राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सौ वर्ष की यात्रा भारतीय समाजजीवन में संगठन, अनुशासन, सेवा और राष्ट्रीय चेतना के विस्तार की महत्त्वपूर्ण गाथा है। 27 सितंबर 1925 को विजयादशमी के दिन डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में संघ की स्थापना की। उनके सामने एक ऐसे समाज के निर्माण का लक्ष्य था, जिसमें एकता, आत्मविश्वास, अनुशासन और राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना प्रबल हो। उनके मन में यह प्रश्न था कि प्राचीन सभ्यता, समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा और गौरवशाली इतिहास वाला भारत लंबे समय तक पराधीन क्यों रहा। उनके विचार में राष्ट्र की स्वतंत्रता और सामर्थ्य के लिए समाज का संगठित, जागरूक और चरित्रवान होना आवश्यक था।
इसी चिंतन ने संघ की कार्यपद्धति को आकार दिया। संघ ने दीर्घकालीन सामाजिक परिवर्तन को अपने कार्य का आधार बनाया। उसकी मान्यता रही कि राष्ट्र की स्थायी शक्ति उसके नागरिकों के चरित्र, सामाजिक एकता और कर्तव्यबोध से विकसित होती है। ऐसे नागरिक, जो अपने दायित्वों के प्रति सजग हों, समाज के साथ आत्मीय संबंध रखते हों और सामूहिक हित के लिए कार्य करने को तत्पर हों, राष्ट्रजीवन को सशक्त बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसी दृष्टि से व्यक्ति निर्माण, हिंदू समाज का संगठन और राष्ट्र के सर्वांगीण विकास की भावना संघ के कार्य के केंद्र में रही है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यपद्धति का सबसे विशिष्ट पक्ष उसकी दैनिक शाखा है। शाखा संघ के लिए व्यक्ति निर्माण का प्रमुख माध्यम है। यहाँ शारीरिक अभ्यास, खेल, योग, अनुशासन, सामूहिक गतिविधियों और बौद्धिक चर्चा के माध्यम से स्वयंसेवकों में सहयोग, आत्मविश्वास, समयपालन, नेतृत्व और संगठन की भावना विकसित करने का प्रयास किया जाता है।
शाखा की विशेषता उसकी नियमितता है। इसमें व्यक्ति विचारों को सुनने के साथ उन्हें अपने व्यवहार में उतारने का अभ्यास भी करता है। समय पर पहुँचना, सामूहिक नियमों का पालन करना, साथियों के साथ मिलकर काम करना, जिम्मेदारी निभाना और समाज के प्रति संवेदनशील रहना इस प्रक्रिया के महत्त्वपूर्ण अंग हैं। इसका उद्देश्य ऐसे स्वयंसेवक तैयार करना है, जो अपने दैनिक जीवन में अनुशासन, सेवा और कर्तव्यबोध का परिचय दें।
डॉ. हेडगेवार ने संगठन के विस्तार के लिए व्यक्तिगत संपर्क, कार्यकर्ताओं के निर्माण और नियमित प्रवास को विशेष महत्त्व दिया। उनकी दृष्टि में संगठन की वास्तविक शक्ति उसके कार्यकर्ताओं की गुणवत्ता, समर्पण और समाज के साथ उनके संबंधों में निहित थी। यही कारण है कि संघ की कार्यपद्धति में व्यक्ति के विकास और समाज के साथ उसके जीवंत संबंध को प्रमुख स्थान मिला।
संघ की दृष्टि में व्यक्ति निर्माण और राष्ट्र निर्माण एक-दूसरे के पूरक हैं। आत्मानुशासन, सामाजिक संवेदनशीलता और राष्ट्रीय उत्तरदायित्व से युक्त व्यक्ति अपने परिवार, कार्यक्षेत्र और समाज में सकारात्मक भूमिका निभा सकता है। ऐसे व्यक्तियों के सामूहिक प्रयास से संगठित और समर्थ समाज का निर्माण होता है।
संघ की स्थापना का घोषित उद्देश्य संपूर्ण हिंदू समाज का संगठन था। इसके पीछे यह विचार था कि सामाजिक विभाजन, पारस्परिक दूरी और सामूहिक चेतना के अभाव को दूर करके ही राष्ट्र की शक्ति का पूर्ण विकास किया जा सकता है। संगठन का अर्थ लोगों को एक मंच पर एकत्र करना भर नहीं है। इसका वास्तविक आशय समाज में परस्पर आत्मीयता, सहयोग और साझा उत्तरदायित्व की भावना विकसित करना है।
संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य श्री गुरुजी ने भी समाज के संगठन और समष्टि जीवन की भावना पर बल दिया। उनके चिंतन में व्यक्ति का जीवन समाज के व्यापक जीवन से जुड़ा हुआ है। समाज के सुख-दुःख को अपना मानना और उसकी उन्नति के लिए योगदान देना राष्ट्रीय जीवन को सशक्त बनाने का आधार है।
संघ के अनुसार, राष्ट्रभाव दैनिक आचरण, सामाजिक व्यवहार, कर्तव्यपालन और सार्वजनिक जीवन में उत्तरदायित्व के रूप में दिखाई देना चाहिए। देश के प्रति प्रेम का परिचय ईमानदारी से काम करने, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करने, सामाजिक सद्भाव बनाए रखने और आवश्यकता के समय दूसरों की सहायता करने से भी मिलता है। इस प्रकार संघ का उद्देश्य संगठन की सदस्य संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है। उसकी कार्यपद्धति ऐसे नागरिक तैयार करने पर केंद्रित है, जो राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना से परिचित हों, समाज के प्रति उत्तरदायी हों और सामूहिक हित के लिए सक्रिय योगदान दें।
संघ की स्थापना नागपुर में हुई और कुछ ही वर्षों में उसका कार्य अन्य क्षेत्रों तक पहुँचने लगा। प्रारंभिक वर्षों में समर्पित कार्यकर्ताओं को विभिन्न प्रांतों में भेजा गया। वर्धा, पुणे और महाराष्ट्र के अन्य क्षेत्रों से आगे बढ़ते हुए संघ की शाखाएँ देश के अनेक भागों में स्थापित होने लगीं। 1939 तक दिल्ली, पंजाब, बंगाल, बिहार, कर्नाटक तथा तत्कालीन मध्य प्रांत और बंबई प्रांत के विभिन्न क्षेत्रों में संघकार्य आरंभ हो चुका था। इस विस्तार में कार्यकर्ताओं का व्यक्तिगत संपर्क, निरंतर प्रवास और स्थानीय समाज के साथ संबंध स्थापित करने की पद्धति की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। नए स्थानों पर शाखाएँ शुरू करना, युवाओं को जोड़ना, स्थानीय कार्यकर्ताओं को तैयार करना और नियमित गतिविधियों को बनाए रखना इस प्रक्रिया के प्रमुख अंग थे।
संघ की विस्तार यात्रा का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि समय के साथ उसका कार्य महानगरों से आगे बढ़कर छोटे नगरों, कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुँचा। शाखाओं और सामाजिक गतिविधियों के माध्यम से स्थानीय स्तर पर संपर्क बढ़ाने का प्रयास किया गया। इस तरह संगठन का विस्तार भौगोलिक पहुँच के साथ कार्यकर्ताओं के निर्माण की प्रक्रिया भी बना। आँकड़ों के अनुसार, पहले देशभर में 51,740 स्थानों पर 83,129 शाखाएँ संचालित हो रही थीं। मार्च 2026 के आंकड़ों के अनुसार यह संख्या बढ़कर 55,683 स्थानों पर 88,949 शाखाओं तक पहुँच गई। इस अवधि में 3,943 नए स्थान जुड़े और शाखाओं की संख्या में 5,820 की वृद्धि हुई। ये आँकड़े संघ के संगठनात्मक विस्तार की व्यापकता को दर्शाते हैं।
समाज की आवश्यकताएँ अनेक प्रकार की हैं। शिक्षा, श्रम, कृषि, स्वास्थ्य, संस्कृति, विज्ञान, खेल और सामाजिक सेवा जैसे क्षेत्रों में विशिष्ट प्रयासों की आवश्यकता होती है। संघ से जुड़े विभिन्न संगठनों ने अपने-अपने कार्यक्षेत्रों में गतिविधियाँ विकसित की हैं। इनके माध्यम से समाज के विविध वर्गों तक पहुँचने और उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप कार्य करने का प्रयास किया जाता है। शिक्षा के क्षेत्र में विद्या भारती तथा भारतीय शिक्षण मंडल, विद्यार्थियों के बीच अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, श्रमिकों के बीच भारतीय मजदूर संघ और किसानों के बीच भारतीय किसान संघ सक्रिय हैं। राष्ट्रीय सेवा भारती शिक्षा, स्वास्थ्य, सेवा और स्वावलंबन से जुड़े कार्यों के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुँचती है। वनवासी कल्याण आश्रम जनजातीय समाज के विकास और सामाजिक सहभागिता पर केंद्रित है।
संस्कृति और साहित्य के क्षेत्र में संस्कार भारती तथा संस्कृत भारती जैसी संस्थाएँ कार्यरत हैं। स्वदेशी जागरण मंच आर्थिक स्वावलंबन और स्वदेशी के विचार को आगे बढ़ाता है। विज्ञान भारती विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में स्वदेशी दृष्टि को प्रोत्साहित करने का प्रयास करती है। आरोग्य भारती स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता, क्रीड़ा भारती खेलों के प्रसार, सक्षम दिव्यांगजनों के सशक्तीकरण और अधिवक्ता परिषद कानूनी तथा सामाजिक विषयों में सक्रिय है।
विश्व हिंदू परिषद धार्मिक-सांस्कृतिक विषयों और हिंदू समाज से संबंधित मुद्दों पर कार्य करती है। महिलाओं के व्यक्तित्व विकास, नेतृत्व, सेवा और राष्ट्रबोध के लिए राष्ट्र सेविका समिति सक्रिय है। इन संगठनों के कार्यक्षेत्र और कार्यपद्धतियाँ अलग-अलग हैं। व्यापक स्तर पर इनके माध्यम से समाज के विविध क्षेत्रों में सहभागिता और संगठन के प्रयास दिखाई देते हैं।
संघ की शताब्दी यात्रा के संदर्भ में पंच परिवर्तन का विचार विशेष महत्त्व रखता है। इसके पाँच आयाम हैं: सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्व का बोध अथवा स्वदेशी का आचरण तथा नागरिक कर्तव्यबोध और शिष्टाचार।
सामाजिक समरसता का उद्देश्य समाज के विभिन्न वर्गों के बीच आत्मीयता और परस्पर सम्मान को मजबूत करना है। जाति और अन्य सामाजिक भेदों से उत्पन्न दूरियों को कम करने के लिए व्यवहार में समानता और आपसी संपर्क आवश्यक हैं। कुटुंब प्रबोधन परिवार में संवाद, संस्कार, पारस्परिक सम्मान और उत्तरदायित्व को महत्त्व देता है। पर्यावरण संरक्षण जल बचाने, वृक्ष लगाने, स्वच्छता बनाए रखने, प्लास्टिक का उपयोग न करने और ऊर्जा का संयमित उपयोग करने जैसे दैनिक कार्यों से जुड़ा है। वहीं स्व का बोध और स्वदेशी का आचरण स्थानीय उत्पादन, घरेलू कौशल और आर्थिक स्वावलंबन को प्रोत्साहित करने की भावना से संबंधित है। नागरिक कर्तव्यबोध और शिष्टाचार का अर्थ है कि व्यक्ति अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी समझे तथा ईमानदारी, अनुशासन और सार्वजनिक संपत्ति के सम्मान को अपने जीवन में अपनाए।
पंच परिवर्तन का केंद्रीय विचार दैनिक जीवन में सकारात्मक बदलाव लाना है। व्यक्ति का व्यवहार, परिवार के संस्कार और समुदाय की सामूहिक जिम्मेदारी सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को गति देते हैं। यदि नागरिक अपने जीवन में इन मूल्यों को अपनाएँ, तो सामाजिक जीवन में व्यापक सकारात्मक परिवर्तन की संभावनाएँ बढ़ सकती हैं।
संक्षेप में कहें तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सौ वर्ष की यात्रा व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण की अखंड साधना की यात्रा है। शाखा में संस्कारित स्वयंसेवक, समाज के प्रति समर्पित कार्यकर्ता और राष्ट्र के प्रति अटूट निष्ठा इस कार्य की आधारशिला हैं। समाज के प्रत्येक वर्ग में आत्मीयता, समरसता और संगठन का भाव जाग्रत करते हुए संघ राष्ट्रजीवन को सशक्त बनाने के लिए निरंतर कार्यरत है।






























