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‘POJK संकल्प दिवस’: 22 फरवरी 1994 का संसदीय संकल्प और भारत का राष्ट्रीय दायित्व

22 फरवरी ऐसी ही एक तिथि है, जिसे आज 'POJK संकल्प दिवस' के रूप में स्मरण किया जाता है। इसका आधार 22 फरवरी 1994 को भारत की संसद द्वारा सर्वसम्मति से पारित वह ऐतिहासिक प्रस्ताव है, जिसने स्पष्ट और दृढ़ शब्दों में यह उद्घोषित किया था कि ‘जम्मू और कश्मीर भारत का अभिन्न अंग था, है और रहेगा’, तथा ‘पाकिस्तान द्वारा कब्ज़ा किए गए क्षेत्रों को खाली कराना भारत का वैध और न्यायसंगत अधिकार है’।

Dr. Mahender द्वारा Dr. Mahender
22 February 2026
in भारत, भू-राजनीति, मत
‘POJK संकल्प दिवस’: 22 फरवरी 1994 का संसदीय संकल्प और भारत का राष्ट्रीय दायित्व
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भारत के राष्ट्रीय जीवन में कुछ तिथियाँ केवल कैलेंडर की सामान्य तिथियाँ नहीं है, बल्कि वे राष्ट्र की चेतना, उसके संकल्प और उसके ऐतिहासिक दायित्व की जीवंत प्रतीक बन जाती हैं। 22 फरवरी ऐसी ही एक तिथि है, जिसे आज “POJK संकल्प दिवस” के रूप में स्मरण किया जाता है। इसका आधार 22 फरवरी 1994 को भारत की संसद द्वारा सर्वसम्मति से पारित वह ऐतिहासिक प्रस्ताव है, जिसने स्पष्ट और दृढ़ शब्दों में यह उद्घोषित किया था कि ‘जम्मू और कश्मीर भारत का अभिन्न अंग था, है और रहेगा’, तथा ‘पाकिस्तान द्वारा कब्ज़ा किए गए क्षेत्रों को खाली कराना भारत का वैध और न्यायसंगत अधिकार है’। यह प्रस्ताव केवल एक विधायी दस्तावेज नहीं था, बल्कि यह राष्ट्र की सामूहिक इच्छा, उसकी ऐतिहासिक चेतना और उसकी संप्रभुता के प्रति अटूट प्रतिबद्धता की अभिव्यक्ति था।

1994 का यह प्रस्ताव उस समय पारित हुआ, जब जम्मू-कश्मीर गंभीर चुनौतियों के दौर से गुजर रहा था। घाटी में आतंकवाद अपने चरम पर था, सामाजिक संतुलन भंग हो रहा था और हजारों निर्दोष नागरिक हिंसा और भय के वातावरण में जीवन जीने को विवश थे। सीमापार से प्रशिक्षित आतंकवादियों की घुसपैठ, उन्हें हथियारों और वित्तीय संसाधनों की आपूर्ति, तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कश्मीर के प्रश्न को भारत के विरुद्ध प्रचारित करने के प्रयास, इन सबने स्थिति को और जटिल बना दिया था। संसद ने इस पूरी परिस्थिति का गंभीर संज्ञान लेते हुए स्पष्ट किया कि यह केवल आंतरिक सुरक्षा का प्रश्न नहीं, बल्कि भारत की संप्रभुता और राष्ट्रीय अखंडता की चुनौती है।

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इस प्रस्ताव का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष इसकी सर्वसम्मति थी। लोकतंत्र में वैचारिक मतभेद स्वाभाविक होते हैं, किंतु जब राष्ट्र की एकता और अखंडता का प्रश्न आया, तो भारत के सभी राजनीतिक दल एक स्वर में खड़े हुए। इस प्रकार संसद ने यह संदेश दिया कि जम्मू-कश्मीर के प्रश्न पर भारत की राष्ट्रीय नीति स्पष्ट, एकीकृत और अडिग है। संसद ने न केवल पाकिस्तान की आतंकवाद-समर्थक गतिविधियों की कड़ी निंदा की, बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि भारत अपनी एकता, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए पूर्णतः सक्षम और संकल्पित है।

जहाँ तक इतिहास की बात है तो जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय कोई आकस्मिक या विवादास्पद घटना नहीं थी। 26 अक्टूबर 1947 को राज्य के तत्कालीन शासक महाराजा हरि सिंह ने विधिवत विलय-पत्र पर हस्ताक्षर किए, जिसके माध्यम से जम्मू-कश्मीर भारत का वैधानिक और संवैधानिक हिस्सा बना। किंतु इसके तुरंत बाद पाकिस्तान द्वारा किए गए हमले ने राज्य के एक बड़े भूभाग को भारत के प्रशासनिक नियंत्रण से बाहर कर दिया। गिलगित, बाल्टिस्तान, मीरपुर, कोटली और मुज़फ़्फ़राबाद जैसे क्षेत्र आज भी पाकिस्तान के अवैध कब्ज़े में हैं। यह स्थिति केवल एक भू-राजनीतिक विसंगति नहीं, बल्कि ऐतिहासिक न्याय की अधूरी प्रक्रिया का प्रतीक है। इस संदर्भ में वैश्विक और राष्ट्रीय सुरक्षा विषयों के सुप्रसिद्ध चिंतक और लेखक इकबाल चंद्र मल्होत्रा और मरूफ रज़ा द्वारा लिखित पुस्तक का हिंदी अनुवाद करने का अवसर मुझे मिला था, हिंदी में इस पुस्तक का शीर्षक है ‘कश्मीर की अनकही कहानी: दुनिया के सामने’। इस पुस्तक में जम्मू-कश्मीर के इतिहास, वर्तमान और भविष्य से जुड़े अनेक महत्त्वपूर्ण तथ्यों और संकेतों का विश्लेषण किया गया है।

1994 का संसदीय प्रस्ताव इसी ऐतिहासिक संदर्भ में अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाता है। संसद ने स्पष्ट रूप से कहा कि पाकिस्तान को उन सभी क्षेत्रों को खाली करना चाहिए, जिन पर उसने अवैध कब्ज़ा किया है। यह घोषणा केवल एक राजनीतिक वक्तव्य नहीं थी, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय कानून, संवैधानिक वैधता और राष्ट्रीय अधिकार के आधार पर किया गया एक स्पष्ट दावा था। किंतु यह भी उतना ही स्पष्ट है कि गिलगित, बाल्टिस्तान, मीरपुर, कोटली और मुज़फ़्फ़राबाद को पुनः भारत में जोड़ने के लिए ठोस, बहुआयामी और दीर्घकालिक प्रयासों की आवश्यकता होगी; केवल प्रस्ताव पर्याप्त नहीं होगा, लेकिन यह सच है कि 1994 का राष्ट्रीय प्रस्ताव एक ऐतिहासिक और सशक्त शुरुआत अवश्य है।

देश के लिए यह जानना और समझना आवश्यक है कि जम्मू-कश्मीर राज्य के लगभग 1,24,274 वर्ग किलोमीटर (पाकिस्तान 86017.81 वर्ग किलोमीटर और चीन ने अक्साई चिन में 38256 वर्ग किलोमीटर) क्षेत्र पर आज भी शत्रु का अवैध कब्ज़ा है। इसलिए राज्य की वास्तविक भौगोलिक स्थिति, उसकी मूल सीमाओं और ऐतिहासिकता को राष्ट्रीय विमर्श में प्रमुखता से प्रस्तुत करना आवश्यक है। साथ ही उन लाखों विस्थापित लोगों के बीच अपनी भूमि के प्रति जागरूकता और भावनात्मक संबंध को सुदृढ़ करना भी आवश्यक है, जो इस ऐतिहासिक त्रासदी के प्रत्यक्ष साक्षी हैं। पाकिस्तान अधिकृत क्षेत्रों से विस्थापित लगभग लाखों लोग, जो मुज़फ़्फ़राबाद, मीरपुर, कोटली, भींबर और गिलगित-बाल्टिस्तान से आए थे, आज भी अपने मूल स्थानों की स्मृति और अधिकार से जुड़े हुए हैं। इसी प्रकार, 1990 के आतंकवाद के कारण कश्मीर घाटी से विस्थापित लाखों कश्मीरी हिंदू और विभाजन के समय पश्चिम पाकिस्तान से आए लगभग ढाई लाख लोग, इस ऐतिहासिक विस्थापन की जीवंत स्मृति हैं। इन समुदायों की चेतना और अधिकारों का सम्मान इस राष्ट्रीय संकल्प का एक अनिवार्य अंग है।

इसके साथ ही पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की स्थिति भी घोर चिंता का विषय है। वहाँ लोकतांत्रिक अधिकारों का अभाव और हनन होता है, अभिव्यक्ति और प्रेस की स्वतंत्रता सीमित है और जनसांख्यिकीय परिवर्तन के प्रयास बहुत तेजी से किए जा रहे हैं। इन परिस्थितियों में उन लोगों के मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक आकांक्षाओं के प्रति नैतिक और मानवीय समर्थन आवश्यक है।

यह भी सत्य है कि समय के साथ भारत ने इस संकल्प को केवल शब्दों तक सीमित नहीं रखा। 5 अगस्त 2019 को संसद द्वारा अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35A को निरस्त करने का निर्णय, इस ऐतिहासिक संकल्प की निरंतरता का एक महत्त्वपूर्ण चरण था। यह निर्णय इस तथ्य का प्रमाण था कि भारत अपनी राष्ट्रीय एकता और संवैधानिक अखंडता को सुदृढ़ करने के लिए प्रतिबद्ध है।

संक्षेप में कहें तो 22 फरवरी का ‘पीओजेके संकल्प दिवस’ केवल अतीत की स्मृति का दिवस नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय दायित्व का स्मरण है। यह दिवस हमें स्मरण कराता है कि इतिहास की अधूरी प्रक्रियाएँ केवल संकल्प, चेतना और सतत प्रयासों से ही पूर्ण होती हैं। यह दिवस हमें उस राष्ट्रीय प्रतिज्ञा को पुनः स्मरण कराने का अवसर प्रदान करता है, जिसे संसद ने पूरे राष्ट्र की ओर से व्यक्त किया था। 22 फरवरी का यह संकल्प दिवस इसी राष्ट्रीय चेतना, इसी ऐतिहासिक स्मृति और इसी अटूट संकल्प का जीवंत प्रतीक है।

Tags: 22 feb pojk sankalp diwaspakistan occupied kashmirParliamentary Resolution of 22 February 1994POJKSankalpdiwasपाक अधिकृत कश्मीर
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