महाराष्ट्र के पुणे स्थित भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (IISER-Pune) ने सामाजिक कार्यकर्ता उमर खालिद के शोध पर आधारित एक किताब को अपनी लाइब्रेरी से हटा दिया है। सोशल मीडिया पर इस किताब को लेकर आलोचना होने के बाद संस्थान ने यह कदम उठाया। इस घटना के बाद शैक्षणिक संस्थानों में किताबों के चयन, प्रशासन की जवाबदेही और विवादित विषयों से जुड़ी पुस्तकों को लाइब्रेरी में रखने के नियमों पर बहस शुरू हो गई है।
विवादित किताब का नाम Fractured Communities: Adivasi Histories and the Politics of Power है। इसे जुगरनॉट प्रकाशन ने 2026 में प्रकाशित किया था। यह किताब उमर खालिद के डॉक्टरेट शोध पर आधारित है, जिसे उन्होंने 2018 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में जमा किया था।
किताब में क्या लिखा है?
यह किताब झारखंड के सिंहभूम क्षेत्र के आदिवासी समुदायों के इतिहास पर आधारित है। इसमें ब्रिटिश शासन, प्रशासनिक व्यवस्था, स्थानीय शासन और सत्ता के बदलते स्वरूप का अध्ययन किया गया है। उमर खालिद ने यह शोध जेएनयू के सेंटर फॉर हिस्टोरिकल स्टडीज में जमा किया था। उन्हें 2019 में डॉक्टरेट की उपाधि मिली थी।
विवाद तब शुरू हुआ, जब सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने पुणे स्थित IISER की श्रीनिवास रामानुजन लाइब्रेरी में इस किताब की मौजूदगी पर सवाल उठाए। आलोचकों ने कहा कि 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े मामले में आरोपी उमर खालिद की किताब को सरकारी संस्थान की लाइब्रेरी में क्यों रखा गया है।
संस्थान ने क्या कार्रवाई की?
सोशल मीडिया पर आलोचना बढ़ने के बाद IISER के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के प्रभारी अध्यक्ष मदाभूषि मदन गोपाल ने एक्स पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने बताया कि किताब को लाइब्रेरी से हटा दिया गया है। उन्होंने इस मामले को गलत गतिविधि बताते हुए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई शुरू किए जाने की भी जानकारी दी।
उन्होंने यह भी कहा कि संस्थान के निदेशक ने मामले में तुरंत कदम उठाए हैं।
हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टों में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि किताब को लाइब्रेरी में शामिल करने की सिफारिश किसने की थी, इसे किस अधिकारी या समिति ने मंजूरी दी थी और इसे हटाने का फैसला किस औपचारिक प्रक्रिया के तहत लिया गया।
2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े मामले में आरोपी हैं उमर खालिद
उमर खालिद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। वह सितंबर 2020 से उत्तर-पूर्वी दिल्ली में फरवरी 2020 में हुए दंगों से जुड़े कथित बड़ी साजिश के मामले में न्यायिक हिरासत में हैं। उन पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA और अन्य कानूनी प्रावधानों के तहत आरोप लगाए गए हैं।
हालांकि, इस मामले में उन्हें दोषी ठहराए जाने की बात नहीं है। इसलिए उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों और अदालत में दोष साबित होने के बीच अंतर करना जरूरी है।
किताब और लेखक के खिलाफ आरोप अलग-अलग मुद्दे
इस विवाद में एक अहम सवाल यह भी है कि किसी लेखक पर आपराधिक आरोप होने से उसकी किताब की शैक्षणिक उपयोगिता पर क्या असर पड़ना चाहिए।
उमर खालिद की यह किताब आदिवासी इतिहास, ब्रिटिश शासन और स्थानीय सत्ता व्यवस्था जैसे विषयों पर आधारित है। इसका विषय उनके खिलाफ चल रहे आपराधिक मामले से अलग है।
आमतौर पर किसी शोध संस्थान की लाइब्रेरी में किताब शामिल करने से पहले उसके विषय, शैक्षणिक महत्व और संस्थान की जरूरतों को देखा जाता है। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि IISER पुणे ने किताब को हटाने से पहले किसी औपचारिक समीक्षा प्रक्रिया का पालन किया था या नहीं।
सोशल मीडिया के दबाव पर भी उठे सवाल
इस घटना ने शैक्षणिक संस्थानों के फैसलों पर सोशल मीडिया के प्रभाव को लेकर भी चर्चा शुरू कर दी है। सोशल मीडिया के जरिए प्रशासनिक गलतियों को सामने लाया जा सकता है, लेकिन कई बार पूरी जानकारी सामने आने से पहले ही किसी संस्थान पर फैसला बदलने का दबाव भी बन सकता है।
IISER पुणे के सामने अब यह स्पष्ट करने की चुनौती है कि किताब को लाइब्रेरी में शामिल करने और बाद में हटाने का फैसला किन नियमों के तहत लिया गया। यदि संस्थान अपनी खरीद नीति और किताबों के चयन की प्रक्रिया के बारे में जानकारी देता है, तो इससे मामले को समझने में मदद मिल सकती है।
लाइब्रेरी में किताबों के चयन पर बहस
लाइब्रेरी छात्रों, शिक्षकों और शोधकर्ताओं को अलग-अलग विषयों पर अध्ययन करने के लिए सामग्री उपलब्ध कराती हैं। इनमें ऐसी किताबें भी हो सकती हैं, जिनमें विवादित इतिहास, राजनीतिक विचारों या सार्वजनिक घटनाओं की अलग-अलग व्याख्याएं दी गई हों।
इसलिए किसी किताब को लाइब्रेरी में रखने या हटाने का फैसला केवल लेखक की लोकप्रियता या राजनीतिक छवि के आधार पर नहीं होना चाहिए। इसके लिए स्पष्ट नियम और उचित समीक्षा प्रक्रिया जरूरी है।
IISER पुणे का यह मामला अब केवल एक किताब तक सीमित नहीं रह गया है। इससे संस्थान के प्रशासन, पारदर्शिता और शैक्षणिक सामग्री के चयन से जुड़े सवाल भी सामने आए हैं। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संस्थान इस फैसले के बारे में विस्तृत जानकारी देता है या नहीं और भविष्य में ऐसे मामलों से निपटने के लिए क्या नियम अपनाता है।


































