निधि राजदान के हार्वर्ड वाले प्रकरण में बहुत झोल है, तथाकथित पत्रकार के साथ ये फ्रॉड आसान नहीं है

जब डिग्री डिप्लोमा की हो और अरमान प्रोफेसर के तो यही होता है

निधि

अकसर ये कहावत सुनने को मिलती है कि ज्यादा स्मार्ट बनने वाले लोग असल में सबसे ज्यादा मूर्ख होते हैं। उन्हें आसानी से कोई भी साधारण व्यक्ति धोखा दे सकता है। एनडीटीवी की वरिष्ठ एंकर रही निधि राजदान के हार्वर्ड विश्वविद्यालय वाले फ्रॉड की घटना कुछ ऐसी ही है। लोग निधि का मजाक उड़ा रहे हैं कि आखिर पिछले साल भर से उनके साथ दुनिया की एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के नाम पर धोखाधड़ी हो रही थी, और वो इन सारी बातों से अनजान कैसे थीं? हर एक गैरजरूरी मुद्दे की बाल की खाल निकालने की प्रवृति रखने वाले एनडीटीवी के पत्रकार क्या असल जीवन में इतने ही पेशेवर हैं?

हार्वर्ड विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर बनने की इच्छा के साथ एनडीटीवी को टाटा कर चुकी एंकर निधि राजदान ने बताया है कि उनके साथ पिछले साल भर से हार्वर्ड विश्वविद्यालय के नाम पर धोखा हुआ है। उनका हार्वर्ड में फैकल्टी के तौर पर कोई भी चयन नहीं हुआ है, और इस मामले की गहन जांच के लिए वो विश्वविद्यालय के प्रबंधन से भी संपर्क में हैं, जिससे जालसाजों का पर्दाफाश हो सके। निधि राजदान काफी दुखी हैं क्योंकि इतनी प्रतिष्ठित जगहों पर शिक्षक की जिम्मेदारी किसी गर्व की अनुभूति देती है, लेकिन फिर उस सपने का टूटना और भी बुरा होता है लेकिन क्या निधि राजदान ने इस मामले में जरूरत से ज्यादा ढील नहीं दिखाई?

निधि राजदान को पिछले साल एक रैंडम ईमेल आया और जिसमें कहा गया कि उन्हें हार्वर्ड विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर के पद के लिए चुना गया है। निधि खुशी में इतना ज्यादा उछल गईं कि उन्होंने इसका ढिंढोरा पीट डाला, कि वो अब हार्वर्ड की प्रोफेसर हैं। निधि राजदान ने ये क्यों दिमाग़ नहीं लगाया कि हार्वर्ड में पत्रकारिता से संबंधित कोई विभाग ही नहीं है, तो आखिर वो वहां पढ़ाएंगी क्या… इतना ही नहीं उन्होंने अपने 20 साल के एनडीटीवी जैसै बाल की खाल निकालने वाले समूह के पत्रकारिता के करियर और अनुभव को भी आतुरता में रौंद डाला, और पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों को ही नजरंदाज कर दिया।

 

किसी भी साधारण या असाधारण नई नौकरी में एक साक्षात्कार होता है। डाक्यूमेंट्स का आदान-प्रदान होता है। कुछ जरूरी परीक्षाएं तक होती हैं, लेकिन निधि राजदान के साथ ऐसा कुछ हुआ ही नहीं, और पत्रकारिता के पेशे में रहीं निधि को ये पूरा वाकया अजीब भी नहीं लगा। साफ है कि वो खुद को ज्यादा ज्ञानी और क्षेष्ठ समझती हैं। इसीलिए उनके साथ उस धोखेबाज व्यक्ति ने आसानी से सारे फ्रॉड कर डाले। आज स्थिति ये है कि निधि राजदान जो एक बेहद वरिष्ठ पत्रकार समझी जाती थीं उनका सोशल मीडिया समेत ट्विटर पर मजाक उड़ाया जा रहा है। यही नहीं मजाक एनडीटीवी का भी उड़ाया जा रहा है जो कि निधि को अपने शो में एक गेस्ट पैनलिस्ट के रूप में बुलाकर उनके नाम के आगे एसोसिएट प्रोफेसर, हार्वर्ड विश्वविद्यालय का विशेषण लगाता है।

निधि राजदान के साथ हुए फ्रॉड के इस पूरे मामले में एनडीटीवी की उस तथाकथित शीर्ष स्तर की पत्रकारिता की पोल भी खुल गई है कि उसके पत्रकारों को ज्ञान और घमंड के कारण बेवकूफ बनाना बहुत आसान है। साथ ही उनकी पत्रकारिता में रिसर्च की शैली खत्म हो चुकी है, जिसकी जगह एजेंडा और प्रोपेगैंडा चलाने वालों ने ले ली है।

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