिए, क्योंकि सभी प्राचीन हिन्दू भवनों में भूमिगत मंजिल हुआ करती है।

नदी तट के भाग में संगमरमर की नींव के ठीक नीचे लाल पत्थरों वाले 22 कमरे हैं जिनके झरोखों को शाहजहां ने चुनवा दिया है। इन कमरों को, जिन्हें कि शाहजहां ने अति गोपनीय बना दिया है, भारत के पुरातत्व विभाग द्वारा तालों में बंद रखा जाता है। सामान्य दर्शनार्थियों को इनके विषय में अंधेरे में रखा जाता है। ऐसा भी हो सकता है कि वहां पर संस्कृत के शिलालेख भी हों। यह सुनिश्चित करने के लिए कि ताजमहल हिन्दू चित्र, संस्कृत शिलालेख, धार्मिक लेख, सिक्के तथा अन्य उपयोगी वस्तुओं जैसे कौन-कौन-से साक्ष्य छुपे हुए हैं, उसकी सातों मंजिलों को खोलकर साफ-सफाई कराने की नितांत आवश्यकता है।

फ्रांसीसी यात्री बेर्नियर ने लिखा है कि ताज के निचले रहस्यमय कक्षों में गैर मुस्लिमों को जाने की इजाजत नहीं थी, क्योंकि वहां चौंधिया देने वाली वस्तुएं थीं। यदि वे वस्तुएं शाहजहां ने खुद ही रखवाई होती तो वह जनता के सामने उनका प्रदर्शन गौरव के साथ करता। नदी के पिछवाड़े में हिन्दू बस्तियां, बहुत से हिन्दू प्राचीन घाट और प्राचीन हिन्दू शवदाह गृह हैं। यदि शाहजहां ने ताज को बनवाया होता तो इन सबको नष्ट कर दिया गया होता।

राजनीतिक भर्त्सना के डर से इंदिरा सरकार ने ओक की सभी पुस्तकें स्टोर्स से वापस ले लीं थीं और इन पुस्तकों के प्रथम संस्करण को छापने वाले संपादकों को भयंकर परिणाम भुगत लेने की धमकियां भी दी गईं थीं। अब विचार करने वाली बात यह है कि यदि इतिहासकार ओक और उपयुक्त सभी अनुसंधान सत्य है तो किसी देशी राजा के बनवाए गए संगमरमरी आकर्षण वाले खूबसूरत,शानदार एवं विश्व के महान आश्चर्यों में से एक भवन, “तेजोमहालय” को बनवाने का श्रेय बाहर से आए मुग़ल बादशाह शाहजहाँ को क्यों दिया जाना चाहिए?

अब प्रो. पी.एन. ओक के अनुसंधान को ग़लत सिद्ध करने का केवल एक ही रास्ता है कि वर्तमान केन्द्र सरकार बंद कमरों को संयुक्त राष्ट्र के पर्यवेक्षण में खुलवाए, और अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों को छानबीन करने दिया जाना चाहिए जिससे दूध का दूध और पानी का पानी हो जायेगा। और इसके उपरांत सरकार को इस मुद्दे पर विवाद खत्म करना चाहिए और सफेद संगमरमर से बने इस ऐतिहासिक मकबरे के बारे में संदेह दूर करना चाहिए।

References:

https://www.oneindia.com/india/taj-mahal-or-tejo-mahalay-what-is-the-real-story/articlecontent-pf29732-2519632.html

https://www.stephen-knapp.com/true_story_of_the_taj_mahal.htm

http://www.hindustantimes.com/india-news/is-the-taj-mahal-a-mausoleum-or-a-shiva-temple-cic-tells-government-to-clarify/story-bYyd6mFUmFbrIjOJnbP9CI.html

https://www.booksfact.com/archeology/taj-mahal-original-name-tejo-mahalaya-ancient-siva-temple-built-1155-ad.html

https://www.outlookindia.com/website/story/the-claim-taj-mahal-is-tejo-mahalaya-temple-palace-is-concocted-and-self-built-c/303703 

http://www.harekrsna.de/taj-mahal/tejo-mahalaya.html

https://www.dailyo.in/politics/taj-mahal-supreme-court-temple-shah-jahan/story/1/19483.html

http://www.krishnapath.org/photographic-evidence-taj-mahal-a-vedic-temple/

 

Tags: ताजमहलतेजोमहालयशाहजहाँहिंदू मंदिर
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