देश की राजधानी दिल्ली में इन दिनों एक अलग ही माहौल बना हुआ है। आये दिन कुछ न कुछ घटित हो रहा है। अब तिरंगा लहराने के लिए जोर आजमाईश हो रही है। त्योहारों का समय है, इसलिए स्वाभाविक है ऐसे प्रदर्शनों के कारण लोगों के व्यवसाय भी प्रभावित हो रहे हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या तिरंगे जैसे राष्ट्रीय प्रतीक को अराजकता फ़ैलाने के लिए ढाल की तरह उपयोग करना उचित है? राष्ट्रीय प्रतीक किसी देश की पहचान अर्थात् उसके इतिहास, सभ्यतागत चेतना, सामूहिक गौरव और राष्ट्रीय अस्मिता के प्रतिनिधि होते हैं। भारत में तिरंगा, राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत वन्दे मातरम् और संविधान जैसे प्रतीक करोड़ों नागरिकों की आस्था, आकांक्षाओं और साझा राष्ट्रीय जीवन से जुड़े हैं। इनका सम्मान करना केवल औपचारिकता से अधिक राष्ट्र के प्रति अपने दायित्व को स्वीकार करना है। इसलिए राष्ट्रीय प्रतीकों का इस्तेमाल अराजकतावादी गतिविधियों को वैधता प्रदान करने या व्यवस्था-विरोधी एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। यदि ऐसा किया गया तो यह दुर्भाग्यपूर्ण है और राष्ट्र के साथ छल करना है।
लोकतंत्र में असहमति का अधिकार अनिवार्य है। सरकार की नीतियों की आलोचना करना, प्रशासन से प्रश्न पूछना, विरोध प्रदर्शन करना और परिवर्तन की माँग उठाना नागरिक स्वतंत्रता के महत्त्वपूर्ण अंग हैं। कोई भी लोकतंत्र तभी जीवंत रह सकता है, जब उसमें असहमति के लिए पर्याप्त स्थान हो। लेकिन ‘असहमति’ और ‘अराजकता’ के बीच एक स्पष्ट अंतर होता है। असहमति का उद्देश्य व्यवस्था की कमियों को उजागर करके उसमें सुधार लाना होता है, जबकि अराजकता का लक्ष्य कई बार भ्रम फैलाकर संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा करना, सार्वजनिक व्यवस्था को बाधित करना और समाज को टकराव की ओर धकेलना बन जाता है।
वर्तमान समय में इस अंतर को समझना अत्यंत आवश्यक है। जब कोई व्यक्ति या समूह अपने विचारों के समर्थन में राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान या संविधान का उल्लेख करता है, तो यह देखना भी आवश्यक है कि उसके आचरण और उद्देश्यों में इन प्रतीकों के प्रति सम्मान कितना वास्तविक है। क्या वह लोकतांत्रिक अधिकारों के साथ दूसरों के अधिकारों का भी सम्मान करता है? क्या वह कानून के शासन और संवैधानिक संस्थाओं में विश्वास रखता है? या राष्ट्रीय प्रतीकों की भावनात्मक शक्ति का उपयोग अपने ऐसे उद्देश्यों के लिए करता है, जो सामाजिक शांति और सार्वजनिक व्यवस्था को नुकसान पहुँचाते हैं?
राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान किसी राजनीतिक दल या सरकार की बपौती नहीं है। न ही इन प्रतीकों पर किसी एक विचारधारा का एकाधिकार हो सकता है। वे पूरे राष्ट्र के हैं। राष्ट्र और सरकार के बीच के अंतर को समझना लोकतांत्रिक परिपक्वता की पहली शर्त है। विरोध के नाम पर हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान, धमकी, जबरन काम बंद कराना या कानून को अपने हाथ में लेना लोकतांत्रिक अधिकारों की स्वतः स्वीकृत अभिव्यक्ति नहीं बन जाता।
भारत का संविधान नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान करता है। साथ ही, अनुच्छेद 51क में नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों का उल्लेख करते हुए संविधान का पालन करने तथा उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान करने की अपेक्षा की गई है। इसी प्रकार सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना और हिंसा से दूर रहना भी नागरिकों का मौलिक कर्तव्य है। अधिकारों और कर्तव्यों का यह संतुलन ही लोकतंत्र को स्थिरता प्रदान करता है। अधिकारों की चर्चा करते समय कर्तव्यों को पूरी तरह भुला देना और कर्तव्यों की बात करते हुए अधिकारों को दबा देना, दोनों ही लोकतांत्रिक भावना के प्रतिकूल हैं।
राष्ट्रीय प्रतीकों के संदर्भ में एक और समस्या तब उत्पन्न होती है, जब उन्हें राजनीतिक या वैचारिक संघर्ष का साधन बना दिया जाता है। किसी प्रदर्शन में तिरंगा लहराना अपने आप में उस प्रदर्शन के उद्देश्य को उचित सिद्ध नहीं करता। संविधान की प्रति हाथ में लेकर खड़े हो जाने मात्र से किसी गतिविधि की संवैधानिकता सुनिश्चित नहीं हो जाती। किसी राष्ट्रीय प्रतीक की उपस्थिति से अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि उस प्रतीक से जुड़े मूल्यों के प्रति व्यवहार में कितना सम्मान दिखाई देता है। स्वतंत्रता, समानता, न्याय, बंधुता और विधि का शासन संविधान के मूल आदर्शों में शामिल हैं। इन मूल्यों का सम्मान प्रतीकों के प्रदर्शन से आगे बढ़कर आचरण में दिखाई देना चाहिए।
समाज को भी इस विषय पर भावनात्मक प्रतिक्रिया के बजाय विवेकपूर्ण दृष्टिकोण अपनाना होगा। राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान और उनका राजनीतिक दुरुपयोग, दोनों ही सार्वजनिक विमर्श को दूषित कर सकते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि प्रतीकों के उपयोग, उनके पीछे के उद्देश्य और संबंधित आचरण का मूल्यांकन तथ्यों तथा संवैधानिक मूल्यों के आधार पर किया जाए।
भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में राष्ट्रीय प्रतीकों की भूमिका और भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है। भाषा, क्षेत्र, जाति, धर्म और राजनीतिक विचारों की विविधता के बीच वे साझा राष्ट्रीय पहचान का बोध कराते हैं। उनकी गरिमा बनाए रखने का अर्थ केवल उनके दृश्य स्वरूप की रक्षा करना तो है ही, इसके साथ ही उस राष्ट्रीय एकता और संवैधानिक भावना को सुदृढ़ करना भी है, जिसका वे प्रतिनिधित्व करते हैं। यदि इन प्रतीकों को राजनीतिक स्वार्थ, वैचारिक कट्टरता या अराजक गतिविधियों की ढाल बना दिया जाएगा, तो उनके प्रति समाज का विश्वास कमजोर होगा।
राष्ट्रीय प्रतीक राष्ट्र की साझा विरासत और संवैधानिक मर्यादाओं के स्मरणचिह्न हैं। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार सुरक्षित रहना चाहिए, लेकिन विरोध के नाम पर हिंसा या कानूनहीनता को स्वीकार नहीं किया जा सकता।


























