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दिल्ली की एक शाम: जैसे दो घंटे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ बिताए हों

SPMRF द्वारा दिल्ली के कमानी ऑडिटोरियम में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन चरित्र पर आधारित नाट्य संध्या का आयोजन किया गया

Dr. Mahender द्वारा Dr. Mahender
7 July 2026
in इतिहास, संस्कृति
दिल्ली की एक शाम: जैसे दो घंटे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ बिताए हों

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन पर आधारित नाटक का एक दृश्य

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कहते हैं संयोग और चमत्कार इस दुनिया में होते हैं। कुछ ऐसा ही मेरे साथ भी घटित हुआ। एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक के अनुवाद कार्य में लगा हुआ हूँ। अचानक दिल्ली यात्रा पर आना पड़ा। यात्रा पर आने से पहले अनुवाद कार्य जहाँ रुका, वहाँ लिखा है, “दुर्भाग्यवश, जनसंघ के संस्थापक और प्रथम अध्यक्ष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का दो वर्ष से भी कम समय बाद, 23 जून 1953 को श्रीनगर में रहस्यमयी परिस्थितियों में निधन हो गया। मुखर्जी 21 मई 1953 को जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 के विरोध में कश्मीर गए थे। उस समय उनका नारा, “एक देश में दो निशान, दो प्रधान, दो विधान, नहीं चलेंगे, नहीं चलेंगे”, पूरे भारत में लोकप्रिय हो गया था।” आगे का अनुवाद कार्य शेष है। लेकिन प्रारब्ध की योजना कुछ और थी, इसलिए ‘चमत्कार’ जैसे शब्द का प्रयोग किया।

पिछले कल यानी 6 जुलाई 2026 को दिल्ली के ‘कमानी ऑडिटोरियम’ में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन पर आधारित नाट्य मंचन देखने का अवसर मिला। यह भव्य आयोजन श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन (SPMRF) ने कराया था। अनुवाद कार्य करते समय मैंने सोचा भी नहीं था कि जो लिख रहा हूँ, उसका प्रत्यक्ष अनुभव करूंगा और वो भी इतना जल्दी। लेकिन यह घटित हुआ और भीतर तक झकझोर गया। अद्भुत, अकल्पनीय जैसे शब्द मेरी अनुभूति के सामने फीके प्रतीत हो रहे हैं। अभी तक निर्णय नहीं ले पा रहा हूँ कि यह नाट्य मंचन था या इतिहास जीवंत रूप में प्रकट हो गया था। यही कारण है कि यात्रा पर होने के बावजूद भी मैं अपना अनुभव लिखने के लिए विवश हो गया।

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वास्तव में यह एक नाट्य मंचन न होकर आधुनिक भारत के एक ‘राष्ट्रनायक’ के जीवन को नई पीढ़ी के सामने जीवंत रूप में रखने का सफल प्रयास था। पूरा समय मुझे ऐसा लग रहा था मानो मैं साक्षात ‘हिंद केसरी’ डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ प्रत्यक्ष रूप में हूँ। इसे केवल एक सांस्कृतिक प्रस्तुति कहना अन्याय होगा, वास्तव में यह इतिहास के उन विशेष पन्नों में प्रत्यक्ष प्रवेश करने जैसा अनुभव था, जिन्हें अक्सर हम पढ़ते तो हैं, पर महसूस नहीं कर पाते। नाट्य मंचन के दौरान लगभग दो घंटे तक ऐसा लगा मानो मैं दर्शक दीर्घा में नहीं था, बल्कि स्वयं डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ उनके जीवन के हर पल, संघर्षों, निर्णयों और विचारों की यात्रा में साथ था।

इतिहास की सबसे बड़ी चुनौती यही होती है कि वह तिथियों, घटनाओं और नामों में सिमटकर रह जाता है। हम उसे पढ़ते तो हैं लेकिन जी नहीं पाते। लेकिन वही इतिहास जब रंगमंच पर जीवंत हो उठता है, तब वह केवल जानकारी नहीं देता, बल्कि भावनाओं अथवा संवेदनाओं के उफान भी लाता है। इस नाट्य प्रस्तुति ने अक्षरशः ऐसा ही किया। नेहरु ने अपने स्वार्थसिद्धि के लिए जिस तरह की कुटिल राजनीति की थी और श्यामा प्रसाद मुखर्जी, सरदार वल्लभ भाई पटेल ने जिस तरह हर बार उन्हें टोका और सावधान किया था, उसका मंचन देखकर भावुक होना और क्रोधित होना स्वाभाविक था और ऐसा ही हुआ भी। मंच पर संवाद थे, संगीत था, प्रकाश व्यवस्था थी, अभिनय था, लेकिन इन सबसे बढ़कर उसमें एक “आत्मा” थी, जिसने पूरे सभागार को अंत तक बाँधे रखा।

नाटक की सबसे बड़ी विशेषता इसका संतुलन था। इसमें डॉ. मुखर्जी के परिवार, बचपन, राजनीतिक जीवन, वैचारिक स्पष्टता, राष्ट्र के प्रति समर्पण और उनके व्यक्तिगत व्यक्तित्व को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया। उनके जीवन के विभिन्न प्रसंगों को ऐसे पिरोया गया था कि दर्शक कहीं भी बोझिल महसूस नहीं कर पा रहा था। कम से कम मेरे साथ तो ऐसा ही था। प्रत्येक दृश्य अगले दृश्य की भूमिका बनता गया और कथा निरंतर प्रवाहमान बनी रही।

कलाकारों के उत्कृष्ट अभिनय ने इस अविस्मरणीय प्रस्तुति को असाधारण अनुभव बना दिया। विशेष रूप से डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की भूमिका निभाने वाले कलाकारों ने, उन्होंने केवल उनका रूप धारण नहीं किया था, बल्कि उनके व्यक्तित्व की गंभीरता, आत्मविश्वास, करुणा और राष्ट्रनिष्ठा को भी जीवंत रूप में मंच पर उतारने का कार्य दिया। उनके संवादों में दृढ़ता थी, चेहरे के भावों में संवेदनशीलता थी और मंच पर उनकी उपस्थिति पूरे समय प्रभाव बनाए रखती थी। कई बार तो ऐसा लगा कि अभिनेता नहीं, स्वयं डॉ. मुखर्जी हमारे सामने उपस्थित थे।

अनेक दृश्य ऐसे थे जिन्होंने मन को बहुत प्रभावित किया, भीतर तक झकझोरा भी, किन्तु डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और डॉ. भीमराव अंबेडकर के बीच का संवाद और सरदार वल्लभभाई पटेल के नेहरू के साथ संवाद अद्भुत थे। उन्होंने पूरे सभागार को भावविभोर कर दिया।

एक दृश्य में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी व डॉ. आंबेडकर का संवाद

नाटक की तकनीकी प्रस्तुति की प्रशंसा न करूं तो मेरी भूल होगी। मंच सज्जा, प्रकाश संयोजन, पृष्ठभूमि संगीत और दृश्य परिवर्तन इतने स्वाभाविक थे कि कहीं भी प्रस्तुति की गति बाधित नहीं हुई। मंचन के दौरान कई क्षण ऐसे आए जब पूरा सभागार पूर्णतः शांत हो गया। दर्शक केवल सुन नहीं रहे थे, वे उन विचारों को आत्मसात कर रहे थे। रंगमंच की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि वह दर्शक को सोचने के लिए विवश करने की ताकत रखता है। यह नाटक भी केवल अतीत का वर्णन करके समाप्त नहीं हुआ, बल्कि वर्तमान से संवाद स्थापित करता हुआ प्रतीत हुआ।

कार्यक्रम समाप्त होने के बाद भी दर्शकों के मन में वही भाव बना रहा। सभागार से बाहर निकलते समय ऐसा अनुभव था मानो अभी-अभी किसी ऐतिहासिक यात्रा से लौटे हों। बहुत कम नाट्य प्रस्तुतियाँ ऐसी होती हैं जो पर्दा गिरने के बाद भी लंबे समय तक मन और विचारों में जीवित रहती हैं। यह प्रस्तुति उन्हीं दुर्लभ अनुभवों में से एक थी।

इतिहास केवल पुस्तकों में सुरक्षित रहने की वस्तु नहीं है। उसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखने के लिए ऐसे सशक्त सांस्कृतिक प्रयास आवश्यक हैं। यदि युवा पीढ़ी को अपने राष्ट्रनायकों से जोड़ना है, तो रंगमंच जैसा प्रभावी माध्यम अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकता है। श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन का यह प्रयास इसी दिशा में एक उल्लेखनीय कदम है। कमानी ऑडिटोरियम से लौटते समय मेरे मन में केवल एक ही भावना थी कि मैंने कोई नाटक नहीं देखा, बल्कि दो घंटे भारत के एक महान राष्ट्रपुरुष के साथ बिताए। नारायणायेती समर्पयामि ….

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