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असम में UCC बिल पास: बहुविवाह और ‘लव जिहाद’ पर लगेगा टोटल ब्रेक, सीएम हिमंत का बड़ा कदम!

उत्तर पूर्व भारत के रणनीतिक और राजनीतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण राज्य असम से एक बेहद बड़ी और युगांतकारी खबर सामने आई है।

Ayush Aman Rai द्वारा Ayush Aman Rai
27 May 2026
in चर्चित, मत, राजनीति
असम में UCC बिल पास: बहुविवाह और ‘लव जिहाद’ पर लगेगा टोटल ब्रेक, सीएम हिमंत का बड़ा कदम!

असम में UCC बिल पास

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उत्तर पूर्व भारत के रणनीतिक और राजनीतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण राज्य असम से एक बेहद बड़ी और युगांतकारी खबर सामने आई है। असम विधानसभा ने एक लंबी मैराथन बहस, तीखी नोकझोंक और विपक्षी दलों के भारी हंगामे व वॉकआउट के बीच ‘समान नागरिक संहिता’ (Uniform Civil Code – UCC) विधेयक को अपनी अंतिम मंजूरी दे दी है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार ने इस कानून को राज्य के इतिहास का सबसे बड़ा सामाजिक और कानूनी सुधार बताया है। इस नए और कड़े कानून के लागू होने के बाद असम में बहुविवाह (Polygamy) और लव जिहाद जैसी सामाजिक व आपराधिक गतिविधियों पर पूरी तरह से कानूनी ब्रेक लग जाएगा। इस ऐतिहासिक फैसले के साथ ही उत्तराखंड और गुजरात के बाद असम देश का तीसरा ऐसा राज्य बन गया है, जिसने अपने यहां समान नागरिक संहिता को धरातल पर उतारने की दिशा में सफलता पाई है।

महिलाओं के सम्मान और गरिमा के प्रति समर्पित ऐतिहासिक कदम

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इस विधेयक के विधानसभा से पारित होने को अपनी सरकार की अब तक की सबसे बेहतरीन और ऐतिहासिक शुरुआत करार दिया है। उन्होंने इसे असम की उन लाखों महिलाओं के सम्मान और अधिकारों के प्रति एक बड़ी श्रद्धांजलि बताया है, जो सदियों से कुप्रथाओं और कानूनी विसंगतियों का शिकार होती आई हैं।

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सदन के पटल पर चर्चा का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री सरमा ने बेहद भावुक और कड़े शब्दों में कहा:

“राज्य के भीतर किसी भी परिस्थिति में और किसी भी कीमत पर महिलाओं की गरिमा, सुरक्षा और उनके मौलिक अधिकारों से समझौता नहीं किया जा सकता। किसी भी समाज या सरकार के कार्यकाल में आर्थिक उतार-चढ़ाव तो आते-जाते रहते हैं, वित्तीय घाटे को दोबारा पूरा किया जा सकता है, लेकिन यदि एक बार किसी महिला की गरिमा और सामाजिक सुरक्षा खो जाए, तो उसे किसी भी कीमत पर वापस नहीं पाया जा सकता। यह कानून राजनीतिक नफा-नुकसान से परे जाकर राज्य की आधी आबादी को उनका हक देने के लिए लाया गया है।”

शादी, तलाक और उत्तराधिकार के बदल गए नियम: सबके लिए एक कानून

असम विधानसभा में पारित किए गए इस नए यूसीसी कानून के तहत राज्य की भौगोलिक सीमाओं के भीतर रहने वाले सभी धर्मों, जातियों और संप्रदायों के नागरिकों के लिए पारिवारिक मामलों में एक समान नियम लागू हो गए हैं। अब तक अलग-अलग धर्मों के लोग अपने-अपने पर्सनल लॉ (Personal Laws) के आधार पर शादी, विवाह विच्छेद (तलाक), गोद लेने (Adoption) और संपत्ति के उत्तराधिकार (Property Inheritance) जैसे मामलों का निपटारा करते थे, जिससे अक्सर महिलाओं के साथ भेदभाव की शिकायतें सामने आती थीं।

नए कानून के तहत अब इन सभी संवेदनशील और सामाजिक मामलों को धर्मनिरपेक्ष (Secular) कानूनी दायरे में ला दिया गया है। इसका सीधा मतलब यह है कि अब विवाह के लिए न्यूनतम आयु, तलाक के आधार और माता-पिता की संपत्ति में बेटे-बेटियों के समान अधिकारों को पूरी तरह से संहिताबद्ध कर दिया गया है। इससे कानूनी विसंगतियां दूर होंगी और अदालतों पर भी मुकदमों का बोझ कम होगा।

बहुविवाह (Polygamy) पर पूर्ण प्रतिबंध: नियम तोड़ा तो मिलेगी 7 साल की जेल

इस कानून की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक विशेषताओं में से एक है राज्य में बहुविवाह या द्विविवाह (Polygamy or Bigamy) प्रथा पर पूरी तरह से पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाना। पुराने पर्सनल लॉ के तहत कुछ समुदायों में पुरुषों को एक से अधिक शादियां करने की कानूनी छूट मिली हुई थी, जिसका खामियाजा अक्सर पहली पत्नी और बच्चों को भुगतना पड़ता था।

असम यूसीसी के लागू होने के बाद अब कोई भी व्यक्ति अपनी पहली पत्नी के रहते हुए या कानूनी रूप से तलाक लिए बिना दूसरी शादी नहीं कर सकता। यदि कोई भी व्यक्ति इस कड़े नियम का उल्लंघन करता पाया जाता है, तो उसके खिलाफ गैर-जमानती धाराओं में मुकदमा दर्ज होगा और उसे अधिकतम 7 साल तक की जेल की कठोर सजा भुगतनी पड़ सकती है। इसके साथ ही उस पर भारी जुर्माना भी लगाया जाएगा। सरकार का मानना है कि यह प्रावधान समाज में महिलाओं के शोषण को रोकने में सबसे बड़ा हथियार साबित होगा।

लिव-इन रिलेशनशिप का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन: 3 महीने की सजा का प्रावधान

नए यूसीसी कानून में आधुनिक जीवनशैली और सामाजिक सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने के लिए लिव-इन रिलेशनशिप (Live-in Relationships) को लेकर बेहद कड़े और अभूतपूर्व नियम बनाए गए हैं। नए प्रावधानों के तहत असम राज्य में यदि कोई भी जोड़ा (Couple) बिना शादी किए एक साथ एक छत के नीचे रहना चाहता है, तो उनके लिए स्थानीय प्रशासन या संबंधित नोडल अथॉरिटी के पास अपने लिव-इन रिलेशनशिप का अनिवार्य रूप से पंजीकरण (Registration) कराना कानूनी रूप से आवश्यक होगा।

अगर कोई जोड़ा बिना रजिस्ट्रेशन कराए लिव-इन में रहता हुआ पकड़ा जाता है, या इस नियम की अनदेखी करता है, तो इसे कानूनन एक अपराध माना जाएगा। ऐसे जोड़ों को तीन महीने तक की जेल की सजा या भारी जुर्माना, अथवा दोनों भुगतने पड़ सकते हैं। सरकार का तर्क है कि इस नियम के जरिए उन महिलाओं के कानूनी अधिकारों और सामाजिक सुरक्षा को सुनिश्चित किया जाएगा जो लिव-इन में रहती हैं, ताकि भविष्य में उनके साथ किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी या प्रताड़ना न हो सके।

सांस्कृतिक विविधता का सम्मान: अनुसूचित जनजातियों (ST) को दायरे से बाहर रखा गया

असम एक ऐसा राज्य है जो अपनी अनूठी और समृद्ध जनजातीय संस्कृति व विविधता के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। राज्य में दर्जनों स्वदेशी और अनुसूचित जनजातियां (Scheduled Tribes) निवास करती हैं, जिनके अपने सदियों पुराने पारंपरिक रीति-रिवाज, वैवाहिक परंपराएं और सामाजिक कानून हैं। सरकार ने इस सांस्कृतिक विविधता को किसी भी तरह का नुकसान न पहुंचाने की प्रतिबद्धता दोहराई है।

इसी अनूठी और संवेदनशील विविधता को बनाए रखने के लिए मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की सरकार ने ऐतिहासिक कदम उठाते हुए राज्य की सभी अनुसूचित जनजातियों (ST) को इस समान नागरिक संहिता के दायरे से पूरी तरह से बाहर (Exempt) रखा है। इसका मतलब यह है कि जनजातीय समाज के लोग अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक परंपराओं, विवाह पद्धतियों और संपत्ति के नियमों का पालन पहले की तरह ही बिना किसी सरकारी हस्तक्षेप के करते रहेंगे। इस छूट के जरिए सरकार ने क्षेत्रीय भावनाओं और संवैधानिक सुरक्षा उपायों के बीच एक बेहतरीन संतुलन साधने का प्रयास किया है।

विपक्ष का तीखा विरोध: लोकतांत्रिक मूल्यों और निजता के अधिकार पर उठाए सवाल

असम विधानसभा में इस विधेयक के पेश होने के समय से ही विपक्षी दलों, विशेष रूप से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Congress) और बदरुद्दीन अजमल की पार्टी ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) ने इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। विपक्ष ने सदन के भीतर और बाहर सरकार के इस कदम का पुरजोर विरोध किया और इसे भारतीय जनता पार्टी (BJP) का एक सुनियोजित ‘राजनीतिक एजेंडा’ करार दिया।

विपक्षी नेताओं ने इस कानून की ‘एकरूपता’ (Uniformity) पर गंभीर कानूनी और व्यावहारिक सवाल उठाए हैं। विपक्ष का मुख्य तर्क यह है कि जब राज्य की एक बहुत बड़ी आबादी यानी सभी अनुसूचित जनजातियों को इस कानून के दायरे से बाहर कर दिया गया है, तो यह कानून तकनीकी और व्यावहारिक रूप से पूरी तरह ‘समान’ (Uniform) कैसे रह गया? इसके अलावा, विपक्ष ने लिव-इन रिलेशनशिप के अनिवार्य पंजीकरण और उसमें जेल की सजा के प्रावधान को नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty) और संविधान द्वारा दिए गए निजता के अधिकार (Right to Privacy) का खुला उल्लंघन बताया है। विपक्ष का आरोप है कि यह कानून अदालतों में टिक नहीं पाएगा और इसे केवल आगामी चुनावों में ध्रुवीकरण और राजनीतिक लाभ लेने के उद्देश्य से लाया गया है।

असम यूसीसी (UCC) की 5 सबसे मुख्य और बड़ी बातें

असम के इस नए कानून को समझने के लिए इसके पांच सबसे प्रमुख बिंदुओं को इस प्रकार देखा जा सकता है:

क्र.सं.मुख्य बिंदुकानूनी प्रावधान और विवरण
1देश का तीसरा यूसीसी राज्यउत्तराखंड और गुजरात के बाद असम देश का तीसरा ऐसा राज्य बन गया है जिसने अपनी विधानसभा में समान नागरिक संहिता विधेयक को सफलतापूर्वक पारित कराया है।
2बहुविवाह पर पूर्ण प्रतिबंधराज्य में अब किसी भी धर्म के व्यक्ति के लिए बहुविवाह या द्विविवाह पूरी तरह से अवैध होगा। इस नियम को तोड़ने वाले दोषी को अधिकतम 7 साल की जेल की सजा होगी।
3लिव-इन का अनिवार्य पंजीकरणलिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों के लिए सरकारी पोर्टल या अथॉरिटी के पास रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी होगा। नियम की अवहेलना करने पर 3 महीने की जेल हो सकती है।
4जनजातियों को पूर्ण छूटअसम की अनुसूचित जनजातियों (ST) के पारंपरिक रीति-रिवाजों, संस्कृति और उनके विशिष्ट व्यक्तिगत कानूनों को अक्षुण्ण रखने के लिए उन्हें इस पूरे कानून के दायरे से पूरी तरह बाहर रखा गया है।
5विपक्ष का कड़ा विरोधकांग्रेस और AIUDF जैसे विपक्षी दलों ने इस विधेयक को लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ, निजता का हनन करने वाला और केवल चुनावी लाभ के लिए लाया गया कदम बताया है।

कानूनी और सामाजिक सुधार बनाम संवैधानिक विरोधाभास: एक विश्लेषण

असम का यह समान नागरिक संहिता विधेयक मुख्य रूप से सामाजिक सुधार, लैंगिक समानता (Gender Equality) और महिला सशक्तीकरण के नाम पर केंद्रित है। सरकार के पास यह मजबूत तर्क है कि बहुविवाह पर रोक लगाने और विवाह-तलाक के नियम समान करने से उन महिलाओं को सीधा कानूनी संरक्षण मिलेगा जो अब तक पर्सनल लॉ की कमियों के कारण न्याय से वंचित रह जाती थीं। लिव-इन रिलेशनशिप को नियमित करने के पीछे भी महिलाओं के भरण-पोषण और उनके कानूनी अधिकारों की सुरक्षा का हवाला दिया गया है, जो एक प्रगतिशील समाज की दिशा में बढ़ा कदम नजर आता है।

हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस कानून की संरचना में कुछ गहरे विरोधाभास भी छिपे हुए हैं जो आने वाले समय में न्यायपालिका के सामने चुनौती के रूप में आ सकते हैं। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44 (राज्य के नीति निदेशक तत्व) पूरे देश में एक समान नागरिक संहिता लागू करने की बात करता है, लेकिन क्षेत्रीय संवेदनशीलताओं और पूर्वोत्तर भारत की विशेष स्वायत्तता के कारण असम सरकार को जनजातियों को बाहर रखने का यह मध्यमार्ग चुनना पड़ा।

इसके अतिरिक्त, बालिग नागरिकों के आपसी सहमति से बने संबंधों (लिव-इन) में राज्य का दखल और पंजीकरण न होने पर जेल की सजा का प्रावधान, सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निजता के ऐतिहासिक फैसलों (पुट्टस्वामी जजमेंट) की कसौटी पर परखा जाना बाकी है। बहरहाल, तमाम विवादों और बहसों के बीच असम ने देश के कानूनी इतिहास में अपना नाम दर्ज करा लिया है, और अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि जमीनी स्तर पर यह कानून असम के सामाजिक ताने-बाने को कितना प्रभावित करता है।

Tags: Assam Assembly Marathon DebateAssam UCC Bill PassedHimanta Biswa Sarma UCC AssamLive in Relationship Registration AssamOpposition Protest Congress AIUDF.Scheduled Tribes Exemption UCCUniform Civil Code Assam Polygamy BanWomen Empowerment Social Security Assam
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