CAA के बिना ही गैर-मुस्लिमों को मिलेगी भारतीय नागरिकता, शाह ने खोला दूसरा दरवाज़ा

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गैर-मुस्लिम नागरिकता

कोरोनावायरस ने देश के आम नागरिकों को तो मुसीबत में डाला ही है साथ ही बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से प्रताड़ित होकर आए उन गैर मुस्लिम लोगों के नागरिकता लेने के सपनों को भी झटका दे दिया। इसके विपरीत अब मोदी सरकार ने इन लोगों को नागरिकता दिलाने के लिए नए सीएए कानून के बिना ही नागरिकता देने की तैयारी शुरू कर दी है‌। सरकार द्वारा बांग्लादेश पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आए गैर-मुस्लिम शरणार्थियों से नागरिकता के लिए 1955 और 2009 के नागरिकता कानूनों के अंतर्गत आवेदन भी मांगें गए हैं। सरकार के इस कदम से उन गैर मुस्लिम लोगों की मुश्किलें अधिक आसान होंगी जो वर्षों से भारत की नागरिकता के लिए देश के अलग-अलग इलाकों में आज भी शरणार्थी शिविरों में रहने को मजबूर हैं।

देश के करीब सभी राज्यों में ऐसे गैर-मुस्लिम लोग रह रहे हैं, जो कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान, और बांग्लादेश से प्रताड़ित होकर आए हैं, और यहां नागरिकता की आस में शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं। इसमें हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी धर्म के लोग शामिल हैं‌। इन सभी की नागरिकता के लिए मोदी सरकार ने सीएए कानून बनाया था। हालांकि, उसमें मोदी सरकार को प्रायोजित आलोचनाओं का सामना करना पड़ा, लेकिन अब उस कानून के बिना ही इन सभी गैर मुस्लिम लोगों को नागरिकता देने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है, जो कि इन पीड़ित लोगों के लिए किसी खुशखबरी से कम नहीं है।

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नागरिकता से जुड़े इस मामले में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने नागरिकता कानून 1955 और 2009 में कानून के अंतर्गत आने वाले नियमों के अनुसार आदेश के लागू होने की एक अधिसूचना जारी की है। जिसके अंतर्गत बांग्लादेश, अफगानिस्तान समेत पाकिस्तान से आए गैर-मुस्लिम लोगों से नागरिकता के लिए आवेदन मांगें गए हैं।

सरकार द्वारा जारी अधिसूचना में कहा गया, “नागरिकता कानून 1955 की धारा 16 के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए केंद्र सरकार ने कानून की धारा पांच के तहत यह कदम उठाया है। इसके अंतर्गत उपरोक्त राज्यों और जिलों में रह रहे अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और इसाई अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को भारतीय नागरिक के तौर पर पंजीकृत करने के लिए निर्देश दिया गया है।’’

अधिसूचना के अंतर्गत वो लोग योग्य होंगे जो कि गुजरात के मोरबी, राजकोट, पाटन और वडोदरा, छत्तीसगढ़ में दुर्ग और बलोदबाजार, राजस्थान में जालौर, उदयपुर, पाली, बाड़मेर और सिरोही और हरियाणा के फरीदाबाद और पंजाब के जालंधर में लंबे वक्त से रह रहे हैं। इतना ही नहीं भारत की नागरिकता के लिए आवेदन ऑनलाइन होगा जाएगा। वहीं जिलाधिकारी या सचिव आवश्यकतानुसार मामलों के हिसाब से आवेदन की जांच करेंगे।

यही नहीं, सरकार के इस कदम के बाद भविष्य में राजधानी दिल्ली के इलाके मजनू का टीला में वर्षों में रहने वाले लोगों को बड़ी राहत मिल सकती है।

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1947 से लेकर आज तक पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से अनेकों गैर-मुस्लिम लोग वहां हुई प्रताड़ना के कारण भारत आए थे। समय-समय पर उन्हें नागरिकता भी मिली, लेकिन आज भी बड़ी संख्या में लोग शरणार्थी शिविरों में रहने को मजबूर हैं। ऐसे में मोदी सरकार सीएए का कानून लाई थी, लेकिन कोरोना के कारण हो रहे विलंब को देखते हुए सरकार ने अब उस कानून के बिना ही नागरिकता कानून 1955 और 2009 में कानून के अंतर्गत गैर मुस्लिमों को नागरिकता देने की तैयारी कर ली है, जिसे एक सहज कदम के रूप में देखा जा रहा है।

मोदी सरकार के गैर-मुस्लिम बांग्लादेशी, पाकिस्तानी और अफगानी शरणार्थियों को नागरिकता देने के लिए बढ़े इस कदम को सीएए की आहट के तौर पर देखा जा रहा है, क्योंकि उस कानून के प्रभावी होते ही गैर-मुस्लिम शरणार्थियों की मुश्किलें हवा हो जाएंगी।

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