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BRICS Explained: क्या अमेरिकी डॉलर से दूर जा रही है दुनिया ?

क्या डॉलर की पकड़ कमजोर हो रही है?  यह सवाल पिछले कुछ समय से वैश्विक आर्थिक बहस के केंद्र में है

Sambhrant Mishra द्वारा Sambhrant Mishra
12 September 2026
in अर्थव्यवस्था, भू-राजनीति, रणनीति, विश्व
BRICS 2026 में PM Modi, Putin and Xi Jinping

BRICS समिट के दौरान एक साथ PM मोदी, राष्ट्रपति पुतिन और राष्ट्रपति जिनपिंग

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क्या डॉलर की पकड़ कमजोर हो रही है?  यह सवाल पिछले कुछ समय से वैश्विक आर्थिक बहस के केंद्र में है। BRICS देशों की बढ़ती ताकत, स्थानीय मुद्राओं में कारोबार और डॉलर से दूरी यानी ‘डी–डॉलराइज़ेशन’ की चर्चाओं ने इस बहस को और तेज कर दिया है। लेकिन अगर आप मान रहे हैं कि दुनिया तेजी से अमेरिकी डॉलर को छोड़ रही है, तो कम से कम आंकड़े इसकी तस्दीक नहीं करते हैं।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी IMF के आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों के पास मौजूद विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की हिस्सेदारी 2025 के अंत में 56.4 प्रतिशत थी, जो 2026 की शुरुआत में बढ़कर 57.1 प्रतिशत हो गई। यानी जिस समय BRICS को डॉलर के विकल्प तैयार करने की कोशिशों के लिए सबसे ज्यादा चर्चा मिल रही है, उसी दौरान वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की हिस्सेदारी बढ़ी है।
तो आखिर वास्तविकता क्या है? क्या BRICS सचमुच डॉलर की पकड़ को चुनौती दे रहा है, या डॉलर से दूरी की पूरी कहानी अभी हेडलाइंस तक ही सीमित है।

BRICS आखिर कर क्या रहा है?

BRICS की शुरुआत ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के एक ढीले समूह के तौर पर हुई थी। बाद में इसमें ईरान, मिस्र, इथियोपिया, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया जैसे देश शामिल हुए। इसके विस्तार के साथ BRICS का आर्थिक और जनसांख्यिकीय वजन काफी बढ़ गया है और यह दुनिया की करीब आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाला समूह बन गया है।

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भारत इस समय BRICS की अध्यक्षता कर रहा है और इस वर्ष शिखर सम्मेलन का मेजबान भी नई दिल्ली ही है।
BRICS
से जुड़ी सबसे ज्यादा चर्चा जिस मुद्दे को लेकर होती है, वह है डॉलर से दूरी यानी ‘डी–डॉलराइज़ेशन’। इसका सीधा अर्थ है आपसी व्यापार में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करना और राष्ट्रीय मुद्राओं में ज्यादा कारोबार करना।

हालांकि इस दिशा में कुछ वास्तविक बदलाव भी हुए हैं।

रूस और चीन के बीच होने वाले व्यापार का बड़ा हिस्सा अब आपसी करंसी जैसे ‘रूबल’ और ‘युआन’ में तय होता है। दोनों देशों के बीच करीब 90 प्रतिशत व्यापार का स्थानीय मुद्राओं में निपटारा किए जाने का आंकड़ा अक्सर इस बदलाव के उदाहरण के तौर पर दिया जाता है। यानी कम से कम रूस–चीन व्यापार में डॉलर की भूमिका पहले की तुलना में काफी कम हुई है।
कुछ यही हाल भारत–रूस के बीच व्यापार का भी है, जहां दोनों देश स्थानीय मुद्राओं में बड़े स्तर पर व्यापार कर रहे हैं।

इसके अलावा BRICS भुगतान प्रणाली जैसे वैकल्पिक भुगतान तंत्र विकसित करने की कोशिश भी हो रही है। इसका उद्देश्य BRICS देशों की राष्ट्रीय भुगतान प्रणालियों को आपस में जोड़ना और सीमा–पार भुगतान के लिए पारंपरिक पश्चिमी बैंकिंग ढांचे पर निर्भरता कम करना है। इसमें चीन की CIPS और भारत की UPI जैसी भुगतान प्रणालियां महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।

अगर केवल इन घटनाओं को देखें तो ऐसा लगता है कि BRICS किसी बड़े बदलाव की नींव रख रहा है। लेकिन पूरी तस्वीर देखने पर कहानी कहीं ज्यादा जटिल नजर आती है।

डॉलर के सामने BRICS की चुनौती कितनी बड़ी है?

दुनिया के मुद्रा बाजारों को समझने के लिए बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स यानी BIS का सर्वेक्षण सबसे महत्वपूर्ण आंकड़ों में से एक है। BIS हर तीन साल में वैश्विक विदेशी मुद्रा बाजार का व्यापक सर्वेक्षण करता है।
इसके नवीनतम सर्वेक्षण में अमेरिकी डॉलर दुनिया के करीब 89 प्रतिशत विदेशी मुद्रा लेन–देन में शामिल था। यह आंकड़ा कम नहीं हुआ है। बल्कि पिछले सर्वेक्षण की तुलना में इसमें मामूली बढ़ोतरी हुई है।

केंद्रीय बैंकों के विदेशी मुद्रा भंडार में भी डॉलर की स्थिति मजबूत बनी हुई है। इसकी हिस्सेदारी 57 प्रतिशत से ज्यादा है और जैसा कि ऊपर बताया गया, हालिया आंकड़ों में यह हिस्सेदारी और भी बढ़ी है।

अब इसकी तुलना चीन की मुद्रा ‘युआन’ से करें। BRICS देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ाने की तमाम कोशिशों के बावजूद युआन अभी भी वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार में 2 प्रतिशत से कम हिस्सेदारी रखता है।

यही वह आंकड़ा है जो डॉलर से दूरी की वास्तविक स्थिति को समझने में मदद करता है।

BRICS देशों के बीच डॉलर के इस्तेमाल में कमी आ सकती है। रूस और चीन अपने कारोबार का बड़ा हिस्सा रूबल और युआन में कर सकते हैं। कुछ देश अपनी–अपनी स्थानीय मुद्रा में भुगतान की व्यवस्था बना सकते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वैश्विक वित्तीय व्यवस्था से डॉलर की भूमिका खत्म हो रही है।

दरअसल, डॉलर अभी भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार, विदेशी मुद्रा बाजारों और केंद्रीय बैंकों के भंडार में सबसे महत्वपूर्ण मुद्रा बना हुआ है।

भारत और रूस का रुख़ क्या है ?

भारत BRICS का एक प्रमुख सदस्य है, लेकिन नई दिल्ली डॉलर को हटाने के विचार को लेकर काफी सावधानी बरतता रहा है। भारतीय विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया है कि भारत की ऐसी कोई नीति नहीं है जिसका उद्देश्य डॉलर को ‘ग्लोबल रिज़र्व करंसी’ के रूप में हटाना हो। भारत ने कई मौकों पर डॉलर की भूमिका को वैश्विक वित्तीय स्थिरता के संदर्भ में भी स्वीकार किया है।

इसका अर्थ यह है कि भारत BRICS के भीतर वैकल्पिक भुगतान व्यवस्थाओं और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार का समर्थन कर सकता है, लेकिन इसका मतलब मौजूदा वैश्विक वित्तीय व्यवस्था को खत्म करना नहीं है।

रूस का रुख भी उतना सीधा नहीं है जितना सोशल मीडिया पर अक्सर दिखाई देता है। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी कहा है कि रूस डॉलर के खिलाफ कोई युद्ध नहीं लड़ रहा। मॉस्को ने वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्थाएं विकसित करने की कोशिश मुख्य रूप से इसलिए तेज की है क्योंकि पश्चिमी प्रतिबंधों ने उसके लिए पारंपरिक वित्तीय माध्यमों तक पहुंच को सीमित कर दिया है।

यानी रूस के लिए डॉलर से दूरी सिर्फ वैचारिक परियोजना नहीं है। यह एक रणनीतिक जरूरत भी है।

BRICS की साझा मुद्रा से कितना बदलेगा वैश्विक वित्तीय ढांचा?

इसके बाद आता है वह मुद्दा जिसने BRICS को लेकर सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरी हैं, यानी एक संभावित BRICS मुद्रा।

BRICS की एक साझा मुद्रा को लेकर कई वर्षों से चर्चा होती रही है। कभी इसे गोल्ड बैक्ड करंसी के रूप में देखा गया, तो कभी एक साझा इकाई या भुगतान व्यवस्था की तरह। लेकिन इन चर्चाओं और वास्तविक क्रियान्वयन के बीच अभी काफी दूरी है।
“
यूनिट” जैसे प्रस्तावों को लेकर चर्चा जरूर हुई है और कुछ छोटे स्तर के परीक्षणों की बातें भी सामने आई हैं, लेकिन अभी तक ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं है कि कोई BRICS मुद्रा बड़े पैमाने पर डॉलर या किसी प्रमुख वैश्विक मुद्रा की जगह ले रही है।

यही वजह है कि इस पूरे बदलाव को किसी “डॉलर खत्म करने वाली क्रांति” के रूप में देखना फिलहाल जल्दबाजी होगी।

ज्यादा सही तस्वीर यह है कि BRICS धीरे–धीरे एक ऐसी वित्तीय व्यवस्था तैयार करने की कोशिश कर रहा है, जिसमें उसके सदस्य देशों के पास पश्चिमी वित्तीय व्यवस्था के बाहर भी कुछ विकल्प मौजूद हों।

दरअसल किसी मुद्रा को वैश्विक आरक्षित मुद्रा बनने के लिए केवल बड़ी अर्थव्यवस्था और बड़ी आबादी की जरूरत नहीं होती। इसके लिए गहरे और खुले वित्तीय बाजार, मुद्रा पर भरोसा, राजनीतिक स्थिरता, मजबूत संस्थाएं और दुनिया भर के निवेशकों का विश्वास चाहिए।
यही वह क्षेत्र है जहां डॉलर को चुनौती देना BRICS के लिए सबसे मुश्किल होगा।

आज भी दुनिया की वित्तीय व्यवस्था डॉलर–केंद्रित है। अंतरराष्ट्रीय भुगतान, बैंकिंग, विदेशी मुद्रा बाजार, वैश्विक निवेश और केंद्रीय बैंकों के विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की भूमिका इतनी गहरी है कि सिर्फ स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने से इसे बदला नहीं जा सकता।

इसलिए फिलहाल यह कहना ज्यादा सही होगा कि BRICS डॉलर को खत्म करने की कोशिश नहीं कर रहा, बल्कि डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करने के विकल्प तैयार कर रहा है।

क्या दुनिया अमेरिका से दूर जा रही है?

अगर सवाल यह है कि क्या दुनिया अचानक अमेरिकी डॉलर को छोड़ रही है, तो जवाब है, अभी नहीं। कम से कम उस नाटकीय तरीके से नहीं, जैसा कई बार हेडलाइंस में नज़र आता है ।
हां, बदलाव जरूर हो रहा है। कुछ देश स्थानीय मुद्राओं में ज्यादा व्यापार कर रहे हैं। रूस और चीन ने अपने द्विपक्षीय व्यापार में डॉलर की भूमिका काफी कम की है। BRICS वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों और वित्तीय ढांचे पर काम कर रहा है। प्रतिबंध झेल रहे देश अपने लिए नए वित्तीय रास्ते तलाश रहे हैं।

लेकिन दूसरी तरफ डॉलर की वैश्विक आरक्षित मुद्रा के रूप में स्थिति अभी भी बेहद मजबूत है। विदेशी मुद्रा बाजारों में उसकी भूमिका बनी हुई है और केंद्रीय बैंकों के भंडार में भी उसका हिस्सा किसी बड़े पतन की बजाय हालिया आंकड़ों में बढ़ा है।

इसलिए इसे ‘डी–डॉलराइज़ेशन’ न कह कर वित्तीय विविधीकरण कहा जाना चाहिए, जहां नए विकल्प तलाशे जा रहे हैं।

BRICS और उसके कुछ सदस्य देश ऐसी स्थिति चाहते हैं जिसमें उन्हें अंतरराष्ट्रीय व्यापार और भुगतान के लिए किसी एक मुद्रा या वित्तीय व्यवस्था पर पूरी तरह निर्भर न रहना पड़े।
हालांकि यह बदलाव भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। आज BRICS के पास डॉलर को हटाने की क्षमता नहीं है। लेकिन अगर आने वाले वर्षों में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ता है, वैकल्पिक भुगतान प्रणालियां ज्यादा मजबूत होती हैं, BRICS की वित्तीय संस्थाएं विस्तार करती हैं और सदस्य देशों के बीच आपसी भरोसा बढ़ता है, तो तस्वीर धीरे–धीरे बदल सकती है।

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The Ministry of Corporate Affairs (MCA) publishes enough data to show how India’s smaller businesses are structured. As of September 30, 2026, the MCA portal...

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