Dr. Mahender

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डॉ. महेंद्र ठाकुर: केमिस्ट्री से डॉक्टरेट, लेकिन सामाजिक कीमियागिरी के समीकरणों में उलझने-सुलझाने में ज्यादा रुचि।
सामाजिक- पर्यावरण कार्यकर्ता, स्थापित पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन और पुस्तकों की समीक्षाओं के साथ ही कई बेस्टसेलर और सुप्रसिद्ध पुस्तकों के हिंदी अनुवाद भी इनकी कलम से हुए हैं. X पर @Mahender_Chem नाम से उपस्थिति

बच्चे आपके, संस्कार किसके?

हाल ही में एक पुस्तक पढ़ी, जिसका शीर्षक है “जिस ओर जवानी चलती है, उस ओर जमाना चलता है।” पुस्तक में विकसित भारत 2047 के परिप्रेक्ष्य में युवाओं की संभावित भूमिका को लेकर सूत्ररूप में संदेश देने...

‘विभाजन की विभीषिका स्मृति दिवस’ : भारत में कई ‘मिनी पाकिस्तान’ पैदा हो चुके हैं ?

वर्ष 2021 में देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 14 अगस्त को 'विभाजन की विभीषका स्मृति दिवस' (Partition Horrors Remembrance Day) के रूप में मनाने का आह्वान किया था। 14 अगस्त 1947 को मजहबी ज़िद के चलते...

दिल्ली की एक शाम: जैसे दो घंटे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ बिताए हों

कहते हैं संयोग और चमत्कार इस दुनिया में होते हैं। कुछ ऐसा ही मेरे साथ भी घटित हुआ। एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक के अनुवाद कार्य में लगा हुआ हूँ। अचानक दिल्ली यात्रा पर आना पड़ा। यात्रा पर आने...

कॉमेडी के नाम पर अश्लीलता : आखिर कब तक?

अंग्रेजी भाषा का एक शब्द “कॉमेडी”, कदाचित जिसका अर्थ ‘हास्य की वह विधा है, जिसका उद्देश्य स्वस्थ मनोरंजन और समाज को हँसी के माध्यम से सकारात्मक संदेश देना है’। लेकिन इन दिनों में भारत में कॉमेडी या...

भोजशाला: इतिहास, आस्था और साक्ष्यों के बीच उभरता सत्य

हाल ही में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर बेंच ने धार स्थित भोजशाला के विवाद को लेकर एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। इस निर्णय में हिंदू पक्ष को विजय मिली है। भोजशाला इस सत्य का जीवंत उदाहरण...

नेहरू की ‘इतिहास दृष्टि’ पर असहज सवाल: डॉ. राकेश कुमार आर्य की ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया की डिस्कवरी’

‘इतिहास’ केवल बीते समय की घटनाओं का क्रम नहीं होता, बल्कि किसी राष्ट्र की चेतना, उसकी स्मृतियों और उसकी पहचान का आधार भी होता है। जो कुछ हम अपने अतीत के बारे में जानते और मानते हैं,...

पहचान और राष्ट्रीय चेतना की वैचारिक यात्रा: ‘इंडिया से भारत एक प्रवास

‘भारत’ दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यता, संस्कृति और चेतना का जीवंत प्रतीक है। इसकी भूमि पर हर संघर्ष, हर सपना और हर परंपरा हमें हमारी पहचान याद दिलाती है और भविष्य की संभावनाओं की ओर सोचने के...

‘शिवायण’: भ्रांतियों से सत्य की ओर जाने का रास्ता बताती पुस्तक

भारतीय परंपरा में भगवान शिव का स्वरूप अत्यंत व्यापक, गूढ़ और बहुआयामी माना जाता है। वे केवल तप, त्याग, करुणा, संहार और सृजन के अद्भुत संतुलन के प्रतीक हैं। एक ओर वे कैलाशवासी योगी हैं, तो दूसरी...

‘POJK संकल्प दिवस’: 22 फरवरी 1994 का संसदीय संकल्प और भारत का राष्ट्रीय दायित्व

भारत के राष्ट्रीय जीवन में कुछ तिथियाँ केवल कैलेंडर की सामान्य तिथियाँ नहीं है, बल्कि वे राष्ट्र की चेतना, उसके संकल्प और उसके ऐतिहासिक दायित्व की जीवंत प्रतीक बन जाती हैं। 22 फरवरी ऐसी ही एक तिथि...

क्या धर्म पर्यावरण की रक्षा कर सकता है? ‘बिश्नोईज़ एंड द ब्लैकबक’ के माध्यम से अनु लाल का एक जरूरी सवाल

आज का युग अभूतपूर्व विकास और तकनीकी प्रगति का युग है, रील्स का दौर है, जीवन की भागदौड़ इतनी तेज है कि ‘ठहराव’ शब्द अब विचित्र लगने लगा है। इसी के साथ पर्यावरण संकट भी गहराता जा...

‘The journey within’: श्रीखंड कैलाश से आत्मबोध तक की यात्रा

जीवन स्वयं एक यात्रा है, उतार-चढ़ाव से भरी, अनुभवों से सजी और निरंतर आगे बढ़ती हुई। किंतु यात्रा केवल स्थानों के बीच की भौतिक गति नहीं होती; वह व्यक्ति के भीतर घटने वाली एक सूक्ष्म, गहन और...

जनसंख्या के बदलते संतुलन पर असहज विमर्श प्रस्तुत करती पुस्तक ‘सेकुलरवाद और बदलती जनगणना के आंकड़े’

अंग्रेजी भाषा में कहा जाता है कि ‘डेमोग्राफी इज डेमोक्रेसी’। किसी भी देश में लोकतंत्र रहेगा या नहीं रहेगा ये इस बात पर निर्भर करता है कि वहाँ की जनसंख्या कैसी है। ये बात तो सत्य है...

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