HAL तेजस के निर्माण में लगे 37 वर्ष PSUs को बंद कराने के लिए काफी हैं

(PC: Rediff)

कुछ दिनों पहले भारतीय वायु सेना ने HAL यानि Hindustan Aeronautics Limited से 83 तेजस जेट के लिए 39 हजार रूपए की डील की थी। भारत में जेट विमानों के विकास पर नजर डालें तो तेजस अभी तक का सबसे देर से पूरा होने वाला प्रोजेक्ट है, यही नहीं उन प्रमुख उदाहरण में से एक है जिससे यह पता चलता है कि भारत की पब्लिक सेक्टर की कंपनीयां कितनी नाकाम रही हैं।

भारत में इस प्रोजेक्ट को पहली बार 1993 में HAL को सौंपा गया था। तब से लेकर इस कंपनी ने पहला विमान देने में लगभग 4 दशक लगा दिया। राजीव गांधी सरकार द्वारा इस प्रोजेक्ट को शुरू किए जाने के लगभग 37 साल बाद, फरवरी 2020 में IAF को 16 लड़ाकू जेट विमानों को सौंपा गया था।

इकोनॉमिक्स टाइम्स ने अपनी एक रिपोर्ट में Hindustan Aeronautics Limited की टाइमलाइन के लिए एक ग्राफिक्स भी बनाया था जिसमें इस विमान का इतिहास बताया गया है।

HAL का यह तेजस प्रोजेक्ट भारत में PSU आधारित रक्षा उत्पादन की विफलता के रूप में भी देखा जा सकता है। देश को स्वतंत्रता मिलने के बाद, रक्षा और नागरिक उड्डयन सहित कई सामरिक क्षेत्र का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया, और निजी कंपनियों के प्रवेश को रोक दिया गया।

इस तरह से लगभग सभी क्षेत्रों से निजी कंपनियों को रोके जाने से सरकारी कंपनियों के लिए किसी तरह का कोई प्रतिस्पर्धा नहीं रहा और इसी कारण यह सभी बस नौकरी का एक केंद्र बन कर रह गए। इसी का परिणाम है कि आज, शीर्ष 30 रक्षा उत्पादकों में से एक भी कंपनी भारत की नहीं है और देश को लगभग सभी महत्वपूर्ण रक्षा उपकरणों का आयात करना पड़ता है। HAL जैसी कंपनियों द्वारा निर्मित भारतीय उत्पाद इतने निम्न स्तर के होते हैं कि सशस्त्र बल उन्हें इस्तेमाल करने से मना करते हैं।

एक तरह से देखा जाए तो HAL नेहरू द्वारा स्थापित संस्थानों में से एक है जो उनकी सोशालिस्ट विफलता को दर्शाता है।

HAL की स्थापना बैंगलोर में 23 दिसंबर 1940 को वालचंद हीराचंद ने देश में रक्षा विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए की थी। हालाँकि, ब्रिटिश सरकार ने जल्द ही कंपनी पर अधिकार कर लिया और उसका राष्ट्रीयकरण कर दिया। बाद में जब भारत स्वतंत्र हुआ, तो राष्ट्रीयकृत कंपनी रक्षा मंत्रालय के अधीन हो गया।

इसके बाद HAL को देश के मुख्य रक्षा निर्माता के रूप में स्थापित किया गया था और इस पर खूब खर्च हुए। हालांकि, HAL की स्थापना के सात दशकों बाद में कोई बड़ी सफलता नहीं मिल सकी। तब देश अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देशों की कंपनियों के रक्षा उपकरण आयात करता रहा। अगर HAL कुछ कर  पाया है तो बस सोवियत संघ से प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की मदद कुछ विमानों का निर्माण।

HAL को सरकारी ऑर्डर तो  मिलते हैं लेकिन वह कभी काम समय पर पूरा नहीं कर पाता।  पिछले पांच वित्तीय वर्षों में HAL का राजस्व औसतन सिर्फ 4.3% प्रति वर्ष बढ़ा। Hindustan Aeronautics Limited का मुनाफा वित्त वर्ष 2013 में 2,997 करोड़ से घटकर वित्त वर्ष 18 में 2,070 करोड़ हो चुका है। अगर विश्व की अन्य कंपनियों से इसकी तुलना करें तो HAL में निष्पादन सबसे धीमा है।

भारत में पब्लिक सेक्टर की कंपनियों के कारण अगर कोई क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित हुआ है तो वह रक्षा उत्पादन ही है। वैसे भी भारत का पब्लिक सेक्टर की कंपनियों से पुराना नाता रहा है। वर्ष 1951 में बस 5 ही CPSEs थे लेकिन 1969 आते आते यह संख्या बढ़कर 84 हो गयी। इसका कारण इन्दिरा गांधी द्वारा किया गया राष्ट्रीयकरण। बाद के दशकों में, CPSE की संख्या 1980 में बढ़कर 179 और 1990 में 244 हो गई। इन PSUs की वजह से भारत की अर्थव्यवस्था इस तरह से नीचे गिरि कि 1991 तक उससे उबर नहीं पायी। CPSEs देश में घाटे में चल रही प्रमुख कंपनियों में से एक है। 82 CPSEs ने 25,045 करोड़ रुपये के घाटे का सामना किया और घाटे वाले CPSE की संख्या 2007-08 में 54 से बढ़कर 2016-17 में 82 हो गई है।

उस दौरान देश की आर्थिक प्रगति धीमी थी क्योंकि नेहरू और इन्दिरा गांधी की समाजवादी नीतियों को देश पर थोपा गया था और इसी  कारण आर्थिक वृद्धि 3 से 4 प्रतिशत तक नीचे रहा। 37 वर्षों में तेजस की डिलीवरी से पता चलता है कि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के नेतृत्व वाला मॉडल विनाशकारी रूप से विफल रहा है और भारत को दशकों तक गरीब बनाये रखा है।

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