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4500 साल पहले जब पश्चिमी देश अधपके मांस पर जीवन यापन करते थे, भारतीय तब पौष्टिक लड्डू खाते थे

Aniket Raj द्वारा Aniket Raj
27 August 2021
in इतिहास
राजस्थान हड़प्पा बिजनौर

PC: The Hitavada

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एक अध्ययन में सामने आया है कि लगभग 4,000 साल पहले हड़प्पा सभ्यता के दौरान रहने वाले लोग उच्च प्रोटीन, मल्टीग्रेन ‘लड्डू’ का सेवन करते थे। राजस्थान में खुदाई के दौरान मिली सामग्री के वैज्ञानिक अध्ययन से यह बात सामने आई है। पश्चिमी राजस्थान के बिजनौर में एक हड़प्पा पुरातात्विक स्थल की खुदाई के दौरान में कम से कम सात ‘लड्डू’ मिले हैं।

राजस्थान में एक हड़प्पा स्थल बिजनौर में मिली सामग्री पर हुए एक नए वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार, हड़प्पा के लोग लगभग 4,000 साल पहले उच्च प्रोटीन वाले मल्टीग्रेन “लड्डू” का सेवन करते थे। अध्ययन संयुक्त रूप से बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोसाइंसेज (बीएसआईपी), लखनऊ और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई), नई दिल्ली द्वारा आयोजित किया गया था और विज्ञान की जानकारी के लिए विश्व प्रसिद्ध प्रकाशक एल्सेवियर द्वारा ‘जर्नल ऑफ आर्कियोलॉजिकल साइंस: रिपोर्ट्स’ में प्रकाशित किया गया था। अध्ययन यह भी इंगित करता है कि ये “लड्डू” अब विलुप्त हो रही सरस्वती नदी के तट पर किसी प्रकार के अनुष्ठान का हिस्सा था।

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बीएसआईपी के लिए काम करने वाले एक वैज्ञानिक, राजेश अग्निहोत्री ने कहा, “राजस्थान के अनूपगढ़ के बिजनौर में हड़प्पा स्थल पर एएसआई द्वारा सात समान बड़े आकार के भूरे रंग के ‘लड्डू’, बैलों की दो मूर्तियाँ और एक हाथ से पकड़े हुए तांबे की अदज (कुल्हाड़ी के समान एक उपकरण, लकड़ी काटने या आकार देने के लिए इस्तेमाल किया जाता है) की खुदाई की गई है।”

वैज्ञानिकों ने कहा, “ये लड्डू, लगभग 2600 ईसा पूर्व के हैं, अच्छी तरह से संरक्षित पाए गए थे क्योंकि एक कठोर संरचना इस तरह से गिर गई थी कि यह उनके ऊपर एक छत के रूप में काम करती थी और उन्हें कुचलने से रोकती थी। अगर वे टूट गए होते, तो ‘लड्डू’ पूरी तरह से सड़ जाते, लेकिन चूंकि ये मिट्टी के संपर्क में थे, इसलिए कुछ आंतरिक कार्बनिक पदार्थ और अन्य हरे घटक सुरक्षित रहे। लड्डू के बारे में सबसे अजीब पहलू बैंगनी रंग का घोल था जो पानी के संपर्क में आने से बनता था।

2017 में एएसआई द्वारा “लड्डू” के नमूनों की खुदाई की गई थी और वैज्ञानिक विश्लेषण के लिए बीएसआईपी को दिए गए थे। बीएसआईपी वैज्ञानिक राजेश अग्निहोत्री आगे बताते हैं, “पहले, हमने सोचा था कि घग्गर (तत्कालीन सरस्वती) के तट के पास खोदे गए इन लड्डुओं का गुप्त गतिविधियों से कुछ संबंध था क्योंकि मूर्तियाँ और अदज भी निकटता में पाए गए थे। हम उनके आकार और प्रकार से चकित थे क्योंकि वे स्पष्ट रूप से मानव निर्मित थे। इस जिज्ञासा ने हमें उनकी रचना का पता लगाने के लिए प्रेरित किया। हमने शुरू में माना कि यह मांसाहारी भोजन हो सकता है।

हालांकि, बीएसआईपी के वरिष्ठ वैज्ञानिक अंजुम फारूकी के एक विश्लेषण से पता चला है कि “लड्डू” जौ, गेहूं, चना और कुछ अन्य तिलहनों से बने होते हैं। अंजुम फारूकी ने कहा,  “इन लड्डू में अनाज और दालें थीं, और मूंग दाल सामग्री पर हावी थी। चूंकि हड़प्पा के लोग कृषक थे, इसलिए इन “लड्डू” की उच्च-प्रोटीन मल्टीग्रेन संरचना समझ में आती है।‘’

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बीएसआईपी और एएसआई दोनों के नौ वैज्ञानिकों की एक टीम ने निष्कर्ष निकाला कि सात लड्डू के साथ-साथ विशिष्ट हड़प्पा उपकरण/वस्तुओं की उपस्थिति से संकेत मिलता है कि हड़प्पा के लोगों ने भोजन के पूरक के रूप में तत्काल पोषण के लिए प्रसाद बनाया, अनुष्ठान किया और बहु-पोषक कॉम्पैक्ट ‘लड्डू’ का सेवन किया। सात खाद्य गेंदों के आस-पास बैल की मूर्तियों, अदजे और एक हड़प्पा मुहर की उपस्थिति यह दर्शाती है कि मनुष्य इन सभी वस्तुओं को उनकी उपयोगिता और महत्व के कारण सम्मानित करता है। “लड्डू” की पुरातात्विक खोज बैल और तांबे की मूर्तियों के साथ मिलकर इस सुझाव को जन्म देती है कि हड़प्पा के लोग इन उपकरणों का उपयोग अनुष्ठान करने के उद्देश्य से करते थे।

एएसआई के निदेशक (खुदाई) संजय मुजुल ने कहा,“वैज्ञानिक अध्ययन के बाद, हम कह सकते हैं कि यह पहला सबूत है कि हड़प्पा के लोगों ने सरस्वती नदी (अब विलुप्त) के तट पर कुछ अनुष्ठान किए। हालांकि अनुष्ठान की प्रकृति स्पष्ट नहीं है, यह ‘पिंड दान’ (पूर्वजों को श्रद्धांजलि और भोजन की पेशकश) के समान हो सकता है। जब हमें  राजस्थान में बिजनौर में खाने के गोले मिले, तो यह एक ऐसा स्थान प्रतीत हुआ जहाँ अनुष्ठान किए गए थे। हमें वहां से टेराकोटा बैल, पेंट किए हुए बर्तन और हड्डियाँ मिलीं।‘’

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पुरात्विक खुदाई से हमेशा सनातन के गौरवशाली इतिहास के अवशेष मिलते है। मिलें भी क्यों न आखिर जो सदा सर्वदा शाश्वत और सत्य है वही तो सनातन है। सनातन संस्कृति के पुरात्विक अवशेष हमेशा भारत के गौरवशाली, समृद्ध और विकसित सभ्यता के सत्य को स्थापित करते है। पाश्चात्य ने भले ही सूचना के विस्फोट के इस दौर में सारी महत्वपूर्ण उपलब्धियों और खोजों का श्रेया स्वयं ले लिया है परंतु जब हम तर्क आधारित इतिहास के साक्ष्यों को खंघालेंगे तो हमें सनातन की उन्नत सभ्यता देखने को मिलेगी। विज्ञान, तकनीक, चिकित्सा, समाजशास्त्र, भूगोल, गणित हमने सारे विषयों और क्षेत्रों मे निर्विवाद रूप से अपनी सर्वोच्चता स्थापित की है। उसी कड़ी में ये खोज भी है। जब दुनिया अधपका माँस खाकर जिंदा थी तब हमने कृषि और पाकशास्त्र के क्षेत्र मे इतनी उन्नति कर ली थी। जब दुनिया बंजारो की तरह रह रही थी तब हमने एक उन्नत और जटिल सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था स्थापित कर ली थी। अब समय आ गया है अब दुनिया भारत के इस उत्कृष्ट अस्तित्व को पहचाने और उसे श्रेया दे। हो सकता है इससे मानव जाती के विकास के मार्ग प्रशस्त हों।

Tags: पुरातत्वराजस्थानहड़प्पा
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टिप्पणियाँ 2

  1. sandysandeep956819@gmail.com says:
    5 years पहले

    आपका कहना है कि हड़प्पा सभ्यता के लोग मल्टीग्रेन लड्डू खाते थे तो मल्टी के लड्डू के पत्थर के होते थे जो इतने सालों बाद भी आप को सुरक्षित साथ लड्डू मिले वह सड़े नहीं कौन से लड्डू थे जो अभी तक आप को जिंदा मिले मेरे को यह समझ में नहीं आया

    Reply
    • Hemlata Mishra says:
      5 years पहले

      sandysandeep956819@gmail.com Yehan moorkhoon ko samjhane ki baat nahi ki ja rahi hai..

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