शी जिनपिंग की राह पर चल रहे हैं एर्दोगन के कारण Turkey जल्द ही US के नेतृत्व वाले NATO से बाहर हो सकता है

तुर्की छोटा चीन बनता जा रहा है

एर्दोगन

एर्दोगन के नेतृत्व में तुर्की एक औपनिवेशिक देश के रूप में उभरा है, जो चीन की भांति अपने पड़ोसियों के भूमि पर कब्जा करने के लिए लालायित रहता है। इसके साथ ही NATO संगठन में अपने सहयोगियों को डराने धमकाने का भी कोई अवसर अपने हाथ से नहीं जाने देता। स्पष्ट कहें तो तुर्की अब धीरे धीरे पूर्वी मेडिटेरेनियन [Mediterranean] में चीन के तौर पर उभर के सामने आना चाहता है।

तुर्की की वर्तमान गतिविधियों पर अमेरिका ने भी नज़र बना रखी है, और यदि Turkey ने समय रहते अपने आप को नहीं सुधारा, तो चीन के तर्ज पर अमेरिका तुर्की को भी दुनिया से अलग-थलग करने का प्रबंध कर सकता है।

स्पुटनिक के अनुसार यूएस स्टेट विभाग के वरिष्ठ प्रवक्ता ने बताया की वाशिंगटन तुर्की के औपनिवेशिक गतिविधियों पर काफी चिंतित है और उसने ग्रीस के समुद्र क्षेत्र में तुर्की द्वारा किए गए भौगोलिक अनुसंधान पर रोक लगाने की हिदायत दी है। प्रवक्ता के अनुसार , “अमेरिका अच्छी तरह से जानता है कि Turkey किस नियत से पूर्वी मेडिटेरेनियन के विवादित क्षेत्र में भौगोलिक अनुसंधान कर रहे हैं। हम Turkey प्रशासन को हिदायत देते हैं की ऐसा कोई भी कार्य न करे, जिससे क्षेत्र की शांति भंग हो”।

इसके अलावा ग्रीस ने भी तुर्की के आक्रामक स्वभाव के विरुद्ध मोर्चा संभाल लिया है। ग्रीक के सैन्यबलों ने बताया कि उन्होंने दक्षिण Turkey के अक्साज़ नौसैनिक बेस के आसपास काफी गतिविधियां देखी हैं। ग्रीक अफसरों के अनुसार देश की सैन्य ताकतों को अलर्ट पर डाला गया है। ग्रीस के विदेश मंत्री ने भी Turkey के औपनिवेशिक मानसिकता पर विरोध जताते हुए कहा है कि वे इस मामले को हर जगह उठाएंगे, चाहे यूएन हो, NATO हो या फिर यूरोपीय संघ ही क्यों न हो।

जिस तरह से तुर्की NATO का सदस्य होते हुए भी संगठन के एक अन्य सदस्य ग्रीस को डरा धमका रहा है, उससे ट्रम्प प्रशासन का आग बबूला होना तय है। वैसे भी डोनाल्ड ट्रम्प और रेसिप एर्दोगन के बीच के संबंध बहुत बढ़िया तो नहीं रहे हैं, लेकिन एर्दोगन के वर्तमान कदमों से डोनाल्ड ट्रम्प चुप नहीं रहने वाले।

तुर्की इस समय सभी सीमाएं लांघने पर तुला हुआ है। चाहे लीबिया में हो रहे तनाव में हस्तक्षेप करना हो, या फिर ग्रीस और बुल्गारिया के साथ गुंडई करनी हो, या फिर कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाये जाने पर भारत की अनुचित आलोचना कर पाकिस्तान में आतंकी तत्वों को बढ़ावा देना हो, एर्दोगन ने कहीं कोई कसर नहीं छोड़ी है।

तुर्की एक सभ्य देश की तरह नहीं, अपितु एक कुत्सित मानसिकता वाले तानाशाही क्षेत्र की तरह बर्ताव कर रहा है, ठीक वैसे ही, जैसे इस समय चीन अपने पड़ोसी देशों और दुनिया के कई अन्य देशों के साथ कर रहा है। यदि वो समय रहते नहीं सुधरा, तो अमेरिका को NATO से तुर्की को धक्के मारकर बाहर निकालने में अधिक समय भी नहीं लगेगा।

यूं तो NATO से किसी सदस्य देश को निकालने का कोई आधिकारिक प्रावधान नहीं है, परंतु इसके लिए भी एक समाधान 1949 में तत्कालीन यूएस विदेश मंत्री डीन एचेसन ने निकाला था। उनके अनुसार, “जो NATO सदस्य लाल सलाम की जी हुज़ूरी [अर्थात सोवियत रूस की विचारधारा का समर्थन] करेगा, वो किसी भी स्थिति में NATO से बाहर निकाला जा सकता है”।

एर्दोगन के नेतृत्व में तुर्की ने अभी हाल ही हागिया सोफिया जैसे ईसाई तीर्थस्थल को फिर से एक मस्जिद में परिवर्तित किया है, और अभी एटलांटिक में समीकरणों को बिगाड़ने पर तुला हुआ है। ऐसे में वह न केवल वैश्विक शांति, बल्कि NATO के अपने ही साथी सदस्यों के लिए एक बहुत बड़ा खतरा बनके सामने आ रहा है। उसने निस्संदेह NATO की संप्रभुता को ललकारा है, और उसे अविलंब इस संगठन से बाहर खदेड़ना चाहिए।

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