किसी शिपयार्ड से जब बड़ा जहाज़ पानी में उतरता है, तो जश्न होता है। लेकिन हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड (एचएसएल) के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर, रियर एडमिरल सी. रघुराम, वीएसएम (सेवानिवृत्त) के मुताबिक़ देश का जहाज़ उद्योग तब खड़ा होता है, जब वही यार्ड पाँचवाँ जहाज़ भी समय पर दे और यह सिलसिला सालों-साल चलता रहे।
मुंबई में इनमार्को 2026 सम्मेलन में उन्होंने कहा, “एक जहाज़ लॉन्च करना एक समारोह है। पाँचवें जहाज़ को समय पर डिलीवर करना एक उद्योग है। और साल-दर-साल सौवाँ जहाज़ डिलीवर करना, यह होता है किसी देश का जहाज़ निर्माण।” रघुराम इंस्टीट्यूट ऑफ़ मरीन इंजीनियर्स (इंडिया) के इस सम्मेलन में “Shipyards and Newbuilds: Maritime Landscape 2030” पैनल में बोल रहे थे। एचएसएल इस सम्मेलन का पार्टनर था।
नमूने और प्रोडक्ट का फ़र्क़
रघुराम ने अपनी सोच दो छोटे वाक्यों में रखी: “पहला जहाज़ एक प्रोटोटाइप होता है। पाँचवाँ जहाज़ एक प्रोडक्ट होता है।” आसान भाषा में समझें तो किसी भी नई चीज़ का पहला नमूना बनाने में सबसे ज़्यादा वक़्त, मेहनत और ख़र्च लगता है। जब वही डिज़ाइन बार-बार बनता है, तो काम का तरीक़ा पक्का होता जाता है और हर अगला जहाज़ पिछले के तजुर्बे से बनता है। रघुराम ने इसे जहाज़ बनाने से आगे बढ़कर एक प्रोडक्शन सिस्टम चलाने का बदलाव बताया।
24 फ़ीसदी का फ़ासला
शिपयार्ड्स एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया के अनुमान के मुताबिक़ पूर्वी एशिया के शिपयार्ड्स और भारतीय शिपयार्ड्स की लागत में क़रीब 24 फ़ीसदी का फ़ासला है। इस फ़ासले को कैसे पाटा जाए, इस पर रघुराम का जवाब साफ़ था: “इंसेंटिव से यह फ़ासला घट सकता है। इसे ख़त्म सिर्फ़ सीरीज़ कर सकती है।” मतलब, सरकारी मदद रास्ता आसान करती है, लेकिन बड़ा फ़र्क़ तब पड़ता है जब शिपयार्ड एक के बाद एक, एक जैसे जहाज़ बनाते हैं।
विशाखापत्तनम में पहला और पाँचवाँ, एक ही दिन
एचएसएल के विशाखापत्तनम यार्ड में 6 अक्टूबर को यही तस्वीर दिखी। उस दिन भारतीय नौसेना के लिए बन रहे पाँच फ़्लीट सपोर्ट शिप में से पहला, 43,500 टन का ‘सूर्य’, पानी में उतारा गया। उसी दिन इस सीरीज़ के पाँचवें जहाज़ की कील भी रखी गई।
यानी एक ही दिन सीरीज़ का पहला जहाज़ पानी में था और आख़िरी जहाज़ का काम शुरू हो चुका था। उसी दिन 300 टन की गोलियथ क्रेन वाले विस्तारित स्लिपवे-4 की भी शुरुआत हुई, जो 45,000 डीडब्ल्यूटी तक के जहाज़ों के लिए बना है। अगस्त में एचएसएल ने दूसरा स्वदेशी डाइविंग सपोर्ट वेसल, आईएनएस निपुण, भी नौसेना को सौंपा।
रघुराम ने कहा, “जो यार्ड 43,000 टन के जहाज़ को अठारह महीने में स्टील से पानी तक ले आता है, उसे अब यह साबित नहीं करना कि वह जहाज़ बना सकता है। अब उससे पूछा जा रहा है कि क्या वह बार-बार, समय पर और किफ़ायती लागत पर जहाज़ बना सकता है।”
एक नौकरी, छह और नौकरियाँ
सीरीज़ में जहाज़ बनाने का फ़ायदा सिर्फ़ शिपयार्ड तक नहीं रुकता। रघुराम ने बताया कि जहाज़ निर्माण की हर एक नौकरी अपने साथ क़रीब छह और नौकरियाँ पैदा करती है। उनके मुताबिक़ सरकार का शिपबिल्डिंग पैकेज क़रीब 30 लाख नौकरियाँ पैदा कर सकता है।
रघुराम ने सरकार के उन क़दमों का स्वागत किया, जो इस उद्योग को लगातार काम देने की दिशा में हैं। माँग का जो अनुमान सामने रखा गया है, उसके मुताबिक़ अगले 10 साल में क़रीब 437 जहाज़ों की ज़रूरत होगी। भारत में बने जहाज़ों को इंफ़्रास्ट्रक्चर का दर्जा भी दिया गया है।
पैसे के मोर्चे पर 69,725 करोड़ रुपये का पैकेज है और साथ में 25,000 करोड़ रुपये का मैरीटाइम डेवलपमेंट फ़ंड भी। देश में हर साल 45 लाख ग्रॉस टन जहाज़ बनाने की क्षमता खड़ी करने का लक्ष्य रखा गया है।
सबको साथ चलना होगा
रघुराम ने कहा कि सरकार शिपयार्ड्स के साथ डिलीवरी की टाइमलाइन और साफ़ तौर पर साझा करे। उपकरण बनाने वाली कंपनियों और फ़ाइनेंस देने वालों से उन्होंने लंबी अवधि का फ़ाइनेंस और देश में ही सर्विस सपोर्ट माँगा। भारतीय डिज़ाइनरों के लिए उन्होंने नियम बनाने में ज़्यादा मज़बूत आवाज़ की बात रखी।
उन्होंने 6 अक्टूबर को एचएसएल में रक्षा मंत्री की रखी तीन कसौटियों का भी ज़िक्र किया: अपना डिज़ाइन, समय पर डिलीवरी और ऐसी उत्पादकता जिसे नापा जा सके। रघुराम ने इन्हें वे तीन वादे बताया, जो भारतीय शिपयार्ड देश से करते हैं।
हर जहाज़ के लिए उन्होंने एक “डिजिटल जन्म प्रमाणपत्र” का सुझाव भी दिया, यानी एक ऐसा रिकॉर्ड जो 30 साल तक जहाज़ के साथ चले।
अपनी बात ख़त्म करते हुए रघुराम ने एचएसएल के मोटो को पूरे उद्योग तक फैला दिया: “एक उद्योग, एक मिशन, भारत के समुद्री भविष्य को ताक़त।”































