हिंसा और हत्याओं के बीच, बंगाल को जगमोहन मल्होत्रा जैसे राज्यपाल की आवश्यकता है

बंगाल में तभी कुछ कमाल हो सकता है!

पिछले दो दिनों में छह से ज्यादा भाजपा नेताओं की हत्या हो चुकी है, और साथ ही साथ विपक्ष के अधिकतम नेताओं पर हमले भी किए जा चुके हैं, लेकिन भाजपा का लाचार रवैया न तो लोगों के गले उतर रहा है और न ही गृह मंत्री अमित शाह के व्यक्तित्व को देखते हुए एक शुभ संकेत है।इस समय बंगाल में जगदीप धनखड़ जैसे लाचार लोगों की नहीं, बल्कि जगमोहन मल्होत्रा जैसे सशक्त प्रशासकों की आवश्यकता है, जिनका आज दुर्भाग्यवश स्वर्गवास हो चुका है।

यदि जगमोहन को हम भारत का ऑस्कर शिन्डलर कहे तो गलत नहीं होगा। उन्होंने न केवल कश्मीर घाटी को पाकिस्तान के हाथों में जाने से बचाया, बल्कि कश्मीरी पंडितों की काफी हद तक रक्षा भी की।

जगमोहन मल्होत्रा को पहली बार राज्यपाल बनाकर जम्मू-कश्मीर 1984 में कॉन्ग्रेस ने भेजा था। उस समय वह 1989 तक इस पद पर रहे। दूसरी बार वीपी सिंह की सरकार ने उन्हें जनवरी 1990 में राज्यपाल बनाकर भेजा और मई 1990 तक वे पद पर रहे। जगमोहन 1990 में उसी दिन जम्मू कश्मीर के राज्यपाल बने, जिस दिन कश्मीर में मौत का तांडव रचा गया और लाखों की संख्या में कश्मीरी पंडितों की हत्या की गई और उनके घरों को जलाया गया।

उस दिन को लेकर जगमोहन ने ‘कश्मीर: समस्या और समाधान’ में लिखा है, “पहले ही दिन आतंकवादियों, पाकिस्तान समर्थित तत्वों, कट्टरपं​थी और सांप्रदायिक तत्वों तथा राजनीतिक और शासकीय निहित तत्वों ने अपने-अपने तरीके से उन्हें कमजोर और पंगु बनाने का निर्णय कर लिया था। लेकिन मेरे लिए असल चुनौती 26 जनवरी 1990 को इंतजार कर रही थी। उस साल की 26 जनवरी जुमे के दिन थी। मस्जिदों के लाउडस्पीकरों से लोगों को छोटे-छोटे समूह में ईदगाह पहुँचने को उकसाया जा रहा था। श्रीनगर के आसपास के गाँव, कस्बों से भी जुटान होना था। योजना थी कि जोशो-खरोश के साथ नमाज अता की जाएगी। आजादी के नारे लगाए जाएँगे। आतंकवादी हवा में गोलियाँ चलाएँगे। राष्ट्रीय ध्वज जलाया जाएगा। इस्लामिक झंडा फहाराया जाएगा। विदेशी रिपोर्टर और फोटोग्राफर तस्वीरें लेने के लिए वहाँ जमा रहेंगे। उससे पहले 25 की रात टोटल ब्लैक आउट की कॉल थी”।

अब ऐसे में जगमोहन जी के पास दो ही विकल्प थे – या तो जो हो रहा है, होने दो, या फिर जिम्मेदारी उठाओ स्थिति को बदलने की। आतंकियों को लगा कि उन्हे किसी भी प्रकार का प्रत्युत्तर नहीं मिलेगा। इस्लामी झंडा लहराते ही उनका सरेंडर करवाया जाएगा। तैयारियाँ पूरी थी और साजिश पर गुप्त तरीके से अमल हो रहा था।

लेकिन जगमोहन मल्होत्रा के इरादे कुछ और ही थे। जगमोहन ने 25 जनवरी की दोपहर ही कर्फ्यू लगा दिया। अपने कुछ विश्वस्त सहयोगियों को उसी शाम बता दिया कि वे सलामी लेने जम्मू नहीं जाएँगे। श्रीनगर में ही डेरा डाले रहेंगे। सभी सरकारी विभागों को आदेश दिए कि हर हाल में दफ्तरों में लाइटें जलनी चाहिए।

हर हाल में स्ट्रीट लाइट ऑन रहनी चाहिए। इसके लिए पीडब्ल्यूडी और बिजली विभाग को विशेष आदेश दिए गए। शाम हुई तो बिजली जल उठी। बकौल जगमोहन, आप इसे अथॉरिटी का सम्मान कहिए या डर, कर्मचारियों ने इसका पालन किया।

साभार: कश्मीर: समस्या और समाधान

इस समय भारत को जगमोहन जैसे प्रशासकों की सख्त आवश्यकता है। बंगाल में जो कुछ भी हो रहा है, वो कश्मीर के उन भयानक दिनों की ही याद दिला रहा है, और यह बात भाजपा से बेहतर कौन जान सकता है। दो वर्ष पहले ही सत्यपाल मलिक के नेतृत्व में बिना खून खराबे के कश्मीर घाटी को इस्लामिक आतंकियों के प्रकोप से सफलतापूर्वक बचाया गया था, और अभी भी भाजपा का कुछ बिगड़ा नहीं।

यदि वे जगदीप धनखड़ के स्थान पर किसी ऐसे प्रशासक को लाते हैं, जिसके लिए राष्ट्रधर्म से ऊपर कुछ नहीं है, तो ये जगमोहन जैसे प्रशासकों को एक सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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