क्या ये एनडीटीवी के अंत की शुरुआत है?

एनडीटीवी

लगता है एनडीटीवी का बुरा समय और वित्तीय संकट गहराता जा रहा है उसने अपनी सहायक कंपनी रेड पिक्सेल्स (Red Pixels) में 7.38% की हिस्सेदारी अपने दिल्ली दफ्तर परिसर के भूस्वामी एआर चढ्ढा ऐंड कंपनी को बेच दी है।

एनडीटीवी अपनी वित्तीय संकट को पूरा करने के लिए भ्रामक खबरें, गलतफहमी पैदा करने और फेक न्यूज़ को दिखाने हेतु बार-बार उजागर हुआ है। ये लेनदेन सिर्फ आम वित्तीय लेनदेन नहीं है बल्कि अपने खर्चों और किरायों के भुगतान को पूरा करने के लिए कंपनी की मजबूरी है। इससे जाहिर होता है कि ये मीडिया कंपनी वित्तीय संकट से जूझ रही है। वास्तव में, मीडिया कंपनी ने आधिकारिक तौर पर एक बीएसई (बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज) फाइलिंग में कहा था कि कंपनी बिक्री से मिले पैसों का उपयोग किराये के भुगतान और कंपनी कार्यशैली को बढ़ाने के लिए किया करेगी।

वैसे ये पहली बार नहीं है जब एनडीटीवी की हताश वित्तीय स्थिति की वजह से मीडिया आउटलेट्स को शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा हो और उसकी कम होती विश्वसनीयता के कारण दर्शकों की संख्या में भारी गिरावट आई हो। दरअसल, पिछले साल दर्शकों की संख्या में गिरावट की वजह से कंपनी ने लागत-कटौती और टर्नअराउंड योजना का सहारा लिया था। एनडीटीवी ने मुख्य क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित करने के लिए अपनी पुनर्गठन रणनीति के तहत 25 प्रतिशत स्टाफ में कटौती की घोषणा की थी। ये एनडीटीवी की तरफ से उसके बुरे समय की शुरुआत का पहला संकेत था। एनडीटीवी नॉन-कोर बिजनेस वर्टिकल से बाहर निकल रहा है। इससे जाहिर होता है कि वो कैसे प्रतिकूल समय में बने रहने के लिए संघर्ष कर रही है, इसका राजनीतिक संरक्षण भी अब सत्ता में नहीं है। कंपनी को कुछ बड़े झटकों ने हिला कर रख दिया है, इसके शेयरहोल्डर्स ने ऑटोमोबाइल प्राइवेट लिमिटेड को अपनी ऑटोमोबाइल ई-कॉमर्स फर्म, ‘फिफ्थ गियर वेंचर्स’ की बिक्री के लिए मंजूरी दे दी है, कंपनी के शेयरहोल्डर्स ने एनडीटीवी के एथनिक रिटेल लिमिटेड से नामेह होटल और रिसोर्ट प्राइवेट लिमिटेड का भी निपटारा किया है।

एनडीटीवी ने खुद को अनैतिक मीडिया आउटलेट की वजह से उत्पन्न हुए संकट के लिए जिम्मेदार ठहराया है। जिस तरह एनडीटीवी का झुकाव एक विशेष राजनीतिक संरक्षक की ओर था उसी झुकाव ने उसे इस संकट की स्थिति में डाला है। दर्शकों को इस मीडिया कंपनी का एजेंडा समझ आ गया था जोकि निष्पक्षता से काफी दूर निकल चुकी थी और इस एजेंडा संचालित पत्रकारिकता से दर्शक तंग आ गये थे

एनडीटीवी के रविश कुमार और बरखा दत्त जैसे पत्रकारों को एजेंडा संचालित पत्रकारिकता के लिए काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था और उन्होंने कभी भी अपने अंतर्निहित पक्षपात और भेदभाव की भावना को नहीं छुपाया। एनडीटीवी कभी भी पत्रकारिता और विचारधाराओं के बीच अपनी प्राथमिकता को प्राप्त करने में सफल नहीं रहा है। उस दौरान भी ये अन्य मीडिया आउटलेट्स पर आधारहीन नैतिक श्रेष्ठता का दावा करती रही लेकिन दर्शकों को ये रास नहीं आया। एनडीटीवी का हमेशा ही स्पष्ट राजनीतिक विचार था। हालांकि, फिर भी दूसरों पर लगातार ये आरोप मढ़ते रहे कि वो बीजेपी एजेंडा पर चलते हैं। समय के साथ आंकड़ों में एनडीटीवी और दर्शकों के जुड़ाव में कमी भी नजर आने लगी। एनडीटीवी 24×7 पिछले साल इंग्लिश न्यूज़ चैनल्स की लिस्ट में फिसल कर पांचवे स्थान पर आ गया। इससे वित्तीय घाटे की स्थिति साफ दिखाई देती है। सितंबर 2017 में एनडीटीवी को 23 करोड़ का घाटा हुआ था जो दर्शाता है वो किस बुरे दौर से गुजर रही है।

पिछले साल कंपनी ने अपनी नॉन-कोर बिज़नस वर्टिकल सम्पति को बेचा था और इस बार कंपनी ने अपने खर्चों को पूरा करने के लिए अपनी सहायक कंपनी को बेचा है। हम इसकी बुरी स्थिति से वाकिफ है लेकिन कोई भी ये कल्पना नहीं कर सकता था कि इसका अंत इतनी जल्दी आ जायेगा। वैसे फेक न्यूज़ और भ्रमित करने वाली खबरों को दिखाने वाली मीडिया के लिए एक बढ़िया उदाहरण होगा। हालांकि, कई फंडिंग विकल्प भी हैं जोकि उन मीडिया आउटलेट्स के लिए खुले हैं जो कुछ राजनीतिक गुटों के प्रति नर्म रवैया रखती हैं लेकिन लगता है कि एनडीटीवी को वांछित स्रोतों से भी राहत नहीं मिल रही है।

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