OPEC ऑयल गैंग को लगा बड़ा झटका, भारत में 15 साल के निचले स्तर पर पहुंचा OPEC से तेल का आयात

इनके वर्चस्व को तोड़ने की ओर बढ़ चला है भारत!

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तेल सोना है या शायद सोने से भी बड़ा है। तेल किसी भी देश के अर्थव्यवस्था इंजन को गतिशील रखता है। अगर ऊर्जा का यह प्रवाह रुक गया तो पूरा देश क्या पूरा विश्व रुक जाएगा। इतिहास ने तेल के लिए खूब बहाये है। ज़रा सोचिए क्या हो अगर कुछ देश इसके वैश्विक आपूर्ति शृंखला पर नियंत्रण कर एकाधिकार स्थापित कर लें? स्वाभाविक रूप से तब आपके राष्ट्र के निजी हित प्रभावित होंगे। भारत के साथ भी ऐसा ही हो रहा है। OPEC (ओपेक) देशों द्वारा मनमाने तरीके से तेल कीमतों में वृद्धि ने भारतीय अर्थव्यवस्था को संकट में डाल दिया है। इस कारण विदेशी मुद्रा भंडार तो कम हो ही रहा है साथ साथ तेल की कीमतों में वृद्धि से महंगाई भी बढ़ रही है। परंतु, भारत ने अब इनके वर्चस्व को तोड़ने का निर्णय ले लिया है। भारत गैर-ओपेक देशों के संपर्क में है और वहां से तेल आयात कर है।

ध्यान देने वाली बात है कि गैर-ओपेक देश दुनिया के कुल तेल उत्पादन का लगभग 60% उत्पादन करते हैं। भारत OPEC देशों पर से अपनी निर्भरता को लगातार कम कर रहा है। हालिया आंकड़े भी इसी ओर इशारा करते दिख रहे हैं। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि भारतीय तेल आयात में तेल उत्पादक देशों के समूह OPEC (ओपेक) की हिस्सेदारी 2021 में गिरकर एक दशक से भी अधिक समय में सबसे कम हो गई है। साथ ही, भारत में ओपेक से तेल आयात घटकर 15 साल के निचले स्तर पर पहुंच गया है, जिसका सीधा कारण भारत का अन्य देशों से बढ़ रहा आयात को माना गया है।

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गैर-ओपेक देशों से बढ़ा तेल का आयात

दरअसल, OPEC देशों की मनमर्जी के कारण पूरी दुनिया में तेल और गैसों के दाम में भारी वृद्धि देखी जा रही है। ओपेक देश अभी वैश्विक बाजार में धीरे-धीरे आपूर्ति बढ़ा रहे हैं जिससे तेलों की किल्लत लगातार बनी हुई है। भारत के लिए महंगा कच्चा तेल परेशानी का सबब है। कच्चा तेल महंगा होने से देश में पेट्रोल-डीजल समेत गैस के दाम में वृद्धि होती है। इससे मालभाड़ा बढ़ता है जिसके असर से खाने-पीने से लेकर रोजमर्रा के इस्तेमाल की वस्तुएं महंगी हो जाती हैं। इसके अलावा कच्चे तेल के आयात पर भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च होती है। ओपेक देशों की मनमानी पर लगाम लगाने हेतु भारत सरकार ने गैर-ओपेक देशों के साथ समझौता किया है, जिसका नतीजा हुआ है कि ओपेक से आयात का आंकड़ा 2008 के 87 फीसदी से घटकर पिछले साल 70 फीसदी पर आ गया है, जो दिन-प्रतिदिन और कम ही होता जाएगा।

भारत ने गैर-ओपेक देश अफ्रीका, कनाडा और अमेरिका से तेल के आयात को बढ़ाया है। अमेरिकी प्रतिबंधों ने भारत के लिए वेनेजुएला और ईरान से कच्चे तेल का आयात करना मुश्किल बना दिया है, इससे भारतीय खरीदारों ने आपूर्ति के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, गुयाना और अफ्रीका के कुछ छोटे उत्पादकों की ओर रुख किया है। आंकड़ो की मानें तो भारत ने अमेरिका और कनाडा से तेल के आयात को बढ़ाया है। इन दोनों देशों से तेल के आयात में बढ़ोत्तरी देखी गई है। अमेरिका और कनाडा के तेल का भारत के आयात में क्रमशः 7.3% और 2.7% का रिकॉर्ड रहा, जबकि एक साल पहले यह 5.5% और 0.7% था।

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ओपेक देशों से छूट चाहता था भारत

गौरतलब है कि ओपेक के मनमानी के कारण तमाम देशों में तेल की कीमतों में काफी उछाल देखा गया। भारत की स्थिति भी कुछ वैसी ही है।भारत पूरे विश्व में तीसरा सर्वाधिक तेल उपभोक्ता सूची में शामिल है। भारत में कच्चे तेल की मांग 2015-16 में 203 मीट्रिक टन से बढ़कर 2016-17 में 214 मीट्रिक टन हो गई और इस तरह मांग में 1.6 प्रतिशत की वैश्विक औसत वृद्धि की तुलना में 5.5 प्रतिशत की वृद्धि दर दर्ज की गई।

भारत ओपेक का सबसे बड़ा, निरंतर और विश्वासपात्र ग्राहक होने के नाते तेल आयातों पर छूट चाहता था, जबकि ओपेक उत्पादक राष्ट्रों से उसे “Asia Premium” नामक कर मिला। पूर्व पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कई बार इस कर को हटाकर “Asia Dividend” नामक छूट का आग्रह किया, तो ओपेक देशों ने इस आग्रह को ठेंगा दिखा दिया था। अब ओपेक देशों से आयात में कमी सरकार के प्रयासों को भी इंगित करती है।

आंकड़ों से पता चलता है कि 2021 में भारत का कच्चे तेल का आयात 3.9% बढ़कर 42 लाख बैरल प्रति दिन (बीपीडी) हो गया, लेकिन 2019 में यह पूर्व-महामारी के स्तर से नीचे रहा। इस साल आयात में और वृद्धि होने की उम्मीद है क्योंकि ईंधन की मांग में सुधार हो रहा है। दिसंबर में, आयात बढ़कर 11 महीने के उच्च स्तर 47 लाख बीपीडी पर पहुंच गया, जो नवंबर की तुलना में लगभग पांच फीसदी अधिक है, लेकिन फिर भी एक साल पहले की तुलना में 7.8% कम है।

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क्या है ओपेक ?

पेट्रोलियम निर्यातक देशों का संगठन अर्थात् ओपेक एक स्थायी अंतर-सरकारी संगठन (आईजीओ ) है, जिसे वर्ष 1960 में बगदाद सम्मेलन में ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजुएला द्वारा बनाया गया था। इसका उद्देश्य विश्व बाजार में तेल की कीमत निर्धारित करने और तेल की आपूर्ति का प्रबंधन करना है, ताकि तेल की कीमतों के उतार-चढ़ाव से बचा जा सके, जो उत्पादक और क्रेता दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित कर सकते हैं। वर्ष 2019 तक ओपेक के कुल 14 सदस्य देश हैं। ईरान, इराक, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, अल्जीरिया, लीबिया, नाइजीरिया, गैबॉन, Equatorial Guinea, कांगो गणराज्य, Angola, इक्वाडोर और वेनेजुएला ओपेक के सदस्य हैं। वहीं कुछ देश ऐसे भी है तेल उत्पादक देश तो है, परंतु ओपेक समूह का हिसा नहीं है और अब भारत समेत दुनिया के कई देश उन्हीं देशों पर नजर गड़ाए हुए हैं।

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