आठ साल पहले तक किसी छोटे कारखाने या नए स्टार्टअप के लिए सेना का दरवाज़ा खटखटाना आसान नहीं था। टेंडर की भारी-भरकम शर्तें, बरसों के अनुभव और बड़े टर्नओवर की माँग छोटे उद्योगों को पहले ही दौड़ से बाहर कर देती थी।
2018 में रक्षा मंत्रालय ने इस दीवार में एक खिड़की खोली, जिसका नाम रखा गया iDEX यानी इनोवेशंस फॉर डिफेंस एक्सीलेंस। सोच सीधी थी। सेना अपनी असली दिक्कत एक सवाल की शक्ल में सामने रखे और देश भर के स्टार्टअप व MSME उसका हल बनाकर लाएँ। चुने गए प्रस्तावों को प्रोटोटाइप के लिए डेढ़ करोड़ रुपये तक का अनुदान मिलता है और सबसे अहम, उस यूनिट से सीधी बातचीत का मौका, जो आगे चलकर उत्पाद इस्तेमाल करेगी।
नवंबर 2025 तक यह कार्यक्रम 650 से ज़्यादा स्टार्टअप और MSME के साथ काम कर चुका था। इनमें महानगरों की टेक कंपनियाँ भी हैं और औद्योगिक कस्बों की वे इकाइयाँ भी, जिनका नाम पहले रक्षा क्षेत्र में शायद ही सुनाई देता था।
सवाल सेना का, जवाब छोटे उद्योग का
डिफेंस इंडिया स्टार्टअप चैलेंज (DISC) के हर दौर में थलसेना, नौसेना और वायुसेना अपनी ज़मीनी समस्याएँ सामने रखती हैं। DISC-7 में नौसेना की कई चुनौतियाँ उसकी SPRINT पहल से जुड़ी थीं, जिसका मकसद स्वदेशी तकनीकों को तेज़ी से जहाज़ों तक पहुँचाना है।
इन्हीं में एक चुनौती आग से जुड़ी थी। जहाज़ हो या गोला-बारूद का डिपो, वहाँ की आग में धुआँ, तपिश और धमाके का खतरा एक साथ होता है और दमकलकर्मी को सबसे आगे जाना पड़ता है। इसका एक जवाब अहमदाबाद के पास चांगोदर औद्योगिक इलाके से आया। वहाँ की स्वदेशी एम्प्रेसा प्राइवेट लिमिटेड चार दशक से अग्निशमन के काम में है और 2017 से फायरफाइटिंग रोबोट बना रही है। उसका FF Bot रिमोट से चलने वाला ज़मीनी वाहन है, जो थर्मल कैमरों की मदद से घने धुएँ में भी आग ढूँढकर पानी या फोम की बौछार करता है। ऑपरेटर इस दौरान सुरक्षित दूरी पर रहता है।
2023 में FF Bot, DISC-7 के तहत आवश्यकता की स्वीकृति (AoN) पाने वाला पहला iDEX SPRINT मामला बना। AoN रक्षा खरीद की पहली औपचारिक सीढ़ी है, यानी मंत्रालय की यह मुहर कि सेना को इस चीज़ की सचमुच ज़रूरत है।
इसके बाद दायरा बढ़ा। नौसेना के लिए विकसित इस रोबोट को जनवरी 2026 में थलसेना ने भी उस प्रावधान के तहत खरीदा, जिसमें एक सेना के लिए बना iDEX उत्पाद दूसरी सेनाएँ भी ले सकती हैं। गोला-बारूद डिपो जैसे ठिकानों के लिए 18 रोबोट का यह करार करीब 62 करोड़ रुपये का है। फरवरी में पोखरण में हुए वायुसेना के ‘वायु शक्ति’ अभ्यास में भी इसका प्रदर्शन हुआ। 30 जून 2026 की iDEX खरीद-आदेश सूची में FF Bot सबसे ऊपर है।
हालाँकि यह अकेली मिसाल नहीं है। ड्रोन, पानी के भीतर काम करने वाले रोबोट, सुरक्षित संचार और AI आधारित निगरानी जैसे क्षेत्रों में भी छोटे उद्योगों के उत्पाद इसी रास्ते से सेनाओं तक पहुँचे हैं।
प्रोटोटाइप से पक्के ऑर्डर तक
रक्षा मंत्रालय के मार्च 2026 के आँकड़े इस बदलाव की गवाही देते हैं। 2018 से अब तक 676 स्टार्टअप, MSME और इनोवेटर इस तंत्र से जुड़ चुके हैं और 548 अनुबंध हुए हैं। 58 प्रोटोटाइप को खरीद की मंज़ूरी मिल चुकी है, जिनकी कुल कीमत करीब 3,853 करोड़ रुपये है। 45 मामलों में पक्के खरीद अनुबंध भी हो चुके हैं, लगभग 2,326 करोड़ रुपये के।
छोटे उद्योगों के लिए ये आँकड़े सिर्फ रकम नहीं हैं। हर पक्का ऑर्डर बैंक और निवेशकों के सामने कंपनी की साख बढ़ाता है और उत्पादन बढ़ाने का हौसला देता है। जब एक सेना के लिए बना उत्पाद दूसरी सेना भी अपनाती है, तो साफ है कि बात एक बार के प्रयोग से आगे निकल चुकी है।
रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने भी माना है कि असली परीक्षा प्रोटोटाइप के बाद शुरू होती है, इसलिए मंत्रालय स्टार्टअप के लिए खरीद की अलग व्यवस्था पर काम कर रहा है। ट्रायल और खरीद का लंबा समय अब भी छोटी इकाइयों के धैर्य की परीक्षा लेता है, पर दिशा साफ है।
नीति का साथ, छोटे शहरों की उड़ान
यही दिशा नीतियों में भी दिखती है। अक्टूबर 2025 के रक्षा खरीद मैनुअल में सूक्ष्म और लघु उद्यमों के लिए 25 फीसदी उत्पाद आरक्षित किए गए। फरवरी 2026 में आए रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP) के मसौदे में iDEX परियोजनाओं के लिए पाँच साल के सुनिश्चित ऑर्डर और ‘स्पाइरल डेवलपमेंट’ यानी चरणबद्ध सुधार का प्रस्ताव है। इससे कंपनियाँ लंबी योजना बना सकेंगी और उत्पाद को लगातार बेहतर कर सकेंगी।
iDEX के आठ साल का सबसे बड़ा हासिल शायद यही है कि रक्षा उत्पादन का नक्शा अब महानगरों और बड़े नामों तक सीमित नहीं रहा। चांगोदर जैसे औद्योगिक इलाकों में बने उत्पाद एक सेना से दूसरी सेना तक पहुँच रहे हैं। छोटे उद्योगों ने भरोसा कमाया है और अब नीतियाँ इस भरोसे को पक्की साझेदारी में बदलने की ओर बढ़ रही हैं।

































