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‘फना’ से लेकर ‘पद्मावत’ तक- जब बॉलीवुड छाप लिबरलों ने एकतरफा विरोध किया

Shivam Chauhan द्वारा Shivam Chauhan
19 December 2019
in चलचित्र
बॉलीवुड
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नागरिकता संशोधन कानून पर बवाल थमने का नाम नहीं ले रहा है। देश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन जारी है। दिल्ली को छोड़ दें तो उत्तर मध्य भारत के कुछ हिस्सों में विरोध हो रहा है। इसी क्रम में बॉलीवुड के कुछ बुद्धिजीवी लोग भी इस प्रदर्शन से जुड़ गए हैं। जिन्होंने अपने हितों के अनुसार सुविधाजनक विरोध का रास्ता चुना है।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया के उत्पाती छात्रों द्वारा की गई बर्बरता पर दिल्ली पुलिस ने कड़ा एक्शन लिया। जिससे बॉलीवुड के कुछ लिबरल गैंग्स को काफी तकलीफ पहुंची है। इस गैंग में सबसे आगे दिखीं प्रियंका चोपड़ा जो लिबरलों की चहेती हैं। उन्होंने ट्वीट कर लिखा- ‘हर बच्चे के लिए शिक्षा हमारा सपना है। शिक्षा ही उन्हें स्वतंत्र रूप से विचार करने के काबिल बनाती है। हमने उन्हें आवाज उठाने के लिए बड़ा किया है। एक स्वतंत्र लोकतंत्र में, शांति से आवाज उठाना और उसका हिंसा से मिलना गलत है। हर आवाज गिनी जाती है। और हर आवाज भारत के बदलाव के लिए कार्य करेगी।’

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pic.twitter.com/rA8PmJTRH7

— PRIYANKA (@priyankachopra) December 18, 2019

हालांकि, सीलमपुर क्षेत्र में हुई हिंसा पर उनकी चुप्पी ने उन्हें बेनकाब कर दिया। बॉलीवुड ने सुविधानुसार इस कानून का विरोध किया। बॉलीवुड के एलिट क्लास के लोंगो की यह पुरानी परंपरा है कि वे अपने प्रचार के लिए प्रोपेगेंडावादी विरोध करते हैं। यकिन न हो तो आप यहां देख सकते हैं कि वे कैसे काम करते हैं।

90 के दशक के बाद जब दीपा मेहता की फायर और वाटर जैसी फिल्मों ने बॉलीवुड फिल्मों के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किया, जिसमें कथित तौर पर हिंदू समुदाय का गलत चित्रण किया गया था। इसी तरह फिल्म वाटर का भी विरोध हुआ। वास्तव में, फिल्म ’वाटर’ का विरोध, जो ब्रिटिश भारत में विधवाओं की दुर्दशा पर केंद्रित था, इतना भयंकर था कि निर्माताओं को भारत में अपना प्रोजेक्ट पूरी तरह से रद्द करना पड़ा और श्रीलंका में आगे की शूटिंग की गई। साल 2006 में लगभग सात साल बाद रिलीज़ होने के बाद भी, फिल्म के खिलाफ हिंसक विरोध प्रदर्शन ने फिल्म को पूरी तरह से बर्बाद कर दिया।

इसी तरह आमीर खान की फिल्म फना का भी बड़े स्तर पर विरोध हुआ। यहीं से भारतीय मीडिया का ध्यान बॉलीवुड की विवादित फिल्मों पर पड़ने लगा। यह एक औसत फिल्म थी। जिसे बॉलीवुड के एलिट क्लास के लोगों ने सेक्युलरिज्म के लिए हथियार बनाकर इस्तेमाल किया। हालांकि फिल्म के विरोध का कारण फिल्म ही नहीं था बल्कि नर्मदा बचाओ गैंग में आमीर खान शामिल थे इसलिए भी उस समय उनका खूब विरोध हुआ। नतीजतन, फिल्म को गुजरात में बैन कर दिया गया। इसके बाद बॉलीवुड ने इसे सांप्रदायिक मोड़ देना शुरू किया गया और मेन स्ट्रीम मीडिया ने भी इस मसले पर उनका साथ दिया। यह सिर्फ गुजरात में तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी की सरकार को गिराने का दो कौड़ी का प्रयास था।

इसी तरह साल 2007 में परजानिया नाम की एक फिल्म सामने आई, जो गुजरात के 2002 वाले दंगे पर थी। इस फिल्म में केवल एक पक्ष को ही फोकस में रखकर दिखाया गया था। हालांकि राज्य सरकार ने बाद में इसे बैन कर दिया।

अगर किसी को लगता है कि हिंदू आतंकवाद का प्रचार 2008 में सामने आया तो यह एक राजनीतिक उपक्रम था। लेकिन यह तथ्य गलत नहीं था। मुंबई हमले 26/11 के लिए आरएसएस को दोषी ठहराने में महेश भट्ट जैसे लोगों की भागीदारी को और क्या समझा जाएगा? 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के एक साल से भी कम समय में बॉलीवुड के एलिट क्लास के लोगों ने ‘असहिष्णुता’ के पूरे प्रचार को कैसे प्रायोजित किया, इस पर हमें विस्तार से बताने की जरूरत नहीं है।

जब लोगों ने 2014 में ‘पीके’ में हिन्दूपोबिया का विरोध किया, उसके बाद जब फिल्म पद्मावत का विरोध किया तो यही बॉलीवुड के बुद्धिजीवियों ने कहा कि हमारी आजादी का हनन हो रहा है। इन्ही लोगों ने उस समय राजपूतों की शान को कला के नाम पर धूमिल करने का प्रयास किया, तब उन्हें शर्म नहीं आई। लेकिन पीके के विरोध करने पर इसी बॉलीवुड के राजपूत एक्टर ने नाम के आगे से राजपूत शब्द तक हटा लिया था। जबकि फरहान अख्तर जैसे लिबरलों ने इसी राजपूत समुदाय को आतंकियों के रूप में पेश करने का प्रयास किया।

हालांकि यही बॉलीवुड के बुद्धिजीवी अपने सुविधा अनुसार मुद्दों को चुनकर कहते हैं कि हमारी आवाज दबाई जा रही है, हमें देश में डर लग रहा है। देश में असहिष्णुता बढ़ गई है। लेकिन जब एक दूसरे पक्ष की बात सामने आती है तो यही बॉलीवुड के एलिट लोग मुंह पर फेविकोल गिरा लेते हैं।

इसका एक उदाहरण है साल 2005 में आई फिल्म ‘सिन्स’, जिसमें शाइनी आहूजा लीड रोल में थे। इस फिल्म में दिखाया गया था कि कैसे दक्षिण भारत के कैथोलिक चर्चों में यौन हिंसा व्याप्त है। इस फिल्म का विरोध सभी चर्चों ने किया, नतीजतन फिल्म को स्थाई रूप से बैन कर दिया गया। फिल्म के बैन होने पर किसी ने कुछ नहीं बोला। बॉलीवुड के एलिट क्लास के लोगों ने अपने मुंह पर हथौड़ा मार लिया। तब इन्हें यह नहीं महसूस हुआ कि इनकी आजादी का हनन हो रहा है।

सच कहें तो बॉलीवुड के बुद्धिजीवियों का पाखंड अब बेनकाब हो चुका है। ये लोग एक खास वर्ग द्वारा किए जा रहे हिंसा को उचित ठहरा रहे हैं लेकिन पुलिस पर जो हमला किया जा रहा है वो इन्हें नहीं दिखता। बस, ट्रक, ट्रेन आग में धू-धू करके जल रही हैं लेकिन इन्हें दिखाई नहीं देता। अगर इनका यही पाखंड आगे भी चलता रहा तो ‘खान तिकड़ी की तरह ही परिणाम भुगतना पड़ेगा।

Tags: असहिष्णुताजामिया हिंसाबॉलीवुडलिबरल
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