जम्मू-कश्मीर की राजनीति में नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला के एक बयान को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की ओर से कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार उठाए जाने से जम्मू-कश्मीर के लोगों के हितों की रक्षा करने में मदद मिली है। 24 अक्टूबर 2026 को बारामूला में पार्टी के एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने केंद्र सरकार की नीतियों और इरादों पर सवाल उठाए। उनके बयान के बाद भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने कड़ी प्रतिक्रिया दी।
इस बयान के बाद पाकिस्तान की कश्मीर नीति, जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने और केंद्र सरकार के साथ क्षेत्र के राजनीतिक संबंधों को लेकर बहस तेज हो गई है।
फारूक अब्दुल्ला ने केंद्र सरकार पर उठाए सवाल
पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए फारूक अब्दुल्ला ने सवाल किया कि क्या जम्मू-कश्मीर के लोगों को केंद्र सरकार से न्याय मिलने की उम्मीद करनी चाहिए। उन्होंने लोगों से अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने और हिम्मत बनाए रखने की अपील की। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर लोग अपने अधिकारों के लिए खड़े नहीं हुए, तो उनकी पहचान पर खतरा पैदा हो सकता है।
पाकिस्तान की भूमिका का जिक्र करते हुए अब्दुल्ला ने कहा कि वह लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर का मुद्दा उठाता रहा है। उनके मुताबिक, इससे कश्मीर का मुद्दा वैश्विक चर्चा में बना हुआ है। उन्होंने केंद्र सरकार के इरादों पर भी संदेह जताया।
हालांकि, फारूक अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर के भारत का हिस्सा होने की बात भी कही। उन्होंने महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और मौलाना अबुल कलाम आजाद का उल्लेख करते हुए भारत के साथ जम्मू-कश्मीर के संबंधों की पुष्टि की।
बीजेपी ने बयान पर जताई कड़ी आपत्ति
फारूक अब्दुल्ला के बयान पर जम्मू-कश्मीर बीजेपी के प्रवक्ता अल्ताफ ठाकुर ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने आरोप लगाया कि अब्दुल्ला का बयान पाकिस्तान के रुख को सही ठहराने वाला है। ठाकुर ने इसे देशविरोधी बताते हुए अधिकारियों से कानूनी कार्रवाई पर विचार करने की मांग की।
बीजेपी नेता ने कहा कि भारतीय संविधान के तहत शपथ लेने वाले किसी भी राजनीतिक नेता को पाकिस्तान की भूमिका पर बात करते समय उसके इतिहास और जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद से जुड़े आरोपों को भी ध्यान में रखना चाहिए।
हालांकि, फारूक अब्दुल्ला के बयान को लेकर अलग-अलग राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। उनके समर्थक इसे केंद्र सरकार की नीतियों और जम्मू-कश्मीर के अधिकारों को लेकर नाराजगी के रूप में देख सकते हैं, जबकि विरोधी इसे पाकिस्तान के पक्ष को महत्व देने वाला बयान मान रहे हैं।
कश्मीर मुद्दे पर भारत और पाकिस्तान के अलग-अलग रुख
पाकिस्तान लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र और इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर का मुद्दा उठाता रहा है। दूसरी ओर, भारत जम्मू-कश्मीर को अपना अभिन्न अंग मानता है और इस मामले में बाहरी हस्तक्षेप का विरोध करता है।
भारत का कहना है कि जम्मू-कश्मीर से जुड़े मुद्दों का समाधान द्विपक्षीय बातचीत के जरिए होना चाहिए। भारत ने सीमा पार आतंकवाद को दोनों देशों के बीच सामान्य संबंधों की राह में एक बड़ी बाधा बताया है।
पाकिस्तान की भूमिका को लेकर बहस में पाकिस्तान के नियंत्रण वाले जम्मू-कश्मीर के हालात भी शामिल हैं। भारत की ओर से पाकिस्तान पर वहां के लोगों की राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं की अनदेखी करने के आरोप लगाए जाते रहे हैं। वहीं, पाकिस्तान कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने की अपनी नीति जारी रखता है।
जम्मू-कश्मीर के राज्य के दर्जे का मुद्दा भी अहम
जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करना क्षेत्र की राजनीति का एक प्रमुख मुद्दा बना हुआ है। साल 2019 में केंद्र सरकार ने तत्कालीन राज्य का पुनर्गठन कर उसे केंद्र शासित प्रदेश बना दिया था। इसी दौरान अनुच्छेद 370 के तहत मिलने वाला विशेष संवैधानिक दर्जा भी समाप्त कर दिया गया था।
केंद्र सरकार ने कहा है कि उचित समय पर जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा बहाल किया जाएगा। हालांकि, नेशनल कॉन्फ्रेंस समेत कई क्षेत्रीय दल इस मामले में स्पष्ट समयसीमा की मांग करते रहे हैं।
फारूक अब्दुल्ला के बयान ने इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस को एक बार फिर तेज कर दिया है। उनके आलोचकों का कहना है कि पाकिस्तान की भूमिका को जम्मू-कश्मीर के लोगों के हितों की रक्षा से जोड़ना उचित नहीं है। वहीं, उनके समर्थक इसे केंद्र सरकार से राजनीतिक अधिकारों और राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग के संदर्भ में देखते हैं।
बयान से बढ़ सकता है राजनीतिक टकराव
फारूक अब्दुल्ला के बयान ने नेशनल कॉन्फ्रेंस और बीजेपी के बीच राजनीतिक मतभेदों को फिर सामने ला दिया है। जम्मू-कश्मीर के संवैधानिक दर्जे, राज्य का दर्जा बहाल करने और पाकिस्तान की भूमिका जैसे मुद्दों पर दोनों दलों के बीच पहले से ही मतभेद रहे हैं।
इस पूरे विवाद में मुख्य सवाल यह है कि जम्मू-कश्मीर के लोगों के अधिकारों, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और विकास से जुड़े मुद्दों पर चर्चा किस तरह आगे बढ़ेगी। फारूक अब्दुल्ला के बयान को उनके समर्थक क्षेत्रीय हितों की आवाज बता रहे हैं, जबकि बीजेपी इसे पाकिस्तान के रुख को महत्व देने वाला बयान मान रही है।
फिलहाल, इस बयान ने जम्मू-कश्मीर की राजनीति में एक नई बहस शुरू कर दी है। आने वाले समय में राज्य का दर्जा बहाल करने और केंद्र सरकार के साथ संबंधों को लेकर राजनीतिक दलों के बीच चर्चा और तेज हो सकती है।


































