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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस: नारी सशक्तिकरण और पाश्चात्य Vs वैदिक दर्शन, क्या वैदिक काल में महिलाओं को प्राप्त अधिकारों का स्तर हासिल कर सके हैं पश्चिमी देश?

ईसाई धर्मशास्त्रियों जैसे कि टॉमस एक्विनास ने महिलाओं को 'पुरुषों के अधीन' माना और कहा कि वे 'सहायक मात्र' हैं, जो पुरुषों की सेवा के लिए बनी हैं। अथर्ववेद (14.1.6) में पत्नी को घर की स्वामिनी माना गया है।

Dr Alok Kumar Dwivedi द्वारा Dr Alok Kumar Dwivedi
8 March 2026
in इतिहास
पाश्चात्य सभ्यता में महिलाओं को कमतर आँकने के विचार को एक सिद्धान्त ने और पुष्ट किया कि उनमें आत्मा नहीं पायी जाती है।

पाश्चात्य सभ्यता में महिलाओं को कमतर आँकने के विचार को एक सिद्धान्त ने और पुष्ट किया कि उनमें आत्मा नहीं पायी जाती है।

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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (International Women’s Day) प्रत्येक वर्ष 8 मार्च को मनाया जाता है। ये दिन महिलाओं के अधिकारों, समानता और उनके सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए समर्पित है। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की आधारशिला 1909 में अमेरिका में हुए सोशलिस्ट पार्टी ऑफ अमेरिका द्वारा महिलाओं के अधिकारों के लिए एक आयोजित एक प्रदर्शन से हुई। इसके पश्चात 1910 में कोपेनहेगन में आयोजित समाजवादी अंतर्राष्ट्रीय महिला सम्मेलन में इसे एक वैश्विक आंदोलन के रूप में मान्यता दी गई। 1977 में संयुक्त राष्ट्र ने इसे आधिकारिक रूप में अपनाया और इसे महिला अधिकारों और वैश्विक शांति के लिए समर्पित किया। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा महिलाओं के अधिकारों में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, समान वेतन, निर्णय लेने की स्वतंत्रता और सुरक्षा जैसे कई महत्वपूर्ण पहलू शामिल हैं।

संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्य (SDG-5) महिलाओं की समानता और सशक्तिकरण को एक प्रमुख लक्ष्य मानता है। विश्व बैंक (2021) के अनुसार, जिन देशों में महिलाओं की शिक्षा और रोजगार को प्रोत्साहित किया गया है, वहां आर्थिक विकास दर अधिक रही है। McKinsey Global Institute (2015) की रिपोर्ट के अनुसार, यदि महिलाओं को समान अवसर मिलें, तो वैश्विक जीडीपी में 28 ट्रिलियन डॉलर तक की वृद्धि हो सकती है। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि महिलाओ को लेकर समाज में अभी भी काफी जागरूकता की आवश्यकता है। ऐतिहासिक रूप से देखे तो प्राचीन और पाश्चात्य दोनों सभ्यताओं में महिलाओं के प्रति भिन्न भिन्न दृष्टिकोण दिखाई पड़ते हैं। प्राचीन यूनान और रोम साम्राज्य में महिलाओं कि दशा काफी अच्छी नहीं थी। प्राचीन यूनानी दार्शनिक अरस्तू (Aristotle) ने महिलाओं को “अधूरी पुरुष” (Imperfect Men) कहा और माना कि उनमें आत्मा का बौद्धिक और नैतिक पक्ष पुरुषों की तुलना में कमजोर होता है (Aristotle, Politics, Book I, 1254b)। प्लेटो ने अपनी पुस्तक Republic में कुछ हद तक महिलाओं के अधिकारों की बात की, लेकिन उनका भी झुकाव पुरुष प्रधान समाज की ओर था।

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मध्ययुगीन यूरोप में ईसाई धर्म के प्रभाव के कारण महिलाओं की आत्मा और उनके सामाजिक अधिकारों पर गंभीर बहस हुई। एक प्रसिद्ध किंवदंती के अनुसार, 584 ईस्वी में फ्रांस के Council of Mâcon में यह सवाल उठाया गया कि “क्या महिलाओं की आत्मा होती है?” हालाँकि, इस दावे के ऐतिहासिक प्रमाण उतने पुष्ट नहीं हैं और कुछ विद्वान इसे मिथक भी बताते हैं (Joan Morris, The Lady was a Bishop, 1973)। ईसाई धर्मशास्त्रियों जैसे कि टॉमस एक्विनास (Thomas Aquinas) ने महिलाओं को “पुरुषों से अधीन” माना और कहा कि वे “सहायक मात्र” हैं, जो पुरुषों की सेवा के लिए बनी हैं (Summa Theologica, Part I, Q. 92, Article 1) । सेंट ऑगस्टिन (Saint Augustine) ने भी महिलाओं को आध्यात्मिक रूप से कमजोर माना और कहा कि वे पुरुषों के मार्गदर्शन में ही मोक्ष प्राप्त कर सकती हैं (De Genesi ad Litteram, IX, 5-9)।

पुनर्जागरण काल (Renaissance) और प्रबोधन (Enlightenment) के समय महिलाओं के अधिकारों पर चर्चा शुरू हुई, लेकिन मुख्यधारा के विचारकों ने अभी भी महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कमतर माना। जॉन लॉक (John Locke) ने Two Treatises of Government (1689) में महिलाओं के अधिकारों पर चर्चा तो की, लेकिन उन्होंने भी उन्हें स्वतंत्र नागरिक नहीं माना। जीन–जैक्स रूसो (Jean-Jacques Rousseau) ने Émile, or On Education (1762) में महिलाओं की शिक्षा को केवल गृहस्थ जीवन तक सीमित करने की वकालत की। पाश्चात्य सभ्यता में महिलाओं को कमतर आँकने के विचार को एक सिद्धान्त ने और पुष्ट किया कि उनमें आत्मा नहीं पायी जाती है।

ईसाई धर्म के सबसे प्राचीन ग्रंथ बाइबिल में स्पष्ट रूप से यह नहीं कहा गया है कि महिलाओं में आत्मा नहीं होती लेकिन कुछ मध्ययुगीन ईसाई विचारकों ने इसकी व्याख्या इस प्रकार की कि महिलाओं को पुरुषों से निम्न माना गया। बाइबिल के अनुसार, स्त्री की उत्पत्ति पुरुष (आदम) की पसली से हुई (उत्पत्ति 2:22)। इसे कुछ ईसाई विचारकों ने यह कहने के लिए प्रयोग किया कि महिला पुरुष की सहायक मात्र है, न कि आत्मा के समान अधिकार वाली स्वतंत्र इकाई। मध्ययुगीन ईसाई धर्मशास्त्री टर्टुलियन ने स्त्रियों को “शैतान का द्वार” (Devil’s Gateway) कहा और माना कि उनके माध्यम से पाप (सर्प के बहकावे में आकर ईव का फल खाना) दुनिया में आया। इससे स्त्रियों को आत्मिक रूप से कमजोर और अधूरा माना गया।

हालाँकि, 19वीं और 20वीं शताब्दी में नारीवादी आंदोलनों, सफ्रेजेट मूवमेंट और सामाजिक सुधारों के कारण यह धारणा बदली और महिलाओं ने अपने अधिकारों और स्थितियों के लिए सीधे लड़ना आवश्यक समझा। सफ्रेजेट मूवमेंट 19वीं और 20वीं शताब्दी में महिलाओं के मतदान अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए ब्रिटेन, अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों में चलाया गया एक प्रभावशाली आंदोलन था। यह आंदोलन दो भागों में बंटा था— सफ्रजिस्ट, जो शांतिपूर्ण तरीके से अपने अधिकारों की मांग कर रहे थे, और सफ्रेजेट, जिन्होंने उग्र और आक्रामक रणनीतियाँ अपनाईं। ब्रिटेन में एममलाइन पंखर्स्ट और उनकी बेटियों क्रिस्टाबेल एवं सिल्विया पंखर्स्ट ने महिला सामाजिक और राजनीतिक संघ (WSPU) की स्थापना की, जिसने भूख हड़ताल, सरकारी इमारतों पर हमले और अन्य उग्र प्रदर्शन किए।

1913 में सफ्रेजेट एमिली डेविसन ने इंग्लैंड के राजा जॉर्ज पंचम के घोड़े के सामने कूदकर आंदोलन के प्रति अपने समर्पण का परिचय दिया। अंततः, ब्रिटेन में 1918 में 30 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं को और 1928 में 21 वर्ष से अधिक उम्र की सभी महिलाओं को मतदान का अधिकार मिला। इसी तरह, अमेरिका में 1848 के सेनेका फॉल्स सम्मेलन से शुरू हुए आंदोलन ने 1920 में 19वें संविधान संशोधन के माध्यम से महिलाओं को मताधिकार दिलाया। इस आंदोलन ने महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को सशक्त किया और 20वीं तथा 21वीं सदी में महिला अधिकारों से जुड़े अन्य आंदोलनों की नींव रखी। सफ्रेजेट मूवमेंट केवल मतदान का अधिकार प्राप्त करने की लड़ाई नहीं थी, बल्कि यह लैंगिक समानता और महिलाओं के सामाजिक व राजनीतिक अधिकारों को सुनिश्चित करने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम साबित हुआ।

भारतीय सभ्यता और संस्कृति में महिलाओं को लेकर दृष्टिकोण पाश्चात्य सभ्यता से उलट दिखाई पड़ता है। वैदिक सभ्यता में महिलाओं की स्थिति पुरुषों के समान थी। ऋग्वैदिक काल में महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त थे। वे शिक्षा, राजनीति, दर्शन और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेती थीं। महिलाओं को वेद अध्ययन और उपनिषदों की चर्चा करने का अधिकार था। उदाहरणस्वरूप, गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषियाँ ब्रह्मज्ञान पर चर्चा करती थीं (बृहदारण्यक उपनिषद 2.4, 3.6)। अपाला ऋग्वेद की एक प्रसिद्ध ऋषिका थीं, जिन्होंने वेदों में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वे उन कुछ स्त्रियों में से एक थीं, जिन्हें वैदिक ऋषि के रूप में मान्यता प्राप्त है। ऋग्वेद के आठवें मंडल में उनके द्वारा रचित एक सूक्त (अपाला सूक्त) संकलित है।

विवाह में “स्वयंवर” की प्रथा थी, जिसमें महिलाएँ अपने वर का चुनाव स्वयं कर सकती थीं (रामायण, महाभारत)। अथर्ववेद (14.1.6) में कहा गया है कि पत्नी को घर की स्वामिनी माना जाता था, न कि केवल सेविका। ऋग्वेद (10.85.46) में कहा गया है कि स्त्री को समाज में समान दर्जा दिया जाना चाहिए। मनुस्मृति (3.56) में उल्लेख है कि “यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवताः“, अर्थात जहाँ महिलाओं का सम्मान होता है, वहाँ देवता निवास करते हैं। पतिव्रता, गृहलक्ष्मी और माता के रूप में महिलाओं की भूमिका को सम्मानित किया गया।

उत्तरवैदिक और मध्यकाल में महिलाओं की स्थिति गिरावट होनी प्रारम्भ हो गयी। उत्तरवैदिक काल और गुप्तकाल (300-600 ई.) के दौरान महिलाओं की स्थिति कुछ कमजोर होने लगी। विदेशी मुस्लिम आक्रमणों (8 वीं शताब्दी) के बाद भारतीय समाज में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता उत्पन्न हुई, जिसके परिणामस्वरूप पर्दा प्रथा का प्रचलन बढ़ गया। आक्रमणकारियों से बचाने के लिए महिलाओं को घर तक सीमित कर दिया गया, जिससे उनकी सामाजिक सहभागिता में गिरावट आई। बाल विवाह और सती होने की भी काफी घटनाएँ महिलाओं की स्थिति को प्रदर्शित करती रही। इसके अतिरिक्त, महिलाओं की शिक्षा और अधिकारों में भी भारी गिरावट आई। शिक्षा के अवसरों से वंचित किए जाने के कारण धार्मिक और सामाजिक मामलों में उनकी भागीदारी सीमित हो गई, और धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या पुरुषों के अधीन आ गई, जिससे महिलाओं के अधिकार और भी सीमित हो गए। यही वह काल खंड था जब स्मृति ग्रंथो का प्रसार हुआ।

स्मृति ग्रंथ उस तत्कालीन समाज में आचार व्यवस्था का एक मानक प्रस्तुत करते रहे। जहां मनुस्मृति में स्त्री को पूज्य माना गया तो वहीं उनकी सुरक्षा के लिए किसी न किसी पुरुष के अधीन रखा गया। उल्लेखनीय है कि यह महिलाओं की स्थिति को गिराती नहीं बल्कि तत्कालीन समय में उनकी सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करती थी। आज यह अलग विमर्श है कि क्या महिला को पुरुष के अधीन रहना चाहिए या नहीं। वस्तुत: भारतीय परंपरा में स्त्री और पुरुष दोनों ही एक दूसरे के अधीन और नियंत्रण में रहे हैं। यज्ञवाल्क्य और मैत्रेयी संवाद में जब यज्ञावाल्क्य वानप्रस्थ के लिए जाते हैं तो वह मैत्रेयी से आज्ञा लेते हैं। भारतीय परंपरा में वानप्रस्थ के लिए जाते हुये पुरुष को पत्नी से आज्ञा लेना आवश्यक था। बाद में यही आपसी संवाद वृद्धारण्यक उपनिषद के रूप में सामने आता है। 

मनुस्मृति (5.148) के अनुसार,

“पिता रक्षति कौमारे, पति रक्षति युवतिभावे,
पुत्रः रक्षति वार्धक्ये, न स्त्री स्वातंत्र्यमर्हति।“

यह आज के समय में स्त्री पर पुरुष के नियंत्रण के रूप में दिख सकता है पर यहाँ पर पुरुष को यह ज़िम्मेदारी दी जा रही है कि वह अपने पत्नी, माता, और बहन कि सदैव रक्षा करे। भारतीय परमपरा में रक्षाबंधन का पर्व भाई बहन का अत्यंत ही सम्मानजनक पर्व है जहां रक्षासूत्र के बदले भाई अपने बहन कि रक्षा का व्रत लेता है। मध्यकाल में पुन: भक्ति आन्दोलनों से महिलाओं कि स्थिति में सुधार होना प्रारम्भ हुआ। भक्ति आंदोलन (13वीं-17वीं शताब्दी) के दौरान मीरा बाई, अक्का महादेवी, संत जनाबाई जैसी महिलाओं ने समाज में आध्यात्मिक जागरूकता फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस काल में महिलाओं को धार्मिक स्वतंत्रता तो मिली, लेकिन सामाजिक स्तर पर उनकी स्थिति में विशेष सुधार नहीं हुआ। 19वीं शताब्दी में महिला सुधार आंदोलनों ने महिलाओं के अधिकारों के प्रति नई चेतना जगाई। राजा राममोहन राय के प्रयासों से 1829 में लॉर्ड विलियम बेंटिक ने सती प्रथा को अवैध घोषित किया।

ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने विधवा पुनर्विवाह को बढ़ावा दिया, जिसके परिणामस्वरूप 1856 में विधवा पुनर्विवाह अधिनियम लागू हुआ। इसी दौरान, ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले ने 1848 में महिला शिक्षा के लिए पहला स्कूल खोला। 20वीं शताब्दी में महिलाओं के अधिकारों को लेकर और अधिक सुधार हुए। महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की भागीदारी को प्रेरित किया, जिससे वे सामाजिक आंदोलनों का सक्रिय हिस्सा बनीं। 1950 में भारतीय संविधान ने महिलाओं को समानता (अनुच्छेद 14), समान वेतन (अनुच्छेद 39), और शिक्षा का अधिकार (अनुच्छेद 21A) प्रदान किया। हिंदू विवाह अधिनियम (1955) के तहत बहुविवाह पर प्रतिबंध लगाया गया। समकालीन भारत में कानूनी सुधारों के तहत दहेज निषेध अधिनियम (1961), मातृत्व लाभ अधिनियम (1961), और घरेलू हिंसा अधिनियम (2005) लागू किए गए। महिलाओं की उपलब्धियों में इंदिरा गांधी के भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री बनने (1966-1977, 1980-1984), कल्पना चावला और सुनीता विलियम्स के अंतरिक्ष मिशनों में योगदान, और पीवी सिंधु, मैरी कॉम, साइना नेहवाल जैसी खिलाड़ियों की अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियाँ शामिल हैं, जिन्होंने वैश्विक स्तर पर भारत का गौरव बढ़ाया।

आज भारत के सर्वोच्च पद पर आदिवासी समाज की महिला को आसीन कर भारत ने अपने पुराने सांस्कृतिक गौरव को पुनर्स्थापित करने की दिशा में अग्रसर है जहां सभी में एक ही ब्रह्म का दर्शन होता है। आवश्यकता है कि हर प्रकार के भेद भाव को त्यागकर सबके लिए समान अवसर उपलब्ध हो जिससे समाज का सर्वांगीण उत्थान हो सके। यही समाज के संपोष्यता कि आधारशिला होगी।

इस लेख को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर पुन: प्रकाशित किया गया है।

स्रोत: अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस, वेद, पुनर्जागरण काल, यूरोप, मनुस्मृति, International Womens Day, Vedas, Renaissance, Europe, Manusmriti,
Tags: EuropeInternational Women's DayManusmritiRenaissanceVedasअंतर्राष्ट्रीय महिला दिवसपुनर्जागरण कालमनुस्मृतियूरोपवेद
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