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पश्चिम एशिया वैश्विक कूटनीति की सबसे कठिन परीक्षा है, प्रधानमंत्री मोदी और भारत इस परीक्षा के लिए कितने तैयार हैं?

मौजूदा संकट के बीच भारत ईरान के साथ-साथ खाड़ी देशों से भी अच्छे रिश्ते बने हुए हैं, इन समानांतर रिश्तों को संतुलित रखना आसान नहीं है, लेकिन मोदी ऐसा कर पाने में काफी हद तक कामयाब रहे हैं

Anshuman द्वारा Anshuman
29 March 2026
in अर्थव्यवस्था, चर्चित, भारत, भू-राजनीति, वेस्ट एशिया
पश्चिम एशिया वैश्विक कूटनीति की सबसे कठिन परीक्षा है, प्रधानमंत्री मोदी और भारत इस परीक्षा के लिए कितने तैयार हैं?

भारत ने दिखाया है कि कठिन हालात में भी अगर नीति व्यावहारिक हो, तो जरूरी जरूरतों को पूरा किया जा सकता है

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फरवरी 2026 में शुरू हुए संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच टकराव के अचानक उभरने से, जिसकी शुरुआत अमेरिका– इजरायल द्वारा ईरानी परमाणु ठिकानों पर हमलों से हुई और जिसके जवाब में तेहरान ने खाड़ी क्षेत्र के बुनियादी ढांचे पर मिसाइल हमले किए। इस पूरे घटनाक्रम ने पूरे पश्चिम एशिया को एक नए अस्थिर दौर में धकेल दिया है। तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाला जहाजी व्यापार बार–बार बाधित हो रहा है, और एक बार फिर यह क्षेत्र दुनिया को यह याद दिला रहा है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को झकझोरने की इसकी क्षमता कितनी गहरी है।

इन सभी तनावों के बीच इस क्षेत्र में भारत के हित बहुत बड़े हैं। सबसे अहम है तेल और ऊर्जा पर उसकी निर्भरता, उसके बाद खाड़ी देशों में रहने वाले भारतीयों की सुरक्षा और वहां से आने वाला पैसा और फिर गहराते कूटनीतिक रिश्ते। ऐसे हालात में भारत की विदेश नीति की मजबूती और उसका संतुलन यह दोनों ही भारत के लिए कठिन परीक्षा की घड़ी है। ध्यान देने वाली बात यह है कि पिछले कई दशकों से भारत एक ऐसी नीति पर चल रहा है, जिसे आसान भाषा में कहें तो संतुलन बनाकर सबके साथ रिश्ते रखना कहा जा सकता है। यानी भारत ने खुद को किसी एक गुट या देश तक सीमित नहीं किया, बल्कि एक साथ ईरान, खाड़ी देशों, इजरायल और अमेरिका सभी से अच्छे संबंध बनाए रखे हैं। जियोपॉलिटिक्स में अक्सर कहा जाता है कि ऐसा संतुलन बनाए रखना मुश्किल होता है, लेकिन जब संकट आता है तो यही नीति सबसे ज्यादा काम आती है। अभी के टकराव में भी भारत ने बहुत सोच–समझकर कदम उठाए हैं जैसे भारत ने सबसे शांति बनाए रखने की अपील की, अपने आर्थिक हितों का ध्यान रखा और सभी पक्षों से बातचीत जारी रखी। इस तरह भारत ने अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और लंबे समय के हितों दोनों को सुरक्षित रखने की कोशिश की है।

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वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच भारत का संतुलन
ईरान–अमेरिका टकराव से पैदा हुए इस संकट का सबसे पहला और सीधा असर आर्थिक मोर्चे पर दिखाई देता है। भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का करीब 88 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है, इसलिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में किसी भी तरह की रुकावट का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। यह समुद्री रास्ता दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है, जहां से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल गुजरता है। जब इस रास्ते से तेल ले जाने वाले टैंकरों की आवाजाही कम होती है या खतरे में पड़ती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें तेजी से बढ़ने लगती हैं। इसका सीधा असर भारत के आयात बिल पर पड़ता है, जिससे महंगाई बढ़ने, रुपये पर दबाव आने और आम लोगों की जेब पर असर पड़ने की आशंका बढ़ जाती है। पेट्रोल–डीजल के दाम से लेकर रोजमर्रा की चीजों तक, हर स्तर पर इसका असर महसूस किया जा सकता है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में भारत सरकार ने इस तरह के संकट से निपटने के लिए तैयारी की है। ऊर्जा स्रोतों को अलग–अलग देशों में फैलाने यानी डायवर्सिफिकेशन और रणनीतिक तेल भंडार बनाने पर खास जोर दिया गया है। यही वजह है कि मौजूदा संकट के बावजूद भारत पूरी तरह से असहज स्थिति में नहीं है। देश के पास लगभग दो महीने की जरूरत के बराबर पेट्रोलियम भंडार मौजूद है, जो आपात स्थिति में काम आता है। इसके अलावा, भारत ने रूस, अमेरिका और अन्य देशों से भी तेल की आपूर्ति बढ़ाकर अपने विकल्प खुले रखे हैं। इस रणनीति की वजह से अचानक पैदा हुए इस असंतुलन को काफी हद तक संभालने में मदद मिली है और तत्काल आपात जैसी स्थिति से बचा हुआ है।

इस पूरे घटनाक्रम से एक बात बिल्कुल साफ हो जाती है कि आज के दौर में ऊर्जा सुरक्षा कोई विकल्प नहीं, बल्कि मजबूरी और प्राथमिक आवश्यकता बन चुकी है। खासकर भारत जैसे देश के लिए, जिसकी आर्थिक विकास की रफ्तार काफी हद तक बाहर से आने वाले तेल और ईंधन पर निर्भर करती है, ऐसे संकट भविष्य में भी चुनौती बने रहेंगे। इसलिए लंबे समय की ठोस योजना, अलग–अलग देशों से ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करना और पर्याप्त तेल भंडार तैयार रखना ही उपाय है और इन्हीं उपायों के सहारे ऐसी आपात स्थितियों का असर कम किया जा सकता है और अर्थव्यवस्था को स्थिर रखा जा सकता है।

जटिल रणनीतिक चुनौतियां और कमाल का कूटनीतिक संतुलन

भारत और ईरान के बीच आर्थिक संबंध इस मुश्किल समय में भी समझदारी और व्यावहारिक तरीके से बनाए रखे गए हैं। भले ही अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के चलते रुपये के बदले तेल का पुराना व्यापार बंद हो गया हो, लेकिन भारत ने एक वैकल्पिक रास्ता निकालते हुए ह्यूमैनेटेरियन विंडो के तहत रियायती दरों पर ईरान से एलपीजी की आपूर्ति जारी रखी। करीब 5 लाख टन एलपीजी की यह आपूर्ति भारत के लिए बेहद अहम साबित हुई, क्योंकि इससे अचानक उपजे संकट को टालने में मदद मिली। इस तरह की रणनीति ने भारत को बिना किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय दबाव में आए हुए अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक हिस्सा यानी लगभग 5 प्रतिशत ईरान से बनाए रखने में मदद दी। भारत की इस रणनीति से दिखता है कि कठिन हालात में भी अगर नीति व्यावहारिक हो, तो जरूरी जरूरतों को पूरा किया जा सकता है।

यही नहीं वैश्विक तनावों के बीच भारत ने अपने दूसरे विकल्पों को भी लगातार मजबूत किया है। संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब जैसे देशों के साथ ग्रीन हाइड्रोजन और अन्य ऊर्जा क्षेत्रों में करीब 10 अरब डॉलर का निवेश इस दिशा में एक बड़ा कदम है। इससे न सिर्फ ऊर्जा के नए स्रोत और रास्ते खुल रहे हैं, बल्कि भारत एक भरोसेमंद और दीर्घकालिक साझेदार के रूप में भी उभर रहा है। साफ है कि इससे आने वाले समय में भारत की ऊर्जा सुरक्षा और ज्यादा मजबूत होगी। इस संकट का एक और बेहद महत्वपूर्ण पहलू खाड़ी देशों में रहने वाले भारतीयों की सुरक्षा और उनके हितों से जुड़ा है। पश्चिम एशिया में लगभग एक करोड़ भारतीय काम करते हैं, और उनके द्वारा भेजा गया पैसा यानी रेमिटेंस भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बहुत अहम है। ऐसे में क्षेत्रीय संघर्ष का कोई भी असर वह चाहे हवाई सेवाओं में बाधा हो या फिर आर्थिक गतिविधियों में कमी हो या बुनियादी ढांचे पर खतरा सीधे इन भारतीय प्रवासियों के जीवन पर पड़ता है। इसी को ध्यान में रखते हुए, जैसे ही हालात बिगड़ने लगे, भारत के विदेश मंत्रालय ने तेजी से कदम उठाए। संभावित प्रभावित क्षेत्रों से अपने नागरिकों को सुरक्षित निकालने की योजनाएं तैयार की गईं और आपातकालीन सहायता की व्यवस्था की गई। यह दिखाता है कि भारत के लिए यह मुद्दा सिर्फ रणनीतिक नहीं, बल्कि अपने नागरिकों की सुरक्षा से जुड़ी एक मानवीय जिम्मेदारी भी है। भारत–ईरान संबंध इस पूरे परिदृश्य में एक संवेदनशील लेकिन महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। पश्चिमी प्रतिबंधों और भू–राजनीतिक तनावों के बावजूद, भारत ने हमेशा ईरान को ऊर्जा सुरक्षा और मध्य एशिया तक पहुंच के लिहाज से एक अहम साझेदार माना है। चाबहार बंदरगाह जैसी परियोजनाएं इसी दीर्घकालिक सोच का हिस्सा हैं। मौजूदा संकट के बावजूद भारत ने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि ईरान के साथ सहयोग पूरी तरह प्रभावित न हो। दूसरी ओर, भारत संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब जैसे खाड़ी देशों के साथ अपने आर्थिक और निवेश संबंधों को भी तेजी से मजबूत कर रहा है। इन समानांतर रिश्तों को संतुलित रखना आसान नहीं है, लेकिन यही संतुलन भारत को कूटनीतिक लचीलापन और विकल्प देता है।

रणनीतिक दृष्टि से यह संकट क्षेत्रीय संपर्क (connectivity) परियोजनाओं के महत्व को भी रेखांकित करता है। चाबहार बंदरगाह, जो अंतरराष्ट्रीय उत्तर–दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) से जुड़ा है, भारत के लिए मध्य एशिया और उससे आगे के बाजारों तक पहुंच का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। इसके साथ ही खाड़ी देशों और इजरायल के साथ उभरती आर्थिक और सुरक्षा साझेदारियां भारत की बदलती क्षेत्रीय भूमिका को भी दर्शाती हैं। इन सबके बीच में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इन सभी पहलुओं को कैसे एक–दूसरे के पूरक के रूप में विकसित किया जाए, न कि प्रतिस्पर्धी ध्रुवों के रूप में।

कूटनीतिक स्तर पर भारत ने सावधानीपूर्ण तटस्थता का रुख अपनाया है। विदेश मंत्रालय ने लगातार संयम, संवाद और तनाव कम करने की अपील की है। वैश्विक स्तर पर यह रुख भारत को सभी पक्षों के साथ ना सिर्फ जो़डे रखता बल्कि उसे किसी एक पक्ष के समर्थक के रूप में देखे जाने से बचाता है। वर्तमान समय में जब जहां प्रतिस्पर्धा और अविश्वास गहरे हो रहे हैं तब यह संतुलित नीति भारत की विश्वसनीयता को बढ़ाती है।

दूरगामी और बहुआयामी परिप्रेक्ष्य में देखें तो भारत की पश्चिम एशिया नीति अब परिपक्व होती दिखाई दे रही है। यह क्षेत्र अब केवल ऊर्जा आपूर्ति का स्रोत नहीं रहा, बल्कि एक जटिल रणनीतिक मंच बन चुका है, जहां आर्थिक, राजनीतिक और सुरक्षा हित आपस में गहराई से जुड़े हैं। मौजूदा हालात या संकट से साफ तौर पर देखा जा सकता है कि अलग–अलग देशों के साथ रिश्ते बनाकर और परिस्थितियों के हिसाब से अपनी कूटनीति को बदलकर चलना ही सबसे बेहतर तरीका है।

आखिर में, अमेरिका–ईरान का टकराव फिर से यह दिखाता है कि पश्चिम एशिया की अस्थिरता दुनिया पर असर डालती रहेगी। भारत के लिए असली चुनौती इससे पूरी तरह बचना नहीं है, क्योंकि हकीकत में यह संभव नहीं है बल्कि इसे समझदारी, संतुलन और साफ रणनीति के साथ संभालना ही समझदारी है। भारत की अब तक की प्रतिक्रिया यह दिखाती है कि भारत समझता है कि आज की दुनिया में प्रभाव केवल किसी का पक्ष चुनने से नहीं, बल्कि सभी पक्षों से संवाद बनाए रखने की रणनीति से आता है। जियोपॉलिटिकल दृष्टिकोण में भारत का यह संतुलित रवैया किसी कमजोरी का संकेत नहीं, बल्कि एक उभरती हुई शक्ति की रणनीतिक परिपक्वता का प्रमाण है। चुनौतियां निश्चित रूप से मौजूद हैं, लेकिन भारत जैसे तेज से उभरते राष्ट्र के लिए संतुलन केवल अस्तित्व की रणनीति नहीं बल्कि प्रभाव और नेतृत्व की असली पहचान बन चुका है।

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5 August 2026

5 अगस्त 2019 की तारीख सिर्फ एक कानूनी संशोधन की तारीख नहीं थी। संसद ने अनुच्छेद 370 और धारा 35- ए हटाकर जम्मू-कश्मीर को दो...

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