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Make in India के 12 साल: अब भारत का अगला मैन्युफैक्चरिंग मिशन क्या है? सेमीकंडक्टर से ग्लोबल सप्लाई चेन तक नजर

मोबाइल और डिफेंस से इलेक्ट्रॉनिक्स तक बदली मैन्युफैक्चरिंग की तस्वीर, लेकिन ‘भारत में असेंबली’ से आगे बढ़ने की चुनौती

Abhishek Sharma द्वारा Abhishek Sharma
25 September 2026
in अर्थव्यवस्था
Make in India के 12 साल: अब भारत का अगला मैन्युफैक्चरिंग मिशन क्या है? सेमीकंडक्टर से ग्लोबल सप्लाई चेन तक नजर
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25 सितंबर 2014 को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मेक इन इंडिया’ अभियान शुरू किया था, तब इसका लक्ष्य सिर्फ देश में ज्यादा सामान बनाना नहीं था। मकसद भारत को मैन्युफैक्चरिंग, डिजाइन और इनोवेशन का वैश्विक केंद्र बनाना, निवेश आकर्षित करना और देश की औद्योगिक क्षमता को मजबूत करना था। अब इस पहल को 12 साल पूरे हो चुके हैं और सरकार का दावा है कि इस दौरान इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल फोन, डिफेंस, फार्मा और ऑटोमोबाइल जैसे कई क्षेत्रों में भारत की उत्पादन क्षमता तेजी से बढ़ी है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी 25 सितंबर को कहा कि आज भारत में ज्यादा उत्पादन, ज्यादा निवेश और ज्यादा निर्यात हो रहा है।

लेकिन मेक इन इंडिया के 12 साल पूरे होने पर कहानी का दूसरा पक्ष भी सामने आया है। कांग्रेस ने सरकार के दावों पर सवाल उठाते हुए कहा है कि जिस बड़े निजी निवेश और व्यापक रोजगार वृद्धि की उम्मीद की गई थी, वह उस स्तर पर दिखाई नहीं दी। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने मैन्युफैक्चरिंग GVA और IIP के आंकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया कि कई वर्षों में मैन्युफैक्चरिंग की वृद्धि समग्र आर्थिक वृद्धि से पीछे रही। इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि भारत में उत्पादन कितना बढ़ा, बल्कि यह भी है कि क्या इस बढ़ोतरी ने बड़े पैमाने पर निवेश, रोजगार और घरेलू वैल्यू एडिशन को उसी अनुपात में बढ़ाया?

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मेक इन इंडिया का असली लक्ष्य क्या था?

मेक इन इंडिया को चार बड़े उद्देश्यों के साथ शुरू किया गया था—निवेश को बढ़ावा देना, इनोवेशन को बढ़ाना, बेहतर औद्योगिक ढांचा तैयार करना और भारत को मैन्युफैक्चरिंग का वैश्विक केंद्र बनाना। शुरुआती अभियान के बाद इसका विस्तार Make in India 2.0 के रूप में हुआ और फिलहाल यह 27 क्षेत्रों पर केंद्रित है, जिनमें 15 मैन्युफैक्चरिंग और 12 सर्विस सेक्टर शामिल हैं।

इस पूरी रणनीति में सिर्फ मेक इन इंडिया का लोगो या अभियान शामिल नहीं है। सरकार ने PLI यानी Production Linked Incentive, National Single Window System, PM GatiShakti, औद्योगिक पार्क, FDI सुधार, Land Bank और Ease of Doing Business जैसे कई कदमों को इसी व्यापक मैन्युफैक्चरिंग रणनीति से जोड़ा है। PLI योजनाओं के तहत मार्च 2026 तक 2.16 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश, 20.41 लाख करोड़ रुपये का उत्पादन और 14.39 लाख रोजगार पैदा होने की सरकारी जानकारी दी गई थी।

सबसे बड़ा बदलाव इलेक्ट्रॉनिक्स और मोबाइल में

अगर मेक इन इंडिया के असर को किसी एक सेक्टर में सबसे साफ देखना हो तो इलेक्ट्रॉनिक्स और मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग उसका बड़ा उदाहरण है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2014-15 में भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स का उत्पादन करीब 1.9 लाख करोड़ रुपये था, जो 2025-26 में बढ़कर 13.11 लाख करोड़ रुपये हो गया। यानी करीब सात गुना बढ़ोतरी।

मोबाइल फोन उत्पादन में इससे भी तेज वृद्धि हुई। 2014-15 में करीब 18,000 करोड़ रुपये का मोबाइल उत्पादन होता था, जो 2025-26 में बढ़कर करीब 6.27 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया। उत्पादन की मात्रा के लिहाज से भारत अब दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन निर्माता है।

यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मोबाइल फोन ऐसा सेक्टर है जहां भारत पहले आयात पर काफी निर्भर था। हालांकि यहां भी अगला सवाल यही है कि भारत में असेंबली बढ़ने के साथ-साथ कितने महत्वपूर्ण कंपोनेंट, चिप्स और मशीनरी देश में बन रहे हैं। सरकार अब इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट और सेमीकंडक्टर निर्माण पर इसी वजह से ज्यादा जोर दे रही है। 2026 में सरकार ने सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स की पूरी वैल्यू चेन तैयार करने पर जोर दिया है।

डिफेंस में बदली तस्वीर, लेकिन लक्ष्य अब और बड़ा

मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत का सबसे रणनीतिक असर रक्षा उत्पादन में दिखाई देता है। 2014-15 में भारत का रक्षा उत्पादन करीब 46,429 करोड़ रुपये था। 2025-26 में यह बढ़कर रिकॉर्ड 1.78 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया। रक्षा निर्यात भी 2013-14 के 686 करोड़ रुपये से बढ़कर 2025-26 में 38,424 करोड़ रुपये हो गया। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारतीय रक्षा उत्पाद अब 80 से ज्यादा देशों को निर्यात किए जा रहे हैं।

यानी भारत सिर्फ अपने लिए हथियार और रक्षा उपकरण बनाने की दिशा में नहीं बढ़ा है, बल्कि निर्यातक देश बनने की कोशिश भी कर रहा है। डिफेंस कॉरिडोर, सृजन पोर्टल, iDEX और निजी कंपनियों तथा MSMEs की बढ़ती भागीदारी इसी रणनीति का हिस्सा हैं।

लेकिन रक्षा क्षेत्र में भी आत्मनिर्भरता का मतलब हर चीज देश में बनना नहीं है। आधुनिक हथियार प्रणालियों में इंजन, सेंसर, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स और दूसरी महत्वपूर्ण तकनीकों की घरेलू क्षमता बढ़ाना अभी भी बड़ी चुनौती है।

फार्मा और मेडिकल डिवाइस में भी बढ़ी क्षमता

फार्मास्युटिकल सेक्टर में भारत पहले से ही एक बड़ा वैश्विक खिलाड़ी रहा है। सरकार के मुताबिक भारत दवाओं के उत्पादन की मात्रा के हिसाब से दुनिया में तीसरे और मूल्य के हिसाब से 11वें स्थान पर है। 2024-25 में फार्मा इंडस्ट्री का सालाना टर्नओवर 4,71,898 करोड़ रुपये रहा।

मेडिकल डिवाइस में भी घरेलू उत्पादन बढ़ा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2019-20 में करीब 28,000 करोड़ रुपये का घरेलू उत्पादन था, जो 2024-25 में बढ़कर 41,500 करोड़ रुपये हो गया। यह लगभग 48 फीसदी की वृद्धि है।

ऑटोमोबाइल में उत्पादन बढ़ा, लेकिन कहानी सिर्फ संख्या की नहीं

ऑटोमोबाइल भी भारत के बड़े मैन्युफैक्चरिंग सेक्टरों में शामिल है। सरकारी फैक्टशीट के मुताबिक 2024-25 में भारत में वाहनों का उत्पादन करीब 3.10 करोड़ यूनिट रहा। यह 2014-15 के मुकाबले 33 फीसदी अधिक है। लेकिन किसी देश की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को सिर्फ वाहन या मोबाइल की संख्या से नहीं मापा जा सकता। यह देखना भी जरूरी होता है कि उस उत्पाद में इस्तेमाल होने वाले कितने हिस्से देश में बनते हैं, कितनी तकनीक घरेलू है और कितना मूल्य भारत में जुड़ता है।

क्या मेक इन इंडिया का मतलब अब आत्मनिर्भर भारत है?

दोनों अवधारणाएं जुड़ी हुई हैं, लेकिन बिल्कुल एक जैसी नहीं हैं। मेक इन इंडिया का मूल जोर भारत में निवेश और उत्पादन बढ़ाने पर था, जबकि आत्मनिर्भर भारत में रणनीतिक क्षेत्रों में घरेलू क्षमता, सप्लाई चेन और आयात निर्भरता कम करने पर ज्यादा जोर है।

इसीलिए आज सरकार मोबाइल से लेकर सेमीकंडक्टर, डिफेंस, दुर्लभ पृथ्वी के मैग्नेट और औद्योगिक मशीनरी तक घरेलू उत्पादन बढ़ाने की कोशिश कर रही है। सरकार का अगला लक्ष्य सिर्फ ‘भारत में असेंबल’ करना नहीं, बल्कि ज्यादा से ज्यादा ‘भारत में डिजाइन, भारत में कंपोनेंट और भारत से दुनिया को निर्यात’ करने की क्षमता बनाना है।

12 साल बाद असली परीक्षा क्या है?

मेक इन इंडिया के 12 साल बाद तस्वीर न तो केवल सफलता की कहानी है और न ही केवल असफलता का दावा। आंकड़े बताते हैं कि कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों में उत्पादन क्षमता में बड़ा विस्तार हुआ है—खासकर मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और डिफेंस में। वहीं आलोचना यह है कि इस बदलाव को व्यापक निजी निवेश, पर्याप्त रोजगार और सभी क्षेत्रों में समान मैन्युफैक्चरिंग विस्तार में बदलना अभी बाकी है।

इसलिए अगले कुछ सालों में असली सवाल यह होगा कि भारत कितना बनाता है से आगे बढ़कर कितना मूल्य भारत में जोड़ता है, कितने रोजगार पैदा करता है, कितनी तकनीक खुद विकसित करता है और दुनिया की सप्लाई चेन में कितनी गहराई से शामिल होता है।

12 साल पहले शुरू हुआ मेक इन इंडिया अब सिर्फ एक अभियान नहीं, बल्कि भारत की औद्योगिक नीति का बड़ा हिस्सा बन चुका है। इसकी अगली परीक्षा यही है कि मोबाइल और डिफेंस जैसी कुछ बड़ी सफलताओं को कितनी मजबूती से दूसरे क्षेत्रों तक फैलाया जा सकता है।

Tags: Atmanirbhar BharatDefence ExportsDefence productionelectronics manufacturingFDIIndia EconomyIndian ManufacturingMake in IndiaMake in India 12 YearsManufacturing Jobsmanufacturing sectorMobile ManufacturingNarendra ModiPLI Schemesemiconductor
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