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    गोवा राज्य स्थापना दिवस 2025: जानिए इतिहास, महत्व और इस दिन से जुड़ी खास बातें

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सावरकर की दया याचिका का कोई सबूत नहीं है, कांग्रेस पार्टी के सबसे बड़े मनगढ़ंत झूठ का पर्दाफाश

Animesh Pandey द्वारा Animesh Pandey
6 February 2020
in मत
सावरकर

(PC: IndiaFacts

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हाल ही में मिनिस्टरी ऑफ कल्चर ने एक ऐसा दावा किया है, जिससे कई लोगों के होश उड़ जाएंगे। संस्कृति और पर्यटन मंत्री(स्वतंत्र प्रभार) प्रहलाद पटेल ने दावा किया है की अंडमान के सेल्यूलर जेल में स्थित जेल रिकॉर्ड्स में कहीं भी क्रांतिकारी विनायक दामोदर सावरकर द्वारा दया याचिका दायर करने के रिकॉर्ड मौजूद नहीं है।

संसद में एक प्रश्न को लेकर प्रहलाद पटेल द्वारा दिये बयान के अनुसार, “अंडमान और निकोबार के डाइरेक्टरेट ऑफ आर्ट एंड कल्चर से मिली जानकारी के अनुसार ऐसी कोई भी दया याचिका के रिकॉर्ड मौजूद नहीं है, जो विनायक दामोदर सावरकर ने ब्रिटिश काल में दायर किया हो। ऐसी दया याचिका न सेल्यूलर जेल में मौजूद हैं और न ही इसके कोई रिकॉर्ड डिपार्टमेंट ऑफ आर्ट एंड कल्चर के पास है”।

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पूर्व मणिपुर DGP राजीव सिंह ने संभाला कैबिनेट सचिवालय में सचिव (सुरक्षा) का पद


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इस एक बयान से संसद में क्या हलचल मची, इसका अंदाज़ा तो शायद ही कोई लगा सकता है। परंतु एक बात तो स्पष्ट हो चुकी है की कांग्रेस पिछले कई वर्षों से क्रांतिकारी वीर सावरकर को लेकर न जाने कितनी अफवाहें फैलाती आई है। कांग्रेस की माने तो वीर सावरकर एक कायर थे, जिन्होंने अंग्रेजों से दया याचिका की मांग की और उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य का हर कदम पर समर्थन किया। इतना ही नहीं, स्वतन्त्रता के पश्चात भी कांग्रेस ने उन्हें हर तरह से अपमानित करने का प्रयास किया, चाहे जीते जी हो या मरने के बाद।

स्वतन्त्रता के बाद से ही सावरकर पर कई आरोप लगाकर कांग्रेस उन्हें जनता के बीच विलेन साबित करना चाहती थी। पहले तो उन्हें महात्मा गांधी की हत्या की साजिश में फंसाने की कोशिश की गयी, उसके बाद उनकी मृत्यु के बाद उन्हें इतिहास से ही मिटा देने की कोशिश की गयी। केवल लाल बहादुर शास्त्री जी ने प्रधानमंत्री रहते हुए वीर सावरकर को उनका उचित सम्मान देने का प्रयास किया। कांग्रेस से जब यह संभव नहीं हुआ तो उन्हें और उनकी हिन्दुत्व की विचारधारा को नीचा दिखाने के लिए नए-नए प्रपंच गढ़ती आई है और आज भी वही कर रही है। परंतु सत्य तो सत्य होता है और वह तमाम परेशानियों के बावजूद सामने आ ही जाता है।

सच कहें तो कांग्रेस ने वीर सावरकर को अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। पिछले दो तीन वर्षों में वीर सावरकर के लिए जिस तरह की भाषा और सामग्री का प्रयोग कांग्रेस के हाइकमान और उसके नेताओं ने किया है, उसे कोई भी गाली दें, वो कम ही लगेगी। एक रैली के दौरान राहुल गांधी ने हुंकार लगाई –

“संसद में भाजपा के लोगों ने कहा कि मैं अपने भाषण के लिए माफी मांगू। मुझे एक ऐसी चीज के लिए माफी मांगने के लिए कहा गया जो की सही है। मेरा नाम राहुल सावरकर नहीं, राहुल गांधी है। मैं सच्चाई के लिए माफी नहीं माँगूँगा। मर जाऊंगा लेकिन माफी नहीं मांगूंगा। कांग्रेस का कोई सदस्य माफी नहीं मांगेगा”।

अब बात करते हैं तथ्यों की। 1911 में वीर सावरकर को नासिक के टैक्स कलेक्टर जैकसन की हत्या करने में सहयोग देने के लिए अंडमान में आजीवन कारावास का दंड दिया गया था। इस दौरान उन पर जितने अत्याचार ढाये गए, उन्हें सुनकर किसी की भी आत्मा कांपने लगेगी। वीर सावरकर को घंटों तक कोल्हू से तेल निकलवाने को कहा जाता था, और बैलों की भांति उनसे काम करवाया जाता था।

दंड की अवहेलना करने पर घंटों तक बेड़ियों में जकड़े खड़ा रहना पड़ता था। इतनी यातना देने के बाद भी अंग्रेज़ उनसे इतना डरते थे कि उन्हें लिखने के लिए कलम भी नहीं देते थे, और उन्होंने जेल में अपनी कई पुस्तकें एक कील से लिखी थीं। वीर सावरकर को इस तरह से कारागार में रखा गया था कि उन्हें आभास भी नहीं था कि उनकी कोठरी से कुछ कोठरी दूर उनके बड़े भाई गणेश बाबाराव सावरकर को कैद किया था।

10 वर्ष की कठोर सजा झेलने के बाद विनायक दामोदर सावरकर को सेलुलर जेल से तत्कालीन राजा जॉर्ज पंचम द्वारा जारी एमनेस्टी ऑर्डर के अंतर्गत रत्नागिरी जेल स्थानांतरित किया गया, जहां उन्होंने 3 वर्ष और बिताए। उन्हें 1924 में रिहा किया गया, और उनकी राजनीतिक गतिविधियों पर 1937 तक रोक लगा दी गयी थी। यदि वीर सावरकर वाकई में अंग्रेज़ों की सेवा कर रहे होते, तो क्या वे इतने वर्षों तक कैद रखे जाते? भगत सिंह को फांसी पर लटकाने में अपने बयानों से सहयोग देने वाले तीन अंग्रेज़ी चाटुकार जयगोपाल, फोणीन्द्र नाथ घोष और हंस राज वोहरा को अंग्रेज़ों ने हर प्रकार की सुविधा से पुरस्कृत किया था। हंस राज वोहरा की विदेशी अखबारों में बतौर पत्रकार नौकरी भी लगवाई गयी थी।

इस तुलना में महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू को यदि कारागार में रखा जाता था, तो एक राजनीतिक कैदी होने के नाते उन्हें किसी भी प्रकार की सुविधा की कमी नहीं होती थी। विडम्बना की बात तो यह है कि ऐसी सुविधाओं के लिए भगत सिंह और उनके साथियों को महीनों तक भूख हड़ताल पर रहना पड़ा था, और जतीन्द्र नाथ दास को अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी थी। यदि नेहरू और गांधी अंग्रेजों के विरुद्ध लड़े थे, और ब्रिटिश सरकार के लिए खतरा थे, तो उन्हें भी कालापानी भेजा जाना चाहिए था, पर उन्हें तो कभी कालापानी नहीं भेजा गया। क्या इसका उत्तर है राहुल गांधी जैसे लोगों के पास?

अब बात करते हैं उस कथित दया याचिका की, जिसके आधार पर वीर सावरकर को वर्षों तक कांग्रेस और उसके चाटुकारों ने बदनाम किया और सरेआम अपमानित किया। जिस एमनेस्टी ऑर्डर के अंतर्गत सावरकर बंधुओं को रत्नागिरी जेल स्थानांतरित किया गया था, उस याचिका पर महामना मदन मोहन मालवीय और मोहनदास करमचंद गांधी ने स्वयं हस्ताक्षर किए थे।

इतना ही नहीं, इसी एमनेस्टी ऑर्डर का प्रयोग 1937-38 में भी हुआ था, जब गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 के अंतर्गत बनी काँग्रेस ministries ने कई क्रांतिकारियों को अंडमान की जेलों से बाहर निकलवा कर उन्हें भारत के जेलों में स्थानांतरित किया। ये या तो भगत सिंह संबन्धित लाहौर conspiracy केस में आरोपी थे, या इनहोंने 1930 के चट्टाग्राम विद्रोह में हिस्सा लिया था। चूंकि उनमें से अधिकांश क्रांतिकारी या तो कम्यूनिस्ट हो गए, या फिर उन्होंने काँग्रेस पार्टी की सदस्यता ली, इसलिए किसी भी व्यक्ति को उतना नहीं अपमानित किया गया, जितना सावरकर बंधुओं को उसी एमनेस्टी ऑर्डर पर 1921 में हस्ताक्षर करने के लिए किया।

[Source – Without Fear and Chittagong – Manoshi Bhattacharya]

यदि हम विपक्ष के तर्क अनुसार चलें, तो कांग्रेस के प्रिय महात्मा गांधी देशद्रोही नहीं हैं? यदि सावरकर अंग्रेजों के चाटुकार थे, तो फिर भगत सिंह भी देशभक्त नहीं थे, क्योंकि वे सावरकर द्वारा लिखित पुस्तक ‘इंडियाज़ वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस’, ‘हिन्दू पद पादशाही’ बड़े चाव से पढ़ते थे। इतना ही नहीं, यदि सावरकर वास्तव में अंग्रेज़ों के चाटुकार होते, तो उन्हें भला नेताजी सुभाष चन्द्र बोस से 1940 में मिलने की क्या आवश्यकता थी?

उन्हें भारत के बाहर से स्वतन्त्रता की लड़ाई जारी रखने का सुझाव भला वे क्यों देते? सबसे बड़ी बात, यदि वीर सावरकर वास्तव में अंग्रेज़ों के दास थे, तो वे आईएनए से प्रेरित हो कर रॉयल इंडियन नेवी और रॉयल इंडियन एयर फोर्स के लड़ाकों द्वारा किए गए विद्रोह का समर्थन नहीं करते, और न ही वे अखंड भारत के विभाजन का विरोध करते।

अब जब ये बात सामने आई है कि सावरकर द्वारा ब्रिटिश सरकार से दया याचिका के कोई वास्तविक रिकॉर्ड मौजूद नहीं है, तो इस बात में कोई दो राय नहीं है कि कैसे काँग्रेस ने वर्षों तक भारतीयों को उनके वास्तविक नायकों और उनके शौर्य से अनभिज्ञ रखने का अपराध किया और कई लोगों को सरेआम अपमानित भी किया।

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