हाल ही में कुछ स्कूली छात्रों के साथ था। बातचीत के दौरान विषय ‘जेन-जी’ का चलने लगा। मैंने कहा, अंग्रेजी में ‘जेन-जी’ लिखो। सबने लिखा, ‘GEN-Z’! इस पर मैंने प्रश्न किया कि Z को क्या बोलते हैं? उन्होंने उत्तर दिया-‘जेड’। फिर मैंने पूछा, ‘जेन-Z’ ‘जेन-जी’ कैसे बन गया? आप Z को ‘जेड’ बोलते हैं, लेकिन यही Z, Gen के साथ जुड़कर ‘जी’ कैसे बन जाता है? ऐसा क्यों? उनके पास कोई उत्तर नहीं था।
यह सच है कि अमेरिकी अंग्रेजी में Z को ‘ज़ी’ (Zee) बोला जाता है, जबकि ब्रिटिश अंग्रेजी में इसका उच्चारण ‘ज़ेड’ (Zed) है। भारत में ब्रिटिश अंग्रेजी का ऐतिहासिक प्रभाव रहा है और सामान्यतः Z को ‘जेड’ ही बोला जाता है। ऐसे में भारत में ‘Gen-Z’ का ‘जेन-ज़ेड’ के बजाय ‘जेन-जी’ के रूप में लोकप्रिय होना एक भाषाई बदलाव अवश्य है, जिस पर विचार किया जाना चाहिए। यहाँ मेरा प्रश्न किसी उच्चारण को सही या गलत ठहराने का नहीं है, बल्कि यह समझने का है कि शब्दों और उनके प्रचलन के पीछे काम करने वाली प्रक्रिया को हम कितनी गंभीरता से लेते हैं।
अब इसी बात को भारत में नए-नए प्रचलन में आए ‘Regime Change’ शब्द से समझने का प्रयास करते हैं। भारत में कांग्रेस और कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े राजनीतिक समूह ‘रिजीम चेंज’ जैसे शब्दों का प्रयोग खुलकर कर रहे हैं। अब भारत में कोई राजशाही या तानाशाही व्यवस्था नहीं है, बल्कि संविधान के अनुसार लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार है। ऐसे में प्रश्न यह है कि भारत में क्या ‘रिजीम’ है? गूगल में यदि ‘रिजीम’ शब्द का अर्थ सर्च करें तो आता है, “ऐसी शासन प्रणाली या व्यवस्था जो विशेषतः ‘निष्पक्ष रूप’ से निर्वाचित नहीं होती है।” विकिपीडिया पर भी अलग-अलग संदर्भों के माध्यम से ऐसा ही अर्थ सामने आता है। सोचने की बात यह है कि जब भारत में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार है यानी कोई ‘रिजीम’ नहीं है तो फिर ‘रिजीम चेंज’ जैसे शब्दों का प्रयोग क्यों किया जा रहा है, यह थोडा असहज करने वाला है।
भारत में सरकार बदलने के लिए ‘गवर्नमेंट चेंज’ या ‘सरकार बदलना’ जैसे शब्द प्रयोग होते हैं। फिर ‘रिजीम’ शब्द का प्रयोग क्यों? क्या यह महज शब्दों का चुनाव है या इसके पीछे कोई और खेल है? जब लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई किसी सरकार के संदर्भ में ‘रिजीम’ जैसे शब्द का प्रयोग लगातार किया जाता है, तो यह देखना जरूरी हो जाता है कि इसके माध्यम से जनता के मन में कैसी धारणा बनाई जा रही है। ऐसे में शब्दों का अर्थ और उनके राजनीतिक संदर्भ में इस्तेमाल दोनों को अलग-अलग समझना जरूरी है।
अब इसी नैरेटिव की राजनीति को कांग्रेस सहित पुरे विपक्ष की हालिया गतिविधियों के संदर्भ में देखते हैं। ‘वोट चोरी’ से ‘जन-अभियोग’ तक: आखिर विपक्ष आम जनता के मन में क्या स्थापित करना चाहता है? कांग्रेस और इंडी गठबंधन पिछले कुछ समय से ‘वोट चोरी’ के आरोपों को लेकर लगातार राजनीतिक अभियान चला रहे हैं। चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त की निष्पक्षता पर प्रश्न उठाए जा रहे हैं। लोकतंत्र खतरे में होने की बात कही जा रही है। 31 अक्टूबर को इसी अभियान के अंतर्गत मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध एक प्रतीकात्मक ‘पब्लिक इम्पीचमेंट’ अर्थात् जन-अभियोग की कार्यवाही भी आयोजित की गई। इसमें पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने अध्यक्षता की और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रस्ताव प्रस्तुत किया। राहुल गांधी सहित विपक्षी नेताओं ने इसमें भाग लिया।
अब इस आयोजन के नाम और स्वरूप पर गौर कीजिए। ‘इम्पीचमेंट’ शब्द सामान्यतः संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों को निर्धारित संसदीय प्रक्रिया के तहत हटाने की कार्यवाही के संदर्भ में जाना जाता है। भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया भी विशेष है। संविधान के अनुच्छेद 324(5) के अनुसार उन्हें सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान प्रक्रिया और आधार पर हटाया जा सकता है। लेकिन किसी राजनीतिक दल या गठबंधन द्वारा आयोजित प्रतीकात्मक सभा में प्रस्ताव पारित कर देने से संवैधानिक रूप से मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से नहीं हटाया जा सकता। यह संसदीय इम्पीचमेंट की वास्तविक संवैधानिक कार्यवाही से बढ़कर एक राजनीतिक प्रदर्शन है।
ऐसे में सवाल यह है कि जब संसद में संवैधानिक प्रक्रिया उपलब्ध है, तब उसके समानांतर एक प्रतीकात्मक कार्यवाही आयोजित करने का राजनीतिक संदेश क्या है? क्या यह केवल विरोध दर्ज कराने का तरीका है या जनता के मन में यह धारणा स्थापित करने का प्रयास है कि देश की संवैधानिक संस्थाएँ अपनी निष्पक्षता खो चुकी हैं? इसी कड़ी में 1 नवंबर को ‘वोट चोरी’ के विरुद्ध रामलीला मैदान में बड़ी रैली भी आयोजित की गई।
यहाँ शब्दों पर ध्यान देने की जरूरत है, जैसे ‘वोट चोरी’, ‘वोट चोर’, ‘जन-अभियोग’, ‘लोकतंत्र खतरे में’। जब इन्हें लगातार एक ही संदेश के साथ दोहराया जाता है तो ये सामान्य राजनीतिक शब्द नहीं रह जाते। इनका प्रभाव यह हो सकता है कि आम नागरिक के मन में चुनावी प्रक्रिया, चुनाव आयोग और सरकार की वैधता को लेकर संदेह पैदा हो। लोकतंत्र में आरोप लगाना और आरोप सिद्ध करना दो अलग-अलग बातें हैं। यदि वास्तव में वोटों की चोरी हुई है, तो उसके प्रमाण सामने आने चाहिए, संबंधित मामलों की निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए और दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए। विपक्ष को प्रश्न पूछने का पूरा अधिकार है, लेकिन प्रश्नों के साथ प्रमाण और संवैधानिक प्रक्रिया का सम्मान भी उतना ही आवश्यक है।
भारत की आम जनता को नैरेटिव की राजनीति को समझना होगा। अब इन तीनों उदाहरणों को एक साथ रखकर देखिए। ‘जेन-जी’ के नाम पर युवा पीढ़ी की पहचान के लिए प्रचलित शब्द का उच्चारण बदलता है। ‘रिजीम चेंज’ के माध्यम से चुनी हुई सरकार को लेकर एक खास राजनीतिक विमर्श सामने आता है और ‘वोट चोरी’ तथा ‘जन-अभियोग’ जैसे शब्दों के माध्यम से चुनाव आयोग की निष्पक्षता और चुनावी प्रक्रिया पर व्यापक राजनीतिक प्रश्न खड़े किए जाते हैं। इन सभी के बीच एक समान सूत्र दिखाई देता है और वह है शब्दों के माध्यम से आम जनता में धारणा निर्माण करना अर्थात् नैरेटिव गढना।
यहाँ इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता कि इन सभी शब्दों और घटनाओं के पीछे भारत विरोधी विदेशी शक्तियों की सुनियोजित योजना है। क्योंकि यह स्थापित सत्य है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भाषा, संचार और जनमत निर्माण का इस्तेमाल प्रभाव पैदा करने के लिए किया जाता रहा है। इसलिए किसी भी नए राजनीतिक या सामाजिक विमर्श को केवल आम भाषा के शब्द मानकर नकार देना समझदारी नहीं कहा जा सकता है।
भारत में लोकतंत्र है, संविधान है, स्वतंत्र चुनाव आयोग है और जनता को अपनी सरकार चुनने का अधिकार है। इन संस्थाओं की कमियों पर प्रश्न उठाना भी लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन बिना प्रमाण पूरी व्यवस्था को अविश्वसनीय बताने की प्रवृत्ति पर भी प्रश्न उठने चाहिए। लेकिन प्रामाणिक तौर पर। ऐसे में भारत के युवाओं को यह समझना होगा कि हर लोकप्रिय शब्द अपने आप में निष्पक्ष नहीं होता और हर बार दोहराया जाने वाला राजनीतिक नारा अपने आप में सत्य नहीं बन जाता। आज आवश्यकता केवल अंग्रेजी के शब्द सीखने से बढ़कर उनके अर्थ, संदर्भ और उद्देश्य को समझने की है। किसी शब्द को बोलने से पहले यह जानना जरूरी है कि उसका अर्थ क्या है, वह किस संदर्भ में इस्तेमाल हो रहा है और उसके माध्यम से हमारे मन में कौन-सी धारणा स्थापित की जा रही है।
अभिभावकों के लिए यह जरूरी है कि अपने बच्चों को भी इस दृष्टि से सजग बनाने का प्रयास करें। उन्हें किसी शब्द, नारे या राजनीतिक विचार को आँख बंद करके स्वीकार करने से पहले प्रश्न करना, तर्क करना और प्रमाणों के आधार पर निष्कर्ष निकालना सिखाइए। क्योंकि किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति उसके सजग नागरिक होते हैं और सबसे बड़ी कमजोरी तब पैदा होती है, जब नागरिक बिना समझे किसी सुनियोजित नैरेटिव का हिस्सा बन जाते हैं।
मेरा सोचना गलत हो सकता है, लेकिन शब्दों के खेल को समझिए, नैरेटिव को परखिए और राष्ट्रहित के प्रति सजग रहिए।


































