स्वीडन दंगे: यूरोप की स्वायत्त मुस्लिम बस्तियां धीरे-धीरे टाइम बम बनती जा रही हैं

यूरोप में भी चल रहीं आतंक की फैक्ट्रियां

स्वीडन

pc: याहू news इंडिया

इस साल फरवरी में जो नई दिल्ली ने देखा और कुछ हफ्तों पहले बेंगलुरु ने, वही आज यूरोपीय देश स्वीडन भी देख रहा है। एक अफवाह के आधार पर स्वीडन के शहर मालमो को जिस प्रकार से कट्टरपंथी मुसलमानों ने आग में झोंका, उससे एक बार फिर सिद्ध हो गया कि अल्पसंख्यक तुष्टीकरण किसी भी देश के लिए कितना घातक हो सकता है।

पर ये हुआ क्यों? दरअसल डेन्मार्क के दक्षिणपंथी नेता रेस्मस पालूडन (Rasmus Paludan) स्वीडन के मालमो शहर मेंनोर्डिक देशों में इस्लामीकरणके मुद्दे पर व्याख्यान देने आए थे। उन्हें न केवल मालमो में घुसने से रोका गया, बल्कि उन्हें हिरासत में भी लिया गया। इससे भड़क कर उनके स्वीडिश समर्थकों ने विरोध प्रदर्शन किया, जिसमें कथित तौर पर कुरान की प्रतियाँ भी जलाई गई थीं।

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बस फिर क्या था, स्वीडन के कट्टरपंथी मुसलमान भड़क गए और उन्होंने ‘अल्लाह हु अकबर’ के नारे लगाते हुए टायर जलाए और पुलिस पर पत्थरबाजी भी शुरू कर दी। कई पुलिसवाले इस हिंसक झड़प में घायल भी हुए। मालमो के पुलिस प्रवक्ता कैल पर्सन के अनुसार, जो आज हुआ, और जो उसके पीछे कारण था, उसके बीच संबंध स्थापित करने में हम जुटे हुए हैं। जल्द ही हम स्थिति को नियंत्रण में ले आएंगे।

यदि हार्ड लाइन पार्टी द्वारा लिए गए कदम शत प्रतिशत सत्य हैं, तो वे निस्संदेह निंदनीय है। लेकिन इसके लिए कट्टरपंथी मुसलमानों द्वारा की गई हिंसा को भी उचित नहीं ठहराया जा सकता। यदि पिछले कुछ वर्षों में यूरोप में जो घटनाएँ हुई है, उसपर ध्यान दिया जाये, तो समझ में आता है कि, यूरोप में कट्टरपंथी इस्लाम इस समय उफान पर है।

यूरोप में इस्लाम इस समय सबसे तेज़ी से बढ़ते पंथों में से एक है। चूंकि मिडिल ईस्ट और अफ्रीकी उपमहाद्वीप में आए दिन तनातनी चलती है, इसलिए सीरिया और लीबिया से कई लोग जर्मनी, फ्रांस, बेल्जियम, स्वीडन और यूके जैसे देशों में पलायन कर रहे हैं। लेकिन फ्रांस, स्वीडन और यूके जैसे देशों में मुसलमानों की आबादी न केवल ज़्यादा है, बल्कि वहां के कट्टरपंथियों के समूह ने अपने स्वायत्त क्षेत्र भी स्थापित किए हैं। उन ख्सेत्रों में उसी देश का व्यक्ति वहां नहीं जा सकता, ठीक वैसे ही, जैसे अनुच्छेद 370 के निरस्त होने से पहले भारतीय कश्मीर में स्वच्छंद होकर नहीं घूम सकते थे।

प्यू रिसर्च प्रॉजेक्शन के अनुसार, आने वाले दशकों में यूरोप में मुसलमानों की संख्या दुगनी से अधिक हो जाएगी। इसी कारण से कई देशों ने अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और अखंडता को सुदृढ़ करना शुरू कर दिया है। कभी जिन मुसलमानों का फ्रांस दिल खोलकर स्वागत करता था, आज वही फ्रांस कट्टरपंथी इस्लाम के विरुद्ध बेहद सख्त रुख अपनाए हुए है। इस वर्ष फरवरी में एक अहम भाषण में फ्रांसीसी राष्ट्रपति इम्मैनुएल मैक्रोन ने दो टूक बोला, “हम ये कभी स्वीकार नहीं सकते कि, राष्ट्र के कानून से बढ़कर मजहब के कानून हो जाएं। स्वतंत्रता और समानता के साथ इस्लामिक अलगाववाद का कोई समझौता नहीं हो सकता। कट्टरपंथ इस्लाम हमारे राष्ट्र की अखंडता और एकता के लिए खतरनाक भी हो सकता है।

इम्मैनुएल मैक्रोन अपने विश्लेषण में गलत भी नहीं है, क्योंकि चार्ली ऐब्दो हमले और नाइस में ट्रक हमले के बाद फ्रांस ने अपना सबक भली-भांति सीख लिया। फ्रांस की तरह बेल्जियम भी कट्टरपंथी इस्लाम से ग्रसित है। बेल्जियम में ईसाई धर्म के पश्चात इस्लाम दूसरा सबसे बड़ा धर्म बन चुका है। 2019 में बेल्जियम की स्टेट सेक्युरिटी ने 100 ऐसे संगठन चिन्हित किए हैं, जो कट्टरपंथी इस्लाम की विचारधारा को बढ़ावा दे रहे हैं। बेल्जियम के ब्रुसेल्स शहर में 2016 के बम हमले के पीछे आईएसआईएस का हाथ बताया जा रहा है।

इस्लामिक कट्टरपंथ यूरोप के लिए कितना हानिकारक है, इसका अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि, जर्मनी में स्थित सऊदी प्रायोजित, किंग फ़हाद अकादेमी को इसलिए बंद कराना पड़ा था, क्योंकि यह अकादेमी इस्लामिक कट्टरपंथियों, विशेषकर आतंकियों का केंद्र बनता जा रहा था। जर्मनी में भी वहाबी विचारधारा बहुत तेज़ी से फैल रही है। वहां मुसलमान जर्मनी की आबादी का 6 प्रतिशत बन चुके हैं।

जिस प्रकार से तुर्की में हागिया सोफिया परिसर को पुनः मस्जिद में परिवर्तित किया गया है, उससे स्पष्ट पता चलता है कि किस प्रकार से कट्टरपंथी इस्लाम किसी भी गैर मुसलमान पंथ को मिटाकर ही दम लेना चाहता है। यूरोप में जिस तरह से घटनाएँ सामने आ रही हैं, यदि वहाँ के देश अब भी नहीं चेते, तो जल्द ही मालमो जैसे दंगे यूरोप में आम बात हो जाएंगे।

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