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हिन्दू समाज के संगठन, सेवा और समरसता की यात्रा: विश्व हिन्दू परिषद्

29 अगस्त 1964 को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के शुभ पर्व पर भारत की संत शक्ति के आशीर्वाद के साथ विश्व हिन्दू परिषद् की स्थापना मुंबई के सांदीपनी साधनालय आश्रम में हुई थी।

Vishal Nadda द्वारा Vishal Nadda
4 September 2026
in ज्ञान, मत
हिन्दू समाज के संगठन, सेवा और समरसता की यात्रा: विश्व हिन्दू परिषद्

विश्व हिंदू परिषद की स्थापना 29 अगस्त 1964 (श्री कृष्णजन्माष्टमी) के दिन हुई थी

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हिन्दवः सोदराः सर्वे, न हिन्दूः पतितो भवेत्

मम दीक्षा हिन्दू रक्षा, मम मन्त्रः समानता

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यही वह भाव है, जिसके साथ विश्व हिन्दू परिषद् की स्थापना की गई थी। 29 अगस्त 1964 को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के शुभ पर्व पर भारत की संत शक्ति के आशीर्वाद के साथ विश्व हिन्दू परिषद् की स्थापना मुंबई के सांदीपनी साधनालय आश्रम में हुई थी। यह केवल एक संगठन की स्थापना नहीं थी, बल्कि हिन्दू समाज को संगठित करने, उसकी धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना को सशक्त करने तथा समाज की सेवा को जीवन का उद्देश्य बनाने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम था।

विश्व हिन्दू परिषद् की स्थापना के समय देश के विभिन्न धार्मिक और सामाजिक क्षेत्रों के प्रमुख संत और हिन्दूनिष्ठ महानुभाव एक मंच पर उपस्थित थे। इस बैठक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री माधव सदाशिव गोलवलकर ‘श्रीगुरुजी’, पूज्य स्वामी चिन्मयानन्द जी, पूज्य संत तुकडोजी महाराज, सिख समाज से मास्टर तारासिंह जी, जैन मुनि सुशील जी, शिवराम आप्टे जी, नेहरू सरकार के पूर्व कैबिनेट मंत्री कन्हैयालाल मुंशी जी तथा विविध सम्प्रदायों के संत और हिन्दूनिष्ठ महानुभाव उपस्थित थे।

समय के साथ विश्व हिन्दू परिषद् का कार्य केवल किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा। हिन्दू समाज को संगठित करना, हिन्दू धर्म की रक्षा करना और समाज की सेवा करना इसके प्रमुख उद्देश्यों के रूप में सामने आए। आज भारत के लाखों गाँवों और कस्बों में विहिप को एक मजबूत, प्रभावी, स्थायी और लगातार बढ़ते हुए संगठन के रूप में देखा जा रहा है। दुनिया भर में हिन्दू गतिविधियों में वृद्धि के साथ एक मजबूत और आत्मविश्वासी हिन्दू संगठन धीरे धीरे आकार ले रहा है।

किसी भी संगठन की वास्तविक शक्ति केवल उसके विचारों में नहीं, बल्कि उसके कार्यों में दिखाई देती है। विश्व हिन्दू परिषद् ने सेवा को अपने कार्य का एक महत्त्वपूर्ण आधार बनाया है। स्वास्थ्य, शिक्षा, आत्मसशक्तिकरण आदि के क्षेत्रों में कुल 6399 सेवा केंद्र कार्य कर रहे हैं। इनमें शिक्षा 3526, स्वास्थ्य 1137, सामाजिक 446 और स्वावलंबन 1290 सेवा केंद्र शामिल हैं। इन सभी सेवा कार्यों के माध्यम से विश्व हिन्दू परिषद् हिन्दू समाज की जड़ों को मजबूत करने का कार्य कर रही है। सेवा का यह विस्तार समाज के उन क्षेत्रों तक पहुँचने का प्रयास है, जहाँ आवश्यकता सबसे अधिक है।

विश्व हिन्दू परिषद् हिन्दू समाज के भीतर व्याप्त कुरीतियों और अस्पृश्यता जैसी सामाजिक बुराइयों के समूल नाश के प्रयासों के माध्यम से हिन्दू समाज की शक्ति के पुनर्जागरण का पुनीत कार्य भी कर रही है। सामाजिक समरसता का यह प्रयास संगठन के उस मूल भाव से जुड़ा हुआ है, जिसमें कहा गया है कि सभी हिन्दू आपस में सहोदर हैं और कोई पतित, निम्न या उच्च नहीं है।

विश्व हिन्दू परिषद् अपने मूल मूल्यों, सिद्धांतों, विश्वासों और नियमों की रक्षा के लिए अनेक मुद्दों को लेकर समाज के बीच सक्रिय रही है। श्री राम जन्मभूमि, श्री राम सेतु, गौ रक्षा, श्री अमरनाथ यात्रा, लव जिहाद, हिन्दू मठ मंदिर मुद्दा, ईसाई चर्च द्वारा हिन्दू धर्मांतरण, इस्लामिक आतंकवाद और बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठ जैसे मुद्दों को उठाकर विश्व हिन्दू परिषद् हिन्दू समाज की संगठित और अदम्य शक्ति के रूप में स्वयं को स्थापित कर रही है। विश्व हिन्दू परिषद् ने अपने प्रभाव से हिन्दू समाज के सभी धर्माचार्यों को एक मंच पर एकत्रित किया है। आज विश्व हिन्दू परिषद् हिन्दू समाज के भीतर अपने विभिन्न आयामों के माध्यम से कार्य कर रही है।

सेवा आयाम के माध्यम से भारत के अति दूरगामी क्षेत्रों में सेवा कार्य करके हिन्दू समाज की सेवा की जा रही है।

गौ रक्षा आयाम के द्वारा भारतीय नस्ल की गौ माता के संरक्षण और संवर्धन का कार्य पूरे भारत में चल रहा है।

सामाजिक समरसता के माध्यम से हिन्दू समाज के भीतर व्याप्त कुरीतियों के समूल नाश का कार्य चल रहा है।

धर्म प्रसार आयाम के माध्यम से हिन्दू समाज के अंदर अपने धर्म से विमुख हो रहे लोगों को पुनः हिन्दू आस्था से जोड़ने का कार्य चल रहा है। भारत में मुगल शासन के दौरान हिन्दू आस्था को बहुत हानि उठानी पड़ी थी और उसका प्रभाव आज भी हिन्दू समाज में देखा जा सकता है। रही सही कसर अंग्रेज पूरी कर गए। अपने आप तो अंग्रेज चले गए, परन्तु अपनी सोच वाले ऐसे भारतीय खड़े कर गए, जिनको भारतीय संस्कृति, मूल्यों, संस्कारों और परम्पराओं से कोई लेना देना नहीं है। इन सभी चुनौतियों का सामना करते हुए विश्व हिन्दू परिषद् पूरी तन्मयता से कार्य कर रही है।

किसी भी विचार और संगठन के लिए समाज तक अपनी बात पहुँचाना महत्त्वपूर्ण होता है। विश्व हिन्दू परिषद् का प्रचार विभाग इसी दृष्टि से एक महत्त्वपूर्ण आयाम है। यह विहिप के सभी प्रकार के कार्यों को समाज के भीतर प्रचारित करता है। समाज में हिन्दू विचारों को ले जाने के लिए विश्व हिन्दू परिषद् के कार्यकर्ता हमेशा से सतर्क और गंभीर रहे हैं। कश्मीर से कन्याकुमारी और गुजरात के कच्छ से कामरूप तक देश के प्रत्येक हिस्से में हिन्दू समाज की गतिविधियों को सम्पूर्ण समाज जान पाए, इसके लिए परिषद् के कार्यकर्ता अहर्निश प्रयासरत रहते हैं।

विश्व हिन्दू परिषद् हिन्दू जीवन मूल्यों के संरक्षण और संवर्धन का कार्य कर रही है। हम एक ऐसे समाज में रह रहे हैं, जहाँ एक ओर सज्जन शक्ति कार्य कर रही है, तो वहीं समाज के भीतर दुर्जन शक्ति भी अपने काम में लगी हुई है। ऐसे में विधि कार्य की आवश्यकता पड़ती है। इसके लिए विहिप का विधि प्रकोष्ठ अपना काम करता है। विश्व हिन्दू परिषद् का विधि प्रकोष्ठ समाज में प्रत्यक्ष एवं परोक्ष, दोनों ही रूपों में न्यायिक सहयोग देने का कार्य करता है। वहीं धर्माचार्य संपर्क विश्व हिन्दू परिषद् का एक प्रमुख आयाम है। शास्त्र संग और साधु संग हमारे समाज की शक्ति रहा है। जब भी हिन्दू समाज शास्त्र और साधु संग से दूर हुआ है, उसका परिणाम गंभीर रहा है।

विश्व हिन्दू परिषद् समाज में व्याप्त कुरीतियों के उन्मूलन के लिए धर्माचार्यों के पास जाती है और उनसे निवेदन करती है कि वे शास्त्रों के वचनों के अनुसार समाज का मार्गदर्शन करें। विश्व हिन्दू परिषद् का नीति वाक्य ‘धर्मो रक्षति रक्षितः’ है। इसका अर्थ है कि जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। हमारे मंदिर धर्म रक्षा और धर्म प्रचार के केंद्र हैं। इसलिए जिस प्रकार धर्म की रक्षा महत्त्वपूर्ण है, उसी प्रकार हमारे मंदिरों की रक्षा भी महत्त्वपूर्ण है।

वर्तमान समय में मंदिर समाज के शक्ति केंद्र बनें, इस उद्देश्य को लेकर विश्व हिन्दू परिषद् का मंदिर अर्चक पुरोहित आयाम कार्य कर रहा है। धर्म और संस्कृति के संरक्षण की यह यात्रा केवल मंदिरों तक सीमित नहीं है। भाषा और ज्ञान परम्परा भी इसी सांस्कृतिक चेतना का महत्त्वपूर्ण आधार है।

विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा भारत संस्कृत परिषद् आयाम के माध्यम से हिन्दू समाज में पुनः संस्कृत भाषा के प्रति रुझान बढ़े, इसके प्रयास चल रहे हैं। संस्कृत भाषा में रुचि जगाने के लिए विभिन्न संस्कृत व्यवहार शिविरों की व्यवस्था करना, संस्कृत भाषा के पुनरुद्धार और विकास के लिए हर संभव प्रयास करना तथा संस्कृत अध्ययन केंद्रों की स्थापना करना, वेद विद्याओं के अनुसरण और अनुसंधान के लिए शोध केंद्रों, कार्यशालाओं और प्रशिक्षण शिविरों के लिए आयोजक देखना आदि जनहित के कार्य किए जाते हैं।

विश्व हिन्दू परिषद् विशुद्ध रूप से धर्म संस्कृति के क्षेत्र में काम करने वाला संगठन है। हमारे जीवन मूल्यों ने हमें वर्षों से आपस में जोड़े रखा है। आदि शंकराचार्य ने देश के चारों कोनों में चार मठों की स्थापना करके हिन्दू समाज के भीतर एकत्व के भाव का जागरण किया। भारत में समय समय पर धार्मिक यात्राएँ चलती रहती हैं। सावन मास में कांवड़ यात्रा, महाराष्ट्र में विठ्ठल भगवान् की पंढरपुर यात्रा, खाटू श्याम यात्रा, रामदेवरा यात्रा, मोहन राम भगवान् यात्रा, सबरीमाला मंदिर यात्रा, पलिनी यात्रा, तिरुचिंदुर यात्रा, तिरुपति भगवान् की यात्रा, मुरुगन भगवान् की यात्रा, अमरनाथ यात्रा, बूढ़े अमरनाथ यात्रा और चारधाम यात्रा आदि यात्राओं में हिन्दू समाज की आस्था है। ऐसे आयोजनों में विश्व हिन्दू परिषद् धर्म यात्रा महासंघ के माध्यम से अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

विश्व हिन्दू परिषद् से जुड़े विभिन्न आयामों में बजरंग दल की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण है। बजरंग दल का निर्माण संघर्ष से हुआ है, इसलिए संघर्ष से दो दो हाथ करने का भाव हर बजरंगी में रहा है। बजरंग दल का नीति वाक्य ‘सेवा, सुरक्षा और संस्कार’ है। इस मुख्य वाक्य को लेकर बजरंग दल का हर कार्यकर्ता काम करता है। बजरंग दल के एक करोड़ से ज्यादा सदस्य हैं। इनमें 51000 संयोजक एवं तीन लाख पचास हजार दायित्ववान कार्यकर्ता हैं। सर्वाधिक रक्तदान करने वाले संगठन के रूप में बजरंग दल का नाम ‘लिम्का बुक वर्ल्ड रिकॉर्ड’ में दर्ज है। यह संगठनात्मक विस्तार सेवा, सुरक्षा और संस्कार के उस भाव को सामने रखता है, जिसे बजरंग दल अपना आदर्श मानकर कार्य करता है।

हिन्दू समाज की युवा बहनें भी धर्म और संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन के पुनीत कार्य का हिस्सा बन सकें, इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए ‘दुर्गा वाहिनी’ का विचार सामने आया। दुर्गा वाहिनी हिन्दू बहनों का एक अप्रतिम संगठन है, जो सेवा, सुरक्षा और संस्कार को अपना आदर्श वाक्य मानकर हिन्दू समाज के मध्य काम करता है। विश्व हिन्दू परिषद् का हिन्दू महिलाओं में काम करने के लिए मातृशक्ति भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

इस प्रकार सेवा से लेकर संस्कृत भाषा तक, धर्माचार्य संपर्क से लेकर मंदिरों तक, सामाजिक समरसता से लेकर धर्म प्रसार तक और बजरंग दल से लेकर दुर्गा वाहिनी एवं मातृशक्ति तक, विश्व हिन्दू परिषद् का कार्य विभिन्न आयामों में दिखाई देता है।

आज विश्व हिन्दू परिषद् अपना 62वाँ स्थापना दिवस मना रही है। 29 अगस्त 1964 को जिस संगठन की स्थापना श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर भारत की संत शक्ति के आशीर्वाद के साथ हुई थी, वह आज भारत के अतिरिक्त विश्व के कई देशों में काम कर रही है। इसके पीछे मूल भावना वही है, जो स्थापना के समय व्यक्त हुई थी।

“हिन्दवः सोदराः सर्वे, न हिन्दूः पतितो भवेत्।”

सभी हिन्दू आपस में सहोदर हैं, कोई भी हिन्दू पतित नहीं है।


लेखक विश्व हिन्दू परिषद, हिमाचल प्रान्त के बिलासपुर जिला के मंत्री हैं। ये लेखक के निजी विचार है।

Tags: VHPकृष्ण जन्माष्टमीविश्व हिन्दू परिषद्विश्व हिन्दू परिषद् स्थापना दिवस
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