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पहचान और राष्ट्रीय चेतना की वैचारिक यात्रा: ‘इंडिया से भारत एक प्रवास

लेखन शैली ऐसी है कि आप पढ़ते जाएँगे और आँखों के सामने एक ‘फिल्म’ चलती रहेगी. हर अध्याय अनमोल है, अपने भीतर ‘गागर में सागर’ समाए हुए है

Dr. Mahender द्वारा Dr. Mahender
7 April 2026
in इतिहास, चर्चित, समीक्षा
पहचान और राष्ट्रीय चेतना की वैचारिक यात्रा: ‘इंडिया से भारत एक प्रवास

इंडिया से भारत एक प्रवास

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‘भारत’ दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यता, संस्कृति और चेतना का जीवंत प्रतीक है। इसकी भूमि पर हर संघर्ष, हर सपना और हर परंपरा हमें हमारी पहचान याद दिलाती है और भविष्य की संभावनाओं की ओर सोचने के लिए प्रेरित करती है। एक समय ऐसा आया कि भारत का नाम ‘इंडिया’ हुआ। कहा जाने लगा ‘इंडिया अर्थात् भारत’ या ‘इंडिया दैट इज भारत’। क्या यह मात्र नामकरण ही था या किसी रूपांतरण और मानसिक बदलाव का प्रतीक था? क्या इस परिवर्तन ने केवल एक शब्द बदला या हमारी पहचान, हमारे दृष्टिकोण और सामर्थ्य में भी बदलाव किया? आखिर ‘भारतीय मानसिकता’ पर ‘औपनिवेशिक मानसिकता’ का क्या प्रभाव पड़ा? ऐसे बहुत से प्रश्न हैं और उत्तर इतिहास में दबे हुए हैं।

इन्हीं प्रश्नों और अंतर्दृष्टियों को उजागर करती हुई एक पुस्तक हाल ही में प्रकाशित हुई। शीर्षक है ‘इंडिया से भारत एक प्रवास’, लेखक हैं मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त करने वाली पुस्तक ‘वे पंद्रह दिन’ और विनाशपर्व, भारतीय ज्ञान का खजाना एवं ‘खजाने की शोधयात्रा’ जैसी पुस्तकों के रचियता सुप्रसिद्ध साहित्यकार ‘प्रशांत पोल’ और प्रकाशक है, देश का सुप्रसिद्ध ‘प्रभात प्रकाशन’। 206 पृष्ठों की 11 अध्यायों वाली इस पुस्तक की प्रस्तावना लिखी है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने। संघ के सरसंघचालक की दिनचर्या बहुत व्यस्त होती है, ऐसे में समय निकालकर उनके द्वारा किसी पुस्तक की प्रस्तावना लिखना, उस पुस्तक को विशेष और अत्यंत महत्त्वपूर्ण बनाता है।

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प्रस्तावना के बाद लेखक ने ‘अपनी बात’ की है और अपनी बात की शुरुआत एक ऐसी दुखद और चौकाने वाली घटना से की है कि भारतीयों का सिर दुःख और शर्म से झुक जाए और गुस्सा अपनी चरम सीमा लाँघ दे। उस घटना के बाद भारत सरकार द्वारा कुछ न करना, उस गुस्से की आग में घी डालना जैसा होगा। यह सत्य है, यह इतिहास है अर्थात् ऐसा ही हुआ है। जैसे-जैसे पाठक लेखक की बात पढ़ता हुआ आगे बढेगा उसके अंतर्मन में एक यात्रा अथवा प्रवास शुरू हो जाएगा। और ये यात्रा तब तक जारी रहेगी, जब तक पाठक पूरी पुस्तक पढ़ नहीं लेगा। पूरी पुस्तक पढ़े बिना वह नहीं रह पायेगा, कम से कम मेरा अनुभव तो ऐसा ही है।

लेखन शैली ऐसी है कि आप पढ़ते जाएँगे और आँखों के सामने एक ‘फिल्म’ चलती रहेगी। हर अध्याय अनमोल है, अपने भीतर ‘गागर में सागर’ समाया हुआ है। पाठक के लिए आक्रोश, भावुकता, गर्व, उत्साह, सीख, सब कुछ है इसमें।

जैसे-जैसे आप पुस्तक पढ़ते जाएँगे तो आपको ज्ञात होगा कि इसमें कुछ कहानियाँ ऐसी भी हैं, जिन्हें ‘इंडिया’ ने इतिहास के पन्नों में दबा दिया था। ये ऐसी कहानियाँ हैं, जिनका हमें पता होना चाहिए था, लेकिन ये हमसे छुपाई गईं। इन्हें पढ़ते ही पाठक का आक्रोशित होना स्वाभाविक है। प्रथम अध्याय में जिन दो घटनाओं का वर्णन है, उनसे हर देशभक्त भारतीय को बहुत दुःख होगा। विश्व का सिरमौर रहे ‘भारत’ की ऐसी हालत देखकर दुःख नहीं होगा, तो और क्या होगा! इसी अध्याय में पाठकों को पता चलेगा कि उस समय दुनिया भारत को किस दृष्टिकोण से देखती थी, 1968 में आई हॉलीवुड की फिल्म ‘द पार्टी’ किसी सोच के तहत बनाई गई थी। इसके साथ ही पता चलेगा नेहरूवादी आर्थिक मॉडल की वास्तविकता का या यूँ कहें आंकड़ों के साथ पोल खुलेगी।

औपनिवेशिक सोच के दुष्प्रभाव के कारण ‘भारत’ का ‘इंडिया बना और आज तक यह मानसिकता बनी हुई है कि विदेशी या अंग्रेजी भाषा जो बोलेंगे, वही सबसे अच्छा और प्रामाणिक है। खासकर लेफ्ट-लिबरल लॉबी और उसके अनुयायी तो यही मानते हैं। लेखक ने पुस्तक के दूसरे अध्याय में इसी मानसिक ‘विकृति’ का उपयोग यह सिद्ध करने के लिए किया है कि भारत हीन-दीन और लाचार नहीं था। उन्होंने एंगस मेडिसन, स्ट्रोबो, विलियम डेलरिम्पल आदि के हवाले से आंकड़ों के आधार पर बताने का प्रयास किया है कि अतीत में भारत विश्व में सबसे आगे था। यह अध्याय वास्तव में प्राचीन भारत का स्वर्णिम चित्र जैसा है और यह पाठक को गर्व की अनुभूति कराएगा। इस अध्याय में पता चलेगा कि चीन ने आक्रान्ताओं के आक्रमण से बचने के लिए अंतरिक्ष से दिखने वाली ‘दीवार’ निर्मित की थी, जबकि भारत के वीर पुत्रों ने अपनी छातियों की दीवार बनाकर आक्रान्ताओं का सामना किया और उन्हें पराजित करते रहे।

तीसरा अध्याय स्वतंत्रता के बाद के संघर्ष को उजागर करता है। यहाँ तीन बड़ी घटनाओं के बारे में जानकारी मिलेगी, जिनके कारण अंग्रेजों को भारत छोड़कर भागना पड़ा। इस अध्याय में यहूदियों के उद्धरण से यह भी पता चलेगा कि वास्तव में योजना कैसी होनी चाहिए और उसका क्रियान्वयन कैसे करना चाहिए? इसके साथ ही ‘शिक्षा’ को लेकर भारत के साथ हुई सबसे बड़ी ‘राजनैतिक साजिश’ का भी पता चलेगा। इसी अध्याय में इंदिरा गाँधी ने थारपारकर के सिंधी भाषी हिंदुओं के साथ धोखा किया था, उसका भी पर्दाफाश होगा। यह अध्याय पाठक को भीतर से झकझोर देगा।

चौथे अध्याय से पता चलेगा कि कैसे 2-3 अपवाद स्वरूप अवसरों को छोड़कर स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से लेकर वर्ष 2014 तक कांग्रेस सरकारों ने ‘राष्ट्र प्रथम’ के विचार से काम करने वालों के साथ राजनैतिक अस्पृश्यता की गई, उन्हें मुख्यधारा में नहीं लिया, बल्कि समय-समय पर दमन करने के कृत्य करती रहीं। पाँचवां अध्याय इंदिरा गाँधी और संजय गाँधी के अमानवीय चरित्र से अवगत कराएगा. जिन्होंने 1975 में नागरिकों के अधिकारों और संविधान की हत्या करके आपातकाल थोपा था। आकंड़ों सहित प्रस्तुत आपातकाल के उस कलुष कालखंड का वर्णन पाठक को भावुक कर सकता है। आपातकाल के दौरान और दिल्ली के तुर्कमान गेट पर हुई अमानवीय घटनाओं लेकर इतना मार्मिक वर्णन मैंने पहले नहीं पढ़ा था। देशभक्त निर्दोष राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं को दी गई अमानवीय यातनायें और जेलों में बंद प्रताड़ना के शिकार 98 स्वयंसेवकों की मृत्य जैसा विवरण पाठक को भीतर तक हिला देगा। एक ऐसी फिल्म आँखों के सामने चलती रहती है, मानो आप स्वयं उन घटनाक्रमों का हिस्सा हो।

छठे अध्याय में विभिन्न राजनैतिक दलों के नेतृत्व में ‘इंडिया’ का दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण तथा पीड़ा देने वाला चित्रण जारी रहता है। त्रिपुरा में आतंकियों द्वारा संघ के कार्यकर्ताओं की अपहरण के बाद हत्या और पंजाब के मोगा में आतंकियों द्वारा सुबह शाखा में गोली मारकर 25 स्वयंसेवकों की हत्या का वर्णन कष्टदायक है। इस अध्याय में ‘इंडिया’ से ‘भारत’ की ओर होने वाले बदलाव की पृष्ठभूमि का संकेत भी है। सातवें अध्याय में नेहरू के समय हुए जीप घोटाले से लेकर 2014 से पहले तक सभी घोटालों की एक झलक प्रस्तुत की गई है। यह जानना दुखद है कि जो समय और संसाधन भारत के उन्नयन के लिए लगने चाहिए थे, उनका उपयोग कांग्रेस के नेता घर भरने के लिए कर रहे थे। इसी अध्याय में बदलाव की उस आहट का संकेत भी है, जिसके साक्षी भारतवासी 2014 में बने थे। अध्याय 8 और 9 में ‘इंडिया’ से ‘भारत’की ओर उठाए गए कदमों और उनके प्रभाव का अत्यंत रोचक वर्णन किया गया है। ये अध्याय ‘गूजबम्प्स’ देते हैं। जम्मू-कश्मीर में प्रभावी अनुच्छेद 370 और 35 A के निरस्तीकरण को लेकर ‘चाणक्य नीति’ के प्रत्यक्ष क्रियान्वयन का वर्णन आपको ठीक वैसा ही आनंद देगा, जैसा कि भारतीय सेना या क्रिकेट टीम द्वारा पाकिस्तान की पिटाई के समय आता है। इसके साथ ही वैश्विक महामारी कोविड को भारत ने कैसे अवसर में बदला, उसका विवरण भी प्रेरक और सुखद है। यहाँ आपको पता चलेगा कि भारत ने दुनिया के बड़े भाई होने का दायित्व कैसे निभाया था। यहाँ पता चलेगा कि केंद्र सरकार ने प्रत्यक्ष रूप से छत्रपति शिवाजी महाराज की नीति का उपयोग कैसे किया था और यह उद्घोष चरितार्थ किया था कि ‘ये नया भारत है’। अध्याय 10 ‘इंडिया से ‘भारत’ में हुए बदलाव के कारकों को बहुत ही रोचक ढंग से प्रस्तुत करता है और अध्याय 11 अधिकांश क्षेत्रों में वैश्विक स्तर पर भारत के प्रदर्शन का उत्साहवर्धन करने वाला चित्रण प्रस्तुत करता है।

कुल मिलाकर प्रशांत पोल जी की ‘इंडिया से भारत एक प्रवास’ पुस्तक भावनाओं के ‘रोलर कोस्टर’ जैसा रोचक अनुभव है। उनकी प्रवाहपूर्ण और विचारोत्तेजक लेखनशैली पाठक को केवल इतिहास के घटनाक्रम तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उसे अंतर्मुखी बनाकर उस मानसिक और सांस्कृतिक संघर्ष की गहराई में ले जाती है, जिसने स्वतंत्रता के बाद भी भारतीय समाज की सोच और पहचान को प्रभावित किया। इस दृष्टि से यह पुस्तक न केवल अतीत और वर्तमान के बीच एक सेतु का करती है, बल्कि भविष्य में एक आधुनिक, उन्नत और आत्मनिर्भर भारत की कल्पना करने के लिए प्रेरित भी करती है। वास्तव में यह पुस्तक औपनिवेशिक मानसिकता (इंडिया) बनाम भारतीय पहचान के संघर्ष और भारत के सांस्कृतिक व सभ्यतागत पुनरुत्थान पर केंद्रित है।

पुस्तक के बारे में संक्षेप में लिखना हो तो प्रस्तावना में डॉ.मोहन भागवत जी के शब्द सर्वोत्कृष्ट हैं, “श्री प्रशांत पोल की यह पुस्तक भारत की भारतीयता के, स्वाधीन भारत में औपनिवेशिक मानसिकता से चले संघर्ष की समीक्षा है। पाठकों को इसके पठन से भारत को अपनी शाश्वत नींव पर पक्के खड़े युगानुकूल भारत के रंग-रूप-आकार की अचूक कल्पना करने की दृष्टि तथा उस भारत की साकार करने की शक्ति प्राप्त होगी, यह विश्वास है।” पुस्तक ऑनलाइन उपलब्ध है। नारायणायेती समर्पयामि…….

पुस्तक का नाम: इंडिया से भारत एक प्रवास

लेखक: प्रशांत पोल

प्रकाशक: प्रभात प्रकाशन, दिल्ली

पृष्ठ: 206

मूल्य: 400 (प्रिंट)

Tags: 100 Years of RSSBook ReviewBooksdr mahender thakurIndia Se Bharat Ek PravasPrabhat PrakashanPrashant Poleइंडिया से भारत एक प्रवासप्रभात प्रकाशनप्रशांत पोलभारतभारत की सभ्यता
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