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क्या धर्म पर्यावरण की रक्षा कर सकता है? ‘बिश्नोईज़ एंड द ब्लैकबक’ के माध्यम से अनु लाल का एक जरूरी सवाल

302 पृष्ठों और 15 अध्यायों वाली यह पुस्तक केवल रेगिस्तान में  रहने वाले बिश्नोई समाज पर लिखी गई एक सामान्य पुस्तक नहीं है, बल्कि यह आधुनिक पर्यावरण संकट के बीच भारतीय जीवनदृष्टि पर एक गंभीर, अत्यंत महत्त्वपूर्ण और विचारोत्तेजक कृति है।

Dr. Mahender द्वारा Dr. Mahender
9 February 2026
in समीक्षा
Anu Lal

लेकिन अनु लाल ने 'बिश्नोईज़ एंड द ब्लैकबक' नाम की पुस्तक लिखी है

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आज का युग अभूतपूर्व विकास और तकनीकी प्रगति का युग है, रील्स का दौर है, जीवन की भागदौड़ इतनी तेज है कि ‘ठहराव’ शब्द अब विचित्र लगने लगा है। इसी के साथ पर्यावरण संकट भी गहराता जा रहा है, जंगल कट रहे हैं, नदियाँ सूख रही हैं, हवा और पानी प्रदूषित हो चुके हैं और प्रकृति से मनुष्य का रिश्ता लगातार टूटता जा रहा है। हाँ ! प्रकृति के निकट जाने की बातें बहुत हो रही हैं, भले ही आचरण में ये सब न हो। जहाँ तक पर्यावरण की समस्या का प्रश्न है तो इसे हम अक्सर कानूनों, नीतियों और वैज्ञानिक आँकड़ों के माध्यम से देखने की कोशिश करते हैं। ऐसे में प्रश्न यह है कि क्या यह संकट केवल तकनीकी आधारित हैं? उत्तर खोजेंगे तो पायेंगे, नहीं यह तकनीकी नहीं है, बल्कि मूलतः मानवीय दृष्टिकोण और मूल्यबोध का संकट है। जब मनुष्य स्वयं को प्रकृति का स्वामी समझने लगता है और उसे केवल उपभोग की वस्तु बना देता है, तब विनाश होना निश्चित है। ऐसे समय में यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हो उठता है कि क्या पर्यावरण संरक्षण के लिए केवल आधुनिक उपाय पर्याप्त हैं या हमें अपनी प्राचीन सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपराओं, विशेषकर सनातन धर्म की प्रकृति केंद्रित जीवनदृष्टि की ओर फिर से लौटकर देखने की आवश्यकता है?

इसी संदर्भ में हाल ही में अंग्रेजी भाषा में लिखी हुई एक पुस्तक हाथ लगी। पुस्तक का शीर्षक है ‘Bishnois and the Blackbuck: Can Dharma Save the Environment?’ इस पुस्तक की लेखिका हैं ‘अनु लाल’ और प्रकाशित किया है ‘वितस्ता प्रकाशन’ ने। 302 पृष्ठों और 15 अध्यायों वाली यह पुस्तक केवल रेगिस्तान में  रहने वाले बिश्नोई समाज पर लिखी गई एक सामान्य पुस्तक नहीं है, बल्कि यह आधुनिक पर्यावरण संकट के बीच भारतीय जीवनदृष्टि पर एक गंभीर, अत्यंत महत्त्वपूर्ण और विचारोत्तेजक कृति है। यह पुस्तक पाठक को यह समझने का अवसर देती है कि पर्यावरण संरक्षण केवल कानूनों, नीतियों और आँकड़ों का विषय नहीं, बल्कि एक गहरा नैतिक और आध्यात्मिक प्रश्न भी है।

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आज जब भी ‘बिश्नोई’ शब्द कहीं आता है तो अधिकतर लोगों को सलमान खान का काला हिरण शिकार मामला या हाल की कुछ आपराधिक घटनाएँ याद आती हैं। ऐसे में यह पुस्तक बिश्नोई समाज की इस ‘अधूरी’ और ‘विकृत छवि’ को तोड़ती है। लेखिका बताती हैं कि बिश्नोई समाज असल में उन विरले समुदायों में से है, जिसने विगत पाँच सौ वर्षों से अधिक समय तक पेड़-पौधों और पशु-पक्षियों की रक्षा को अपने धर्म का अनिवार्य कर्तव्य माना है। उनके लिए प्रकृति कोई संसाधन नहीं, बल्कि माता समान पूज्य और बालक समान लालन पालन का धर्म है।

जैसा कि पाठक पुस्तक के शीर्षक में भी देखेंगे, इस पुस्तक का मूल प्रश्न बहुत सीधा, लेकिन अत्यंत गहरा है, और वह है, “क्या धर्म पर्यावरण की रक्षा कर सकता है?” पुस्तक में इस प्रश्न का उत्तर बहुत विस्तार से अनेक कोणों और प्रमाणों से देने का उत्कृष्ट प्रयास किया गया है। लेखिका का उत्तर किसी नारे की तरह नहीं आता, बल्कि बिश्नोई जीवन पद्धति के उदाहरणों से धीरे-धीरे उभरता है। गुरु जंभेश्वर (जम्भों जी) जी द्वारा प्रतिपादित 29 नियमों के माध्यम से बिश्नोई समाज ने यह दिखाया है कि यदि मनुष्य स्वयं को प्रकृति का मालिक नहीं, बल्कि उसका रक्षक माने, तो पर्यावरण संरक्षण स्वाभाविक हो जाता है।

पुस्तक की एक बड़ी विशेषता यह है कि यह आधुनिक सोच की एक बड़ी कमी की ओर ध्यान दिलाती है। आज हम पर्यावरण को केवल कार्बन उत्सर्जन, जलवायु परिवर्तन और विकास बनाम प्रकृति के रूप में देखते हैं, लेकिन यह पुस्तक संकेत करती है कि असली समस्या इससे कहीं अधिक गहरी है, जिसके अनुसार हमने प्रकृति के साथ अपना भावनात्मक और आध्यात्मिक संबंध खो दिया है।

लेखिका अपने निजी अनुभवों के माध्यम से यह भी स्वीकार करती हैं कि आधुनिक शिक्षित समाज में ‘धर्म’ शब्द को पिछड़ा या अवैज्ञानिक मान लिया गया है। हम कहते हैं, “हम आध्यात्मिक हैं, धार्मिक नहीं।” इसी सोच के कारण हम पश्चिम से पर्यावरण के मॉडल तो अपनाते हैं, लेकिन अपने ही ग्रंथों, परंपराओं और समुदायों में छिपी पर्यावरणीय समझ को भूल जाते हैं। पुस्तक यह भी बताती है कि रामायण, महाभारत जैसे शास्त्रों और ‘भूत-ऋण’ जैसी अवधारणाओं में पहले से ही पर्यावरण संरक्षण जैसी गहरी सोच अथवा चेतना विद्यमान थी। भारतीय परंपरा में प्रकृति जीवन का केंद्र रही है, इसमें जंगल, पर्वत, नदियाँ आदि सब जीवित सत्ता मानी गईं हैं।

बिश्नोई समाज को लेखिका पहला नहीं, बल्कि आख़िरी ‘इको-वारियर्स’ कहती है, क्योंकि बाकी समाज धीरे-धीरे उस चेतना से दूर होता गया, जबकि बिश्नोई समाज के लोग आज भी उसी मूल भाव में टिके हुए हैं। अध्याय 3 में इस पर विस्तार से चर्चा की गई है। पर्यावरण और वन्य जीवों के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले बलिदानियों की एक आंशिक सूचि पुस्तक के अध्याय 4 में दी गई, इसी तरह अध्याय 5 में खेजड़ली की घटना का वर्णन है, जिसमें 363 बिश्नोई समाज के लोगों ने पेड़ों की रक्षा के लिए अपने प्राण दे दिए, यह अध्याय पाठक को झकझोर देगा और उसके सामने पर्यावरण रक्षक बिश्नोई समाज का वास्तविक रूप प्रकट करेगा। इसी अध्याय में आपको जम्भों जी महाराज द्वारा बिश्नोई समाज के लिए प्रतिपादित 29 नियम भी मिलेंगे। इन नियमों का पालन वास्तव में हर मनुष्य को करना चाहिए।

आठवें अध्याय में इस बहस को भी प्रमाणों के आधार पर विराम देने का प्रयास किया गया है कि बिश्नोई हिंदू हैं या मुस्लिम? अध्याय 9 ‘द बिश्नोई इफ़ेक्ट’ पाठक को यह तथ्य अच्छे से समझाएगा कि जहाँ भी बिश्नोई हैं वहाँ प्रकृति अपने विराट रूप में फलती फूलती है और जहाँ वे नहीं होते हैं वहाँ पर्यावरण संबंधी समस्या विकराल होती है। अध्याय 15 बिश्नोई समाज के पुरुषार्थ, त्याग और बलिदान के आधार पर इस प्रश्न का उत्तर देता है कि क्या धर्म पर्यावरण की रक्षा कर सकता है? पुस्तक के परिशिष्ट से पाठक को सलमान खान और काले हिरण प्रकरण से जुड़ी विस्तृत जानकारी मिलेगी और खेजड़ली की घटना में 363 बलिदानियों की सूचि भी।   

भाषा की दृष्टि से यह पुस्तक सरल, स्पष्ट और संवेदनशील है। इसमें शोध और अनुभव दोनों का मिश्रण है। यह हर वर्ग के पाठक को भी सोचने पर मजबूर करती है कि हम जिस ‘विकास’ की बात कर रहे हैं, वह वास्तव में किस कीमत पर हो रहा है। कुल मिलाकर, Bishnois and the Blackbuck: Can Dharma Save the Environment? एक ऐसी पुस्तक है जो हमें अतीत में लौटने के लिए नहीं, बल्कि अपनी जड़ों को पहचानकर भविष्य को बचाने के लिए प्रेरित करती है। यह पुस्तक हमें याद दिलाती है कि पर्यावरण को बचाने का सबसे गहरा रास्ता बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर से होकर जाता है। प्रश्न केवल इतना है कि क्या हम उस रास्ते पर चलने का साहस रखते हैं?

पुस्तक का नाम: Bishnois and the Blackbuck: Can Dharma Save the Environment?
लेखिका: अनु लाल

प्रकाशक: वितस्ता, दिल्ली

पृष्ठ: 302

मूल्य: 695 (प्रिंट)

 

Tags: Anu lallBishnoisBishnois and the Blackbuck: Can Dharma Save the EnvironmentBook ReviewVitasta Publication
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