चार राज्यों के विधान परिषद चुनावों में कांग्रेस को ऐसा झटका लगा है, जिसका इस्तेमाल भाजपा ने राहुल गांधी के ‘वोट चोरी’ अभियान पर पलटवार करने के लिए किया है। उत्तर प्रदेश, बिहार, कर्नाटक और महाराष्ट्र की 28 सीटों पर हुए चुनावों में कांग्रेस अब तक एक भी सीट नहीं जीत सकी है। सबसे बड़ा झटका कर्नाटक में लगा, जहां सत्तारूढ़ कांग्रेस चारों सीटें हार गई। खास बात यह है कि ये चुनाव EVM से नहीं, बैलेट पेपर से हुए थे।
भाजपा ने इसी बिंदु को पकड़कर कांग्रेस पर तंज कसा है। उसका सवाल है कि जब चुनाव बैलेट पेपर से हुए, तब भी कांग्रेस को जीत क्यों नहीं मिली? भाजपा के मुताबिक, चुनाव में हार का ठीकरा EVM या चुनाव प्रक्रिया पर फोड़ने के बजाय कांग्रेस को अपनी राजनीतिक पकड़ और संगठन की स्थिति पर विचार करना चाहिए।
बैलेट पेपर के नतीजों से BJP को मिला जवाबी हमला करने का मौका
भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि बैलेट पेपर और बैलेट बॉक्स से चुनाव होने के बावजूद कांग्रेस अपनी मौजूदगी दर्ज नहीं करा सकी। भाजपा नेता प्रदीप भंडारी ने भी कहा कि EVM हो या बैलेट पेपर, मतदाता कांग्रेस को नकार रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इन चुनावों का जिक्र करते हुए सवाल किया कि बैलेट पेपर से हुए 28 सीटों के चुनाव में कांग्रेस को कितनी सीटें मिलीं।
कर्नाटक में सत्ता के बावजूद कांग्रेस का सूपड़ा साफ
कर्नाटक में भाजपा ने तीन सीटें जीतीं, जबकि उसकी सहयोगी जेडीएस ने बेंगलुरु शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की सीट कांग्रेस से छीन ली। इस तरह NDA ने सभी चार सीटों पर जीत दर्ज की। कांग्रेस को न केवल अपनी मौजूदा सीट गंवानी पड़ी, बल्कि भाजपा के कब्जे वाली सीटों पर भी सफलता नहीं मिली।
बिहार में भी कांग्रेस को झटका लगा। दरभंगा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में जन सुराज के उम्मीदवार सुरेश प्रसाद राय ने कांग्रेस के मौजूदा एमएलसी मदन मोहन झा को हराया। इससे जन सुराज ने बिहार विधान परिषद में अपना खाता खोला।
उत्तर प्रदेश में भाजपा और समाजवादी पार्टी ने सीटें जीतीं, जबकि महाराष्ट्र में मतगणना जारी थी। इन राज्यों के नतीजों को कांग्रेस की हार के साथ-साथ क्षेत्रीय दलों की स्थिति के संदर्भ में भी देखना होगा।
क्या ‘वोट चोरी’ के मुद्दे की हवा निकल गई?
राजनीतिक संदेश के स्तर पर भाजपा को कांग्रेस के खिलाफ एक मजबूत तर्क जरूर मिला है। बैलेट पेपर से हुए चुनावों में भी कांग्रेस का खाता नहीं खुलना उसके EVM-विरोधी अभियान पर सवाल खड़े करता है। भाजपा इसे इस बात के प्रमाण के तौर पर पेश कर रही है कि कांग्रेस की समस्या मतदान की मशीन नहीं, बल्कि मतदाताओं का समर्थन हासिल करने में उसकी नाकामी है।
इस लिहाज से कहा जा सकता है कि MLC चुनावों के नतीजों ने कांग्रेस के ‘वोट चोरी’ अभियान को राजनीतिक बचाव की मुद्रा में ला दिया है। कांग्रेस के सामने अब दोहरी चुनौती है: एक ओर उसे चार राज्यों में अपने कमजोर प्रदर्शन की वजह बतानी होगी, दूसरी ओर यह भी समझाना होगा कि बैलेट पेपर से हुए चुनावों में भी उसे जीत क्यों नहीं मिली।































