शाखा शब्द सुनते ही मन में एक जीवंत चित्र उभरता है। जैसे वटवृक्ष की शाखा अपने मूल तने से रस लेकर नई कोंपलें फोड़ती है, जैसे ज्ञान की विभिन्न शाखाएँ – कला, विज्ञान, वाणिज्य – एक ही विद्या के महासागर से निकलकर समाज को प्रकाश देती हैं, वैसे ही राष्ट्र सेविका समिति की शाखा भी है। यह केवल एकत्रीकरण नहीं, यह राष्ट्र रूपी विराट वृक्ष की वह चेतन शाखा है, जहाँ हर दिन भारत का भविष्य गढ़ा जाता है।
समिति में अनेक प्रकार की शाखाएँ होती हैं – साप्ताहिक शाखा, पाक्षिक शाखा, मासिक शाखा, उत्सव शाखा। सबका अपना महत्व है। परन्तु यदि व्यक्ति को गढ़ना है, यदि संस्कारों को ह्रदय में उतारना है, तो दैनिक शाखा का कोई विकल्प नहीं। क्योंकि जो बात रोज होती है, वही स्वभाव बनती है, और स्वभाव ही व्यक्तित्व बन जाता है।
हम प्रायः सोचते हैं कि बड़ा काम कभी-कभी करने से होता है। पर सत्य इसके विपरीत है। पढ़ाई हो, साधना हो या देश सेवा का विचार – दृढ़ता नियमित अभ्यास से ही आती है। जब हम प्रतिदिन एक ही समय पर, एक ही स्थान पर, एक ही ध्येय से एकत्रित होते हैं, तो वह कार्य बोझ नहीं लगता। उसमें सहजता आती है, सुंदरता आती है, चपलता आती है। नित्य अभ्यास से आत्मविश्वास जन्म लेता है। एक बहन जो पहले बोलने में संकोच करती थी, वही शाखा में बार-बार बोलते-बोलते प्रभावी वक्ता बन जाती है। यह आत्मविश्वास केवल उसका नहीं, यह पूरे समाज का आत्मविश्वास है। एक आत्मविश्वासी नारी ही आत्मविश्वासी परिवार और आत्मविश्वासी भारत का निर्माण कर सकती है।
शाखा में जब हम सब एक साथ खेलते हैं, योग करते हैं, व्यायाम और गणसमता करते हैं, तो वह केवल शरीर का व्यायाम नहीं है। वह मन का अनुशासन है। ‘दक्ष’, ‘सम्यक’, ‘आराम’ – ये केवल आज्ञाएँ नहीं, ये जीवन-मूल्य हैं। आज्ञा का पालन करने से हमारे भीतर का अहंकार गलता है। “मैं बड़ी हूँ, मैं छोटी हूँ” – यह भाव मिटता है। जब एक ही आज्ञा पर सभी एक साथ झुकती हैं, एक साथ उठती हैं, तो वहाँ समानता का दर्शन होता है। यह अनुशासन हमें सिखाता है कि मेरा समय केवल मेरा नहीं, वह राष्ट्र का समय है – समाज का समय है। मुझे अपना कार्य ठीक समय पर, ठीक ढंग से करना है, क्योंकि मेरी एक छोटी सी चूक मेरी पूरी टोली को प्रभावित करेगी।
यही अनुशासन हमारे मन की उच्छृंखलता पर रोक लगाता है, अनचाही भावनाओं को नियंत्रित करता है। शाखा का अनुशासित दृश्य देखकर मन को जो आनंद मिलता है, वह इस बात का प्रमाण है कि सुंदरता अनुशासन में ही बसती है। और जहाँ कमी दिखती है, वहाँ “जहाँ कमी वहाँ हम” – यह भाव स्वतः ही कृती में बदल जाता है। यह करुणा का ही दूसरा नाम भी है।
शाखा में कोई अमीर-गरीब नहीं, कोई बड़ी-छोटी नहीं। शारीरिक गतिविधि में, गीत में, खेल में सब एक हैं। जो शारीरिक रूप से दुर्बल है, या जिसमें कुशलता कम है, शाखा उसे पीछे नहीं छोड़ती, बल्कि उसे आगे बढ़ने का अवसर देती है। सब उसका हाथ पकड़कर आगे ले चलती हैं। इससे उसके मन का न्यूनत्व भाव, हीनता की ग्रंथि धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है। यही तो भारत है। भारत किसी एक जाति, एक भाषा, एक प्रांत का नाम नहीं। भारत वह भाव है जहाँ दुर्बल को सबल बनाना, हम अपना धर्म समझते हैं। शाखा में प्रतिदिन का सहवास, प्रतिदिन का मिलना, इसी अपनत्व को गहरा करता है। हम एक-दूसरे के नाम से नहीं, हृदय से जुड़ जाते हैं। इससे परस्पर विश्वास बढ़ता है। अकेलापन मिटता है। और मन में एक निर्भयता आती है – “हम सब एक हैं, मैं अकेली नहीं हूँ, मेरे पीछे पूरा राष्ट्र खड़ा है।”
शाखा में हर बहन को अवसर मिलता है। आज एक अग्रेसरिका है, कल दूसरी गटनायिका है। यह अदल-बदल केवल व्यवस्था नहीं, यह नेतृत्व की पाठशाला है। यहाँ हम सीखते हैं कि आदेश देना कैसे है और आदेश मानना कैसे है। संपर्क कैसे करना है, अपनी बात विनम्रता से पर प्रभावी ढंग से कैसे रखनी है। एक-दूसरे के सुख-दुःख में सहभागी होना, बड़ों के प्रति आदर, प्रणाम में लीनता, कृतज्ञता और समर्पणशीलता – ये पुस्तकों से नहीं आते, ये आचरण से आते हैं। ध्वज-स्थल का सुशोभन करते समय हमारे भीतर की कलाकार जागती है, सौंदर्य-दृष्टि विकसित होती है। हमें लगता है कि मेरा राष्ट्र भी मेरे ध्वज-स्थल जैसा सुंदर, स्वच्छ और पवित्र होना चाहिए।
शारीरिक कार्यक्रमों से केवल मांसपेशियां नहीं बनतीं, सहनशक्ति बनती है। कष्ट सहने की क्षमता आती है। बिना रुके, बिना थके काम करते रहने की पात्रता बनती है। यह सामर्थ्य ही तो देश के लिए चाहिए। आज भारत को ऐसी ही समर्थ नारियों की आवश्यकता है जो हर संकट में अडिग रह सकें। और बौद्धिक कार्यक्रम? वहाँ हम केवल सुनते नहीं, सुनना सीखते हैं। एक ही विषय के अनेक पहलुओं पर विचार करना, दूसरों के विचारों को शांति से सुनना, और फिर चिंतन के बाद अपना निष्कर्ष निकालना – यह लोकतंत्र की पहली सीढ़ी है। इससे विचार शक्ति बढ़ती है, ज्ञान बढ़ता है, साहित्य पढ़ने की रुचि जागती है, स्मरण शक्ति प्रखर होती है।
यहाँ हर बहन के भीतर सोए हुए गुण को जागृत किया जाता है। कोई अच्छा गाती है, कोई अच्छा खेलती है, कोई अच्छा बोलती है – शाखा सबको मंच देती है।
इसलिए कहा जाता है कि दैनिक शाखा व्यक्ति निर्माण का केंद्र है। पर सच कहें तो यह उसी व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण का केंद्र है जब एक बहन अनुशासित होती है, तो उसका परिवार अनुशासित होता है। जब वह करुणामयी होती है, तो समाज करुणामयी होता है। जब वह निर्भय होती है, तो भारत निर्भय होता है। शाखा हमें सिखाती है कि देशभक्ति केवल सीमा पर बंदूक उठाना नहीं है। देशभक्ति है – समय पर आना, अनुशासन में रहना, दुर्बल का हाथ थामना, अपने से पहले राष्ट्र को रखना।
आइए, इस दैनिक शाखा रूपी यज्ञ में हम अपनी नियमित उपस्थिति की आहुति दें। क्योंकि इसी छोटे से ध्वज-स्थल से, इसी एक घंटे के अभ्यास से, वह विशाल, समर्थ, एकजुट, करुणामय और वैभवशाली भारत जन्म लेगा, जिसका स्वप्न हमारे ऋषियों ने देखा था।































