बिहार में अप्रैल 2016 से लागू पूर्ण शराबबंदी को लेकर एक बार फिर नीतिगत और आर्थिक बहस तेज हो गई है। नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAER) की नवीनतम अध्ययन रिपोर्ट (Macro Perspective of Bihar’s Development) ने राज्य के विकास मॉडल और शराबबंदी के प्रभावों पर एक नई रिपोर्ट पेश की है। रिपोर्ट के अनुसार जिन सामाजिक सुधार और अपराध पर लगाम लगाने उद्देश्य से शराबबंदी लागू की गई थी, वह अपने मुख्य लक्ष्यों को हासिल करने में नाकाम रही है।
किसने जारी की है यह रिपोर्ट ?
यह विस्तृत विश्लेषणात्मक रिपोर्ट देश के प्रतिष्ठित और अग्रणी आर्थिक थिंक–टैंक नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAER) द्वारा जारी की गई है। NCAER भारत की सबसे पुरानी और स्वतंत्र आर्थिक नीति अनुसंधान संस्थाओं में से एक है, जो केंद्र और राज्य सरकारों की विकास नीतियों और विभिन्न विषयों पर डेटा–आधारित अध्ययन करती है।
महिलाओं के खिलाफ अपराध घटने के बजाय बढ़े

रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल 2016 में शराबबंदी लागू करने का सबसे बड़ा तर्क यह था कि शराब की खपत घरेलू हिंसा और महिलाओं के साथ उत्पीड़न का मुख्य कारण है। महिला संगठनों ने भी इसका पुरजोर समर्थन किया था। हालांकि, रिपोर्ट का दावा है कि साल 2016 के बाद से आंकड़ों के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि बिहार में महिलाओं के खिलाफ दर्ज कुल अपराधों में कोई व्यापक गिरावट नहीं आई, बल्कि इनमें बढ़ोतरी ही दर्ज की गई। रिपोर्ट के अनुसार उपलब्ध साक्ष्य यह साबित नहीं करते कि शराबबंदी से महिलाओं की सुरक्षा स्थिति में कोई संरचनात्मक सुधार हुआ है।
राजस्व का भारी नुकसान और बढ़ता वित्तीय घाटा
आर्थिक दृष्टिकोण से शराबबंदी का बिहार के खजाने पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। प्रतिबंध लागू होने से पहले के तीन वर्षों में आबकारी शुल्क (Excise Duty) बिहार सरकार के स्वयं के राजस्व का लगभग 14 प्रतिशत हिस्सा हुआ करता था। बैन के बाद यह राजस्व शून्य हो गया। दूसरी ओर, तस्करी रोकने, पुलिस गश्त और अदालती मुकदमों पर प्रवर्तन खर्च (Enforcement Expenditure) काफी बढ़ गया, जिससे राज्य का वित्तीय घाटा और अधिक बढ़ गया है।
अवैध शराब का समानांतर नेटवर्क, भ्रष्टाचार और ड्रग्स का प्रसार
रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि शराबबंदी के बाद बिहार में अवैध शराब का समानांतर और विशाल नेटवर्क तैयार हो गया है। इसके चलते पुलिस व प्रशासनिक स्तर पर भ्रष्टाचार और संगठित अपराध में वृद्धि हुई है। इसके अलावा, शराब की अप्राप्यता के कारण युवाओं और समाज में अन्य खतरनाक नशीले पदार्थों जैसे ड्रग्स का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है, जो एक नई सामाजिक चुनौती बन रहा है।
शराबबंदी हटाकर आबकारी शुल्क की बहाली
NCAER का आंकलन है कि बिहार को अपने कर राजस्व को बढ़ाने के लिए मुख्य तौर पर तीन क्षेत्रों– वस्तु एवं सेवाओं पर कर, कर व पंजीकरण शुल्क, और भू–राजस्व पर ध्यान देना चाहिए। इन तीनो क्षेत्रों के बारे में संस्थान ने अपनी राय भी जाहिर की है। मगर रिपोर्ट के दावा है कि बिहार में भू–राजस्व बढ़ाने की गुंजाइश करीब करीब शून्य है। कारण बिहार में भूमि के लगातार टुकड़े होने (Inheritance) के कारण 99 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों के पास 2 हेक्टेयर से कम और 95 प्रतिशत के पास 1 हेक्टेयर से कम जमीन है। ये छोटे और सीमांत किसान हैं, जिनकी आय बेहद सीमित है। इसलिए भू राज्सव (Land Revenue) बढ़ाना व्यावहारिक नहीं है। NCAER की सिफारिश है कि इन सब की बजाय राज्य को शराबबंदी हटानी चाहिए। इससे मिलने वाली एक्साईज ड्यूटी, कुल राजस्व का करीब 14 % होगा। ये आकलन शराबबंदी से पहले तीन सालों के राजस्व आकंड़ो के आधार पर किया गया है।
बिहार में शराबबंदी के 10 साल
बिहार में शराबबंदी का सफर 1 अप्रैल 2016 से शुरू हुआ, जब राज्य सरकार ने पहले चरण में देसी और मसालेदार शराब पर पूरी तरह बैन लगाया। इसके ठीक चार दिन बाद, 5 अप्रैल 2016 को नीतीश सरकार ने कैबिनेट बैठक कर विदेशी शराब सहित पूरे राज्य में पूर्ण मद्यनिषेध लागू करने की घोषणा कर दी। इसके बाद ‘बिहार मद्यनिषेध और उत्पाद अधिनियम, 2016′ पारित किया गया। कानून को सख्त बनाने के लिए 2018, 2020 और 2022 में संशोधन किए गए, जिनमें वाहनों की जब्ती, परिसर सील करने और भारी जुर्माने के साथ पहली बार पीने पर राहत जैसे प्रावधान जोड़े गए।
शराबबंदी पर राजनीतिक पार्टियों का रुख
पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और जेडीयू शराबबंदी को एक सामाजिक क्रांति मानते हैं। पार्टी का कहना है कि इससे लाखों परिवारों का जीवन सुधरा है, घरेलू कलह कम हुई है और आर्थिक बचत हुई है, इसलिए इसे किसी कीमत पर वापस नहीं लिया जाएगा।
सत्ता में जेडीयू की सहयोगी होने के नाते बीजेपी आधिकारिक तौर पर शराबबंदी कानून का समर्थन करती है, लेकिन पार्टी के नेता अक्सर इसके कमजोर क्रियान्वयन, पुलिस भ्रष्टाचार और जहरीली शराब से होने वाली मौतों को लेकर सवाल उठाते रहे हैं।
विपक्ष शराबबंदी हटाने के पक्ष में
मुख्य विपक्षी दल राजद (राष्ट्रीय जनता दल) का आरोप है कि बिहार में शराबबंदी पूरी तरह विफल है और इसने एक नया ‘शराब माफिया‘ पैदा कर दिया है। राजद का तर्क है कि कानून का शिकार गरीब और दलित हो रहे हैं, जबकि असली तस्कर खुले घूम रहे हैं।
जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर शराबबंदी के सबसे बड़े आलोचक हैं। उन्होंने खुला ऐलान किया है कि यदि उनकी सरकार बनती है तो वे 1 घंटे के भीतर शराबबंदी खत्म कर देंगे। उनका कहना है कि इस नीति से बिहार को सालाना 20,000 करोड़ रुपये से अधिक के राजस्व का नुकसान हो रहा है, जिसे राज्य में विश्वस्तरीय शिक्षा और रोजगार पर खर्च किया जा सकता था। ऐसे में ये देखना दिलचस्प होगा कि इस नई रिपोर्ट के बाद शराबबंदी पर चर्चा क्या मोड़ लेती है ।































