यदि आपसे एक बहुत सरल-सा प्रश्न पूछा जाए कि आपके दादा के परदादा का क्या नाम था? या क्या आपको अपने परिवार की 7वीं पीढ़ी के दादा-दादी (पूर्वजों) के नाम याद हैं? उनके जीवन, कार्यों और व्यक्तित्व के बारे में जानकारी है? तो आपका उत्तर क्या होगा..! संभवतः अधिकांश लोग कहेंगे, ‘नहीं पता’ ! संभव है कि कुछ लोगों को अपने दो-चार पीढ़ी पहले के पूर्वजों के बारे में जानकारी हो, लेकिन सातवीं पीढ़ी तक पहुँचते-पहुँचते स्मृतियाँ धुंधली पड़ जाती हैं। हो सकता है आपके माता-पिता को कुछ अनुमान हो ! किंतु आश्चर्य की बात है कि हम सभी ‘महर्षि वाल्मीकि’ का नाम अवश्य जानते हैं। परंपरा से जिनकी जयंती आज की तिथि अर्थात् आश्विन पूर्णिमा को प्रतिवर्ष मनाई जाती है। इसे ही शरद पूर्णिमा भी कहा जाता है। उनके जीवन और कार्यों की चर्चा आज भी श्रद्धा और सम्मान के साथ की जाती है।
यहाँ हम ऐसे महापुरुष की बात कर रहे हैं जिनका संबंध ‘त्रेतायुग’ से माना जाता है। भारतीय कालगणना के अनुसार त्रेतायुग अत्यंत प्राचीन माना जाता है, करोड़ों वर्ष पहले का युग। सोचने वाली बात यह है कि जहाँ हमें अपने 7 पीढ़ी के पूर्वजों के नाम याद नहीं हैं, वहाँ इतने लंबे समय के बाद भी यदि किसी व्यक्ति का नाम जन-जन की स्मृति में जीवित है, तो उसका कारण केवल उस व्यक्ति का जन्म तो बिल्कुल नहीं हो सकता। यदि केवल जन्म ही महानता का आधार होता, तो उस काल में जन्म लेने वाले असंख्य अन्य लोगों के नाम भी आज याद किए जाते और यदि कुछ नाम याद किए भी जाते हैं तो केवल वही नाम जो वाल्मीकि ने दुनिया को बताये। तो फिर ऐसा क्या था जिसने महर्षि वाल्मीकि को काल की सीमाओं से परे अमर बना दिया? यह विचारणीय है।
महर्षि वाल्मीकि ने ऐसा कार्य किया, जिसने उन्हें केवल अपने युग का नहीं, बल्कि सभी युगों का महापुरुष बना दिया। उनके जन्म और जीवन को लेकर कथाभेद प्रचलित हैं। यहाँ हम उस विषय में नहीं जाएँगे। शास्त्रों में ऐसा वर्णन है कि महर्षि वाल्मीकि चौबीसवें त्रेतायुग में भृगुवंश में पैदा हुए थे। वे प्रचेता (वरुण) की दसवीं संतान थे। उन्होंने कई हजार वर्ष भारी तपस्या की थी। त्रेतायुग में ही श्रीरामचंद्र जी का जन्म भी हुआ था। इस प्रकार वे श्रीराम के समकालीन थे। उन्होंने प्रथम कविता रूपी ‘रामायण’ जैसा अनुपम महाकाव्य दुनिया को दिया, जिसके कारण उनका नाम करोड़ों वर्षों से श्रद्धापूर्वक लिया जाता है और आने वाली पीढ़ियाँ भी उन्हें स्मरण करती रहेंगी।
ऐसा कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि महर्षि वाल्मीकि न होते तो शायद श्रीराम भी न होते। ऐसा कहने के पीछे कारण यह है कि श्रीराम धरती पर आये थे, सर्वप्रथम इसका पता वाल्मीकि रामायण से ही चला है। रामायण के अन्य संस्करणों के मूल में वाल्मीकि रामायण ही मानी जाती है। ऐसा कहने में भी कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि महर्षि वाल्मीकि ने ही प्रभु राम को घर-घर पहुँचाया। राम जन्मे थे, लेकिन हम सबके जीवन में उन्हें महर्षि वाल्मीकि ही लाए थे।
महर्षि वाल्मीकि को संस्कृत साहित्य का प्रथम कवि अर्थात् ‘आदिकवि’ कहा जाता है। आदिकवि अर्थात् सभी कवियों के ‘गुरु’। उन्हें ‘प्रथम साहित्य शिल्पी’ भी कहा जाता है। उन्होंने संसार को ‘वाल्मीकि रामायण’ जैसा महान ग्रंथ दिया, जो भगवान राम और माता सीता के जीवन, आदर्शों और चरित्र का वर्णन करता है। यह महाकाव्य संस्कृत भाषा में है। इसमें 24 हजार श्लोक हैं और इसे सात कांडों में विभाजित किया गया है। जिनमें ‘बालकांड’ में राम लला की बाललीला है, यह जीवन की सरलता का कांड है। ‘अयोध्याकांड’ जीवन के सत्य का कांड है। ‘अरण्यकांड’ जीवन के त्याग का कांड है। ‘किष्किन्धाकांड’ जीवन-संघर्ष का कांड है। ‘सुंदरकांड’ मृत जीवन में नवजीवन का कांड है। ‘युद्धकांड’ जीवन में धर्मयुद्ध का कांड है और ‘उत्तरकांड’ धर्मस्थापना का कांड है। उत्तरकांड को लेकर भी विद्वानों में विमर्श चलता रहता है। हम उसमें भी नहीं पड़ेंगे।
वाल्मीकि केवल एक कवि ही नहीं थे, बल्कि महान ऋषि, शिक्षक, दार्शनिक और समाज को सही दिशा दिखाने वाले महापुरुष भी थे। रामायण में एक जगह लक्ष्मण माता सीता को बताते हैं कि महर्षि वाल्मीकि उनके पिता दशरथ के घनिष्ठ मित्र हैं। वे महायोगी थे, स्वयं सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी उनसे मिलने आये थे और उन्हें वरदान देते हुए कहा था, “जब तक तुम्हारी बनायी हुई श्रीरामकथा अर्थात् रामायण का लोक (दुनिया) में प्रचार होता रहेगा, तब तक तुम इच्छानुसार ऊपर-नीचे तथा मेरे लोकों में निवास करोगे।” लव-कुश को शस्त्र और शास्त्र की शिक्षा देने वाले भी महर्षि वाल्मीकि ही थे। महर्षि वाल्मीकि खगोलशास्त्री भी थे और यह बात उनकी रामायण से सिद्ध होती है। आधुनिक सॉफ्टवेयरों के माध्यम से यह सिद्ध हो गया है कि रामायण में दिए गए खगोलीय संदर्भ शब्दश: सही हैं। उनके द्वारा रचित रामायण में दिए गए खगोलीय संदर्भ कितने सटीक थे, इसका उदाहरण श्रीराम के जन्म के समय के ग्रहों, नक्षत्रों और राशियों के वर्णन से मिलता है।
आज भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के अनेक देशों में रामायण का अध्ययन किया जाता है। रामलीला का मंचन होता है। इस महान ग्रंथ के कारण महर्षि वाल्मीकि का नाम सदियों से अमर बना हुआ है। उनके द्वारा रचित रामायण का अध्ययन करने से पता चलता है कि उन्हें भाषा, साहित्य, राजनीति, समाज, प्रकृति और मानव स्वभाव की गहरी समझ थी। उस समय शिक्षा मुख्यतः आश्रमों में दी जाती थी। उनके आश्रम में अनेक ऋषि, शिष्य और साधक रहते थे। भरद्वाज मुनि उन्हीं के शिष्य थे।
क्या आपने हॉलीवुड की प्रसिद्ध फिल्म ‘मैट्रिक्स’ के बारे में सुना है? या देखी है? इस फिल्म में नायक को पता चलता है कि जिस संसार को वह वास्तविक समझता था, वह वास्तव में एक भ्रम है और उसके पीछे एक और गहरा सत्य छिपा है। आश्चर्य की बात है कि ऐसे ही प्रश्नों पर प्राचीन ग्रंथ ‘योगवासिष्ठ’ में चिंतन किया गया था। योगवासिष्ठ भी महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण का ही भाग है। ‘योगवासिष्ठ’ में महर्षि वशिष्ठ और श्रीराम के बीच जीवन और संसार के रहस्यों पर संवाद है। यह ग्रंथ बताता है कि मन ही सुख-दुःख, बंधन और मुक्ति का मुख्य कारण है। महर्षि वाल्मीकि का ‘योगवासिष्ठ’ आज भी सर्वदूर विख्यात है।
आज संपूर्ण विश्व में पर्यावरण को लेकर बड़ी चिंता है, लेकिन करोड़ों वर्ष पूर्व महर्षि वाल्मीकि को प्रकृति से विशेष प्रेम था। उनके द्वारा रचित रामायण में नदियों, पर्वतों, जंगलों, वृक्षों और पशु-पक्षियों का अत्यंत सुंदर वर्णन मिलता है। उनकी रचना रामायण से पता चलता है कि वे प्रकृति को जीवन का अभिन्न अंग मानते थे। उन्होंने मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलन का संदेश दिया।
संक्षेप में कहें तो वाल्मीकि जयंती कोई सामान्य परंपरागत सांस्कृतिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह आत्मचिंतन, आत्मशुद्धि और आत्मोन्नति का पर्व है। आत्मचिंतन अर्थात् यह प्रश्न कि हम अपने जीवन में क्या कर रहे हैं? क्या हम अपने जीवन में ऐसा कुछ कर रहे हैं जो युगों बाद भी वाल्मीकि की तरह याद किया जाएगा? या आने वाली पीढियां हमें कुछ ही समय में भुला देंगी? आत्मशुद्धि अर्थात् हमारा जीवन बिना किसी विकार के हो, सबके साथ समरस हो। हमारे मन में कोई राग, द्वेष और भेद न हो। वाल्मीकि के नायक श्रीराम इसका अनुपम उदाहरण थे। वे परिवार के हुए, अयोध्यावासियों के हुए, वनवासियों के हुए, वानरों के हुए, रीछों के हुए, जटायु के हुए, शबरी के हुए। वे निषादराज के हुए, केवट के हुए और यहाँ तक राक्षसराज विभीषण को भी उन्होंने अपनाया। कुल मिलाकर वे जन-जन के हुए। उनके मन में किसी के प्रति कोई विकार या भेद नहीं था। वाल्मीकि के नायक श्रीराम का समरस व्यक्तित्व सामाजिक सीमाओं से परे जाकर सभी को जोड़ता है। इसी तरह आत्मोन्नति अर्थात् श्रेष्ठ जीवन जीना। फिर वह महल (घर) में हो या वन में।
महर्षि वाल्मीकि भारतीय संस्कृति के उन महान ऋषियों में से हैं, जिनका योगदान युगों-युगों तक स्मरण किया जाएगा। उन्होंने संसार को ऐसा महान ग्रंथ दिया जिसने असंख्य लोगों को सत्य, धर्म, करुणा, त्याग और कर्तव्य का मार्ग दिखाया। महर्षि वाल्मीकि इस सत्य के साक्षात् प्रतीक है कि ज्ञान, परिश्रम, संवेदनशीलता और सदविचार मनुष्य को महान बनाते हैं। भारतीय संस्कृति में महर्षि वाल्मीकि का स्थान सदैव सम्मान और श्रद्धा का रहेगा।…नारायणायेती समर्पयामि,,,,
































