कांग्रेस के दौर में पाठ्यक्रम में जोड़े गए सभी ‘स्वतंत्रता सेनानियों’ की समीक्षा करेगी मोदी सरकार

अब केवल असली नायकों की जय होगी!

स्वतंत्रता के बाद, देश में कांग्रेस की सरकार ने इतिहास के साथ छेड़छाड़ करने की कोशिश की थी, जिसका परिणाम यह हुआ कि भारत की आजादी के लिए लड़ने वाले कई स्वतंत्रता सेनानियों को या तो विश्वविद्यालय एवं स्कूली शिक्षा से धूमिल कर दिया गया या फिर उनकी जीवनी को गलत तरह से प्रस्तुत करने की कोशिश की गई। वहीं, कांग्रेस शासन में भारतीय वैदिक इतिहास को दबाने की कोशिश भी की गई। इस सन्दर्भ में, शिक्षा पर एक संसदीय समिति ने स्कूली इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों को चित्रित करने के तरीके की समीक्षा करने का आह्वान किया है।

संसदीय समिति ने सिफारिश की है कि “वेदों के “प्राचीन ज्ञान” और कांग्रेस द्वारा भुला दिए गए राष्ट्र नायकों को भी स्कूल पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। छात्रों के लिए शैक्षिक सामग्री “पक्षपात से मुक्त” होनी चाहिए।” भाजपा सांसद विनय प्रभाकर सहस्रबुद्धे की अध्यक्षता वाली शिक्षा, महिलाओं, बच्चों, युवाओं और खेल पर स्थायी समिति की रिपोर्ट में भी पाठ्यक्रम में सिख और मराठा इतिहास से जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। समिति ने पुस्तकों को लिंग-समावेशी बनाने का भी आह्वान किया है।

अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों के लिए समिति का गठन

ऐसे में, प्रमुख इतिहासकारों के साथ चर्चा और समीक्षा करने की आवश्यकता है कि किन आधारों पर भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों, देश के विभिन्न क्षेत्रों / हिस्सों से आनेवाले राष्ट्रनायकों और उनके योगदान को इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में स्थान मिलता है? इससे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की अधिक संतुलित और विवेकपूर्ण धारणा बनेगी। यह स्वतंत्रता आंदोलन में अब तक अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों को उचित स्थान देने में एक लंबा रास्ता तय करेगा।

सिख और मराठा इतिहास को उनके सामुदायिक पहचान के रूप में ऐतिहासिक  प्रतिनिधित्व की समीक्षा और पाठ्यपुस्तकों में उनके पर्याप्त समावेश से उनके योगदान को अधिक विवेकपूर्ण परिप्रेक्ष्य में मदद मिलेगी। इस सन्दर्भ में, रिपोर्ट मंगलवार को राज्यसभा में पेश की गई। संसद समिति की रिपोर्ट कई मायने में महत्वपूर्ण हैं। बता दें कि सिर्फ दो महीने पहले केंद्र ने NCERT पाठ्यक्रम में बदलाव हेतु व्यापक दिशा-निर्देश तैयार करने के लिए एक संचालन समिति का गठन किया था।

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समिति गैर-ऐतिहासिक तथ्यों पर करेगी जांच

इस समिति में 10 राज्यसभा सदस्य हैं, जिनमें भाजपा के चार और TMC की सुष्मिता देव, CPM के बिकास रंजन भट्टाचार्य, DMK के आरएस भारती, AIDMK के एम थंबीदुरई, सपा के विशंभर प्रसाद निषाद शामिल हैं। वहीं, समिति में कांग्रेस नेता अखिलेश प्रसाद सिंह भी शामिल  हैं। समिति में 21 लोकसभा सदस्यों में 12 भाजपा से, दो कांग्रेस से और एक-एक TMC, CPM, JD (U), शिवसेना, YSRCP, DMK और बीजद से हैं।

समिति ने पाठ्यपुस्तकों से भारत के राष्ट्रीय नायकों के बारे में “गैर-ऐतिहासिक तथ्यों और विकृतियों” के संदर्भों को हटाने, भारतीय इतिहास की सभी अवधियों के आनुपातिक संदर्भों को सुनिश्चित करने पर ध्यान देने के साथ स्कूली पाठ्यपुस्तकों की सामग्री और डिजाइन में सुधार पर काम करना शुरू कर दिया है और प्राप्तकर्ताओं की भूमिका पर प्रकाश भी डाली है।

रिपोर्ट में एक और सिफारिश की गई है, जिसमें कहा गया है कि- “यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि किताबें पूर्वाग्रह से मुक्त हों। पाठ्यपुस्तकों को संविधान में निहित मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता पैदा करनी चाहिए और राष्ट्रीय एकता को और बढ़ावा देना चाहिए। ”

जनवरी के बाद से, केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय, CBSE, NCERT और महाराष्ट्र SCERT के अलावा, सात संगठनों ने समिति के सामने अपना पक्ष रखा है, जिसमें तीन RSS-संबद्ध-भारतीय शिक्षण मंडल, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास और विद्या भारती शामिल हैं। इसके अलावा, प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन के प्रतिनिधि और जेएस राजपूत, (जो 1999 और 2004 के बीच NCERT के निदेशक थे) और अन्य गणमान्य लोगों ने भी पैनल के सामने अपना पक्ष रखा।

भारतीय इतिहास कांग्रेस का विरोध

गौरतलब है कि समिति की सिफारिशों का कड़ा विरोध करते हुए, भारतीय इतिहास कांग्रेस (IHC) ने एक बयान दिया है, जिसमें IHC ने कहा कि “एक समीक्षा प्रक्रिया हमेशा आवश्यक होती है। अतः इसमें पूरे देश के मान्यता प्राप्त विद्वानों को शामिल करके और पर्याप्त ध्यान के साथ किया जाना चाहिए। विभिन्न ऐतिहासिक अवधियों की शोध-आधारित समझ से प्राप्त शैक्षणिक सामग्री के आधार पर इसका पाठ्यपुस्तकों में समावेशन हों।”

समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि “NCERT और राज्य SCERT को स्कूल के पाठ्यक्रम में वेदों और अन्य महान भारतीय ग्रंथों / पुस्तकों में वर्णित प्राचीन ज्ञान और शिक्षाओं को भी शामिल किया जाना चाहिए। इसके अलावा, नालंदा, विक्रमशिला और तक्षशिला जैसे प्राचीन विश्वविद्यालयों में अपनाई गई शैक्षिक पद्धति का अध्ययन किया जाना चाहिए और शिक्षकों के लिए शिक्षण पद्धति को संशोधित किया जाना चाहिए।”

बताते चलें कि सितंबर में, शिक्षा मंत्रालय ने NCERT पाठ्यक्रम में बदलाव हेतु व्यापक दिशानिर्देश निर्धारित करने के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या ढांचे (NCF) में पूर्व इसरो प्रमुख के. कस्तूरीरंगन के लिए एक 12 सदस्यीय राष्ट्रीय संचालन समिति का गठन किया है। NCERT ने समिति को सूचित करते हुए कहा कि “हमारे राष्ट्रीय नायकों के बारे में गैर-ऐतिहासिक तथ्यों और विकृतियों के साथ-साथ विभिन्न हितधारकों द्वारा उठाए गए घटनाओं के संबंध में कुछ मुद्दों का तुरंत विश्लेषण और समाधान करने के लिए एक पैनल गठित करने की प्रक्रिया में है।”

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स्वतंत्रता सेनानियों को मिले उनका उचित स्थान

वहीं, समिति की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि “भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के कई ऐतिहासिक आंकड़े और कई स्वतंत्रता सेनानियों को अपराधियों के रूप में गलत तरीके से चित्रित किया गया है। इसके साथ-साथ कई ऐसे भी लोग हैं, जिन्हें स्वतंत्रता सेनानी के रूप में चित्रित कर दिया गया है, उदाहरण के तौर पर मोपला दंगे का आरोपी। NCERT को इतिहास की पाठ्यपुस्तकों के लेखन के लिए दिशानिर्देशों पर फिर से विचार करना चाहिए ताकि इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में विभिन्न युगों, अवधियों और घटनाओं को समान महत्व दिया जा सके।”

रिपोर्ट में कहा गया- “इसी तरह, यह देखा गया कि स्कूली पाठ्यपुस्तकें विक्रमादित्य, चोल, चालुक्य, विजयनगर, गोंडवाना या उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के त्रावणकोर और अहोम जैसे कुछ महान भारतीय साम्राज्यों को पर्याप्त कवरेज नहीं देती हैं, जिनका योगदान उत्तर-पूर्वी क्षेत्र तक है। विश्व मंच पर भारत की स्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

इससे एक बात स्पष्ट होती है कि राष्ट्र तभी प्रगति कर सकता है, जब वो सही नायक चुने। अगर हम सही नायक चुनेंगे तो हमें सही प्रेरणा मिलेगी। अब समय आ गया है जब मराठा, मेवाड़, अहोम, चोल, चालुक्य, सावरकर और संभाजी जैसे लोगों को इतिहास में उनका उचित स्थान मिले। यह पुनीत कार्य करने के लिए मोदी सरकार प्रशंसा की पात्र है।

 

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