15 अक्टूबर 2026 को रक्षा मंत्रालय ने भारतीय वायुसेना के लिए समर्पित संचार उपग्रह GSAT-7C की खरीद के लिए न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL), बेंगलुरु के साथ 2,563 करोड़ रुपये का अनुबंध किया। स्वदेशी रूप से डिजाइन, विकसित और निर्मित होने वाला यह उपग्रह वायुसेना की सुरक्षित, भरोसेमंद और निर्बाध संचार क्षमता को मजबूत करेगा।
यह घोषणा ऐसे समय हुई है, जब यूक्रेन युद्ध में सैटेलाइट संचार सेवाओं की भूमिका और उन पर नियंत्रण को लेकर बहस तेज है। इस युद्ध ने दिखाया है कि आधुनिक सैन्य अभियानों में लड़ाकू विमान, मिसाइल और ड्रोन जितने महत्वपूर्ण हैं, उतना ही जरूरी उनके बीच सूचनाओं का सुरक्षित आदान-प्रदान भी है।
GSAT-7C की परियोजना को स्टारशील्ड विवाद की प्रतिक्रिया नहीं माना जा सकता, क्योंकि इससे जुड़ी खरीद प्रक्रिया 2021 में ही सामने आ चुकी थी। हालांकि, यूक्रेन का अनुभव यह समझने का अवसर जरूर देता है कि भारत के लिए अपनी सैन्य संचार क्षमता विकसित करना क्यों जरूरी है।
स्टारशील्ड विवाद: युद्ध में संचार नेटवर्क पर नियंत्रण क्यों अहम?
यूक्रेन युद्ध में एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स की स्टारलिंक सैटेलाइट इंटरनेट सेवा का इस्तेमाल सैन्य संचार और ड्रोन अभियानों सहित कई क्षेत्रों में हुआ है। वहीं, स्टारशील्ड अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य जरूरतों के लिए विकसित सैटेलाइट सेवा है।
इन सेवाओं को लेकर बहस का एक प्रमुख पहलू यह है कि युद्ध के दौरान संचार नेटवर्क की उपलब्धता और उसके इस्तेमाल की शर्तें कितनी महत्वपूर्ण हो सकती हैं। जब कोई देश किसी बाहरी कंपनी के नेटवर्क पर निर्भर होता है, तो सेवा की उपलब्धता, तकनीकी सीमाएं और उसे संचालित करने से जुड़े फैसले उसके सैन्य अभियानों को प्रभावित कर सकते हैं।
सैटेलाइट संचार से दूर-दराज के क्षेत्रों में तैनात सैन्य इकाइयों को जोड़ना और जमीन आधारित नेटवर्क की सीमाओं के बावजूद संपर्क बनाए रखना संभव होता है। अगर यह संपर्क बाधित हो जाए, तो कमांड निर्देशों और परिचालन सूचनाओं के आदान-प्रदान में मुश्किल आ सकती है।
भारत के लिए इसका सबक विदेशी तकनीक से दूरी बनाना नहीं, बल्कि महत्वपूर्ण सैन्य संचार के लिए अपनी क्षमताएं और वैकल्पिक व्यवस्थाएं विकसित करना है। हालांकि, स्टारलिंक और स्टारशील्ड अलग-अलग सेवाएं हैं और यूक्रेन में किसी विशेष घटना के प्रभाव का आकलन उसके वास्तविक संदर्भ में ही किया जाना चाहिए।
GSAT-7C: भारतीय वायुसेना के लिए क्यों जरूरी है सुरक्षित संचार?
आधुनिक हवाई अभियानों में लड़ाकू विमान, निगरानी प्लेटफॉर्म, कमांड सेंटर और जमीन पर मौजूद सैन्य इकाइयां अलग-अलग स्थानों से काम करती हैं। इनके बीच सूचनाओं का समय पर आदान-प्रदान अभियान के समन्वय के लिए महत्वपूर्ण होता है।
सैटेलाइट संचार लंबी दूरी पर संपर्क बनाए रखने में मदद करता है, खासकर उन परिस्थितियों में जहां जमीन आधारित नेटवर्क पर्याप्त नहीं होते। GSAT-7C का उद्देश्य भारतीय वायुसेना के प्लेटफॉर्मों की सुरक्षित और निर्बाध संचार क्षमता को मजबूत करना है।
रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, यह उपग्रह स्वदेशी रूप से डिजाइन, विकसित और निर्मित किया जाएगा। इसका मतलब है कि भारत अपनी सैन्य जरूरतों के अनुरूप संचार तकनीक विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
इस परियोजना की पृष्ठभूमि भी महत्वपूर्ण है। वर्ष 2021 में रक्षा अधिग्रहण परिषद ने GSAT-7C और सॉफ्टवेयर डिफाइंड रेडियो के लिए ग्राउंड हब की खरीद संबंधी प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। इसका उद्देश्य सशस्त्र बलों के बीच सुरक्षित संचार को बेहतर बनाना था।
आत्मनिर्भर भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है स्वदेशी सैटेलाइट?
GSAT-7C का अनुबंध न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड के साथ हुआ है, जो अंतरिक्ष विभाग के अधीन भारत सरकार का सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम है। इस परियोजना में स्वदेशी डिजाइन, विकास और निर्माण पर जोर दिया गया है।
रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल विदेशी हथियारों की खरीद कम करना नहीं है। इसका मतलब महत्वपूर्ण तकनीकों को देश में विकसित करने, उनका उत्पादन करने और जरूरत पड़ने पर उनका रखरखाव करने की क्षमता बढ़ाना भी है।
अगर किसी महत्वपूर्ण सैन्य प्रणाली के लिए तकनीक या सेवा पूरी तरह बाहरी स्रोत पर निर्भर हो, तो संकट के समय आपूर्ति या उपलब्धता से जुड़ी अनिश्चितताएं पैदा हो सकती हैं। घरेलू तकनीकी क्षमता इन जोखिमों को कम करने में मदद कर सकती है।
हालांकि, स्वदेशी उपग्रह होने भर से पूरा संचार नेटवर्क सुरक्षित नहीं हो जाता। उसकी वास्तविक उपयोगिता साइबर सुरक्षा, ग्राउंड स्टेशन, नेटवर्क प्रबंधन और दूसरी सैन्य प्रणालियों के साथ एकीकरण पर भी निर्भर करती है। इसलिए GSAT-7C को महत्वपूर्ण कदम तो माना जा सकता है, लेकिन इसकी परिचालन क्षमता का आकलन तैनाती और इस्तेमाल के बाद ही होगा।
क्या GSAT-7C विदेशी सैन्य संचार पर निर्भरता खत्म कर देगा?
GSAT-7C और स्टारशील्ड की तकनीकी संरचना तथा उपयोग का दायरा अलग है। इसलिए दोनों को सीधे एक-दूसरे का विकल्प बताना सही नहीं होगा। GSAT-7C का मुख्य उद्देश्य भारतीय वायुसेना की जरूरतों के लिए समर्पित संचार क्षमता विकसित करना है।
एक उपग्रह से भारत की सभी सैन्य संचार जरूरतें पूरी हो जाएंगी या विदेशी प्रणालियों पर निर्भरता पूरी तरह खत्म हो जाएगी, ऐसा दावा करना भी जल्दबाजी होगी। आधुनिक सैन्य संचार के लिए उपग्रहों, ग्राउंड नेटवर्क, सुरक्षित डेटा लिंक और वैकल्पिक प्रणालियों का एक व्यापक ढांचा जरूरी होता है।
भारत के लिए महत्वपूर्ण लक्ष्य ऐसी व्यवस्था विकसित करना है, जिसमें किसी एक नेटवर्क में बाधा आने पर भी सैन्य अभियानों के लिए जरूरी संपर्क बनाए रखने के विकल्प मौजूद हों। यही संचार व्यवस्था की मजबूती और रणनीतिक स्वायत्तता का आधार है।
यूक्रेन युद्ध का सबक: सूचना भी सैन्य ताकत का हिस्सा
यूक्रेन युद्ध ने दिखाया है कि आधुनिक सैन्य अभियानों में संचार नेटवर्क की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है। ड्रोन, लड़ाकू विमान और निगरानी प्रणालियां तभी प्रभावी ढंग से काम कर सकती हैं, जब उनके बीच जरूरी सूचनाओं का आदान-प्रदान हो सके।
इसी संदर्भ में GSAT-7C भारत की रक्षा तैयारियों के लिए महत्वपूर्ण है। 2,563 करोड़ रुपये का यह अनुबंध वायुसेना की सुरक्षित संचार क्षमता बढ़ाने और स्वदेशी अंतरिक्ष तकनीक को रक्षा जरूरतों से जोड़ने की दिशा में कदम है।
स्टारशील्ड विवाद इस परियोजना की वजह नहीं है, लेकिन वह एक बड़े रणनीतिक सवाल को सामने लाता है: युद्ध के समय किसी देश की सैन्य संचार व्यवस्था कितनी स्वतंत्र, सुरक्षित और भरोसेमंद है?
भविष्य के युद्ध में सैन्य ताकत का आकलन केवल लड़ाकू विमानों और मिसाइलों की संख्या से नहीं होगा। यह भी मायने रखेगा कि सेना कितनी सुरक्षित तरीके से जुड़ी है और संकट के समय उसका संचार नेटवर्क कितनी मजबूती से काम करता है। GSAT-7C इसी जरूरत को पूरा करने की दिशा में भारत का एक महत्वपूर्ण कदम है।






























