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गांधी के परपोते का पलटवार: RSS कभी दोषी नहीं था, जैसे आज चुनाव आयोग नहीं है

महात्मा गांधी के परपोते श्रीकृष्ण कुलकर्णी ने राहुल गांधी को जारी किया एक तीखा और खुला पत्र।

Vibhuti Ranjan द्वारा Vibhuti Ranjan
23 August 2025
in इतिहास, चर्चित, ज्ञान, भारत, मत, राजनीति, समीक्षा
गांधी के परपोते का पलटवार: RSS कभी दोषी नहीं था, जैसे आज चुनाव आयोग नहीं है

श्रीकृष्ण कुलकर्णी के पत्र से राहुल गांधी को लेनी चाहिए सीख।

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महात्मा गांधी के परपोते श्रीकृष्ण कुलकर्णी ने बुधवार को राहुल गांधी को एक तीखा और खुला पत्र जारी किया। यह पत्र न केवल निजी टिप्पणी थी, बल्कि राहुल गांधी की निरंतर राजनीतिक लापरवाही और अपनी असफलताओं के लिए संस्थानों को दोष देने की उनकी आदत पर एक तीखी टिप्पणी थी।

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कुलकर्णी के प्रहार से हिली कांग्रेस

कुलकर्णी ने एक तीखे प्रहार में कांग्रेसी हलकों को हिलाकर रख दिया: “2014 में जब आपने आरएसएस पर आरोप लगाया था, तब आप गलत थे और अब जब आप चुनाव आयोग पर वोट चोरी का आरोप लगा रहे हैं, तब भी आप गलत हैं।”

यह कथन विशेष ध्यान देने योग्य है। यह किसी स्वयंसेवक या राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी की नहीं, बल्कि महात्मा गांधी के वंश की आवाज़ है। फिर भी, यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और लाखों राष्ट्रवादियों की उस बात को सही साबित करता है, जो वे लंबे समय से मानते आए हैं कि आरएसएस और अब चुनाव आयोग की निंदा करना कांग्रेस की ऐतिहासिक विफलताओं को छिपाने का एक हताश प्रयास है, राजनीतिक दुष्प्रचार मात्र है।

कांग्रेस की राजनीति में आरएसएस का हौवा

2014 में राहुल गांधी ने महात्मा गांधी की हत्या में आरएसएस को घसीटने की कोशिश की थी। यह न केवल एक ऐतिहासिक विकृति थी, बल्कि नैतिक रूप से अक्षम्य बदनामी भी थी। अदालतें लंबे समय से संघ को ऐसी किसी भी संलिप्तता से मुक्त कर चुकी हैं और इतिहासकारों ने इस झूठ का पूरी तरह से पर्दाफाश कर दिया है। लेकिन, योग्यता के आधार पर वैचारिक लड़ाई लड़ने में असमर्थ, कांग्रेस ने बार-बार आरएसएस को अपना चिरकालिक हौवा बताया है। इसलिए, कुलकर्णी का यह कथन महत्वपूर्ण है। जब गांधीजी के परपोते भी सार्वजनिक रूप से घोषणा करते हैं कि बापू की हत्या में आरएसएस की कोई भूमिका नहीं थी, तो कांग्रेस का नैरेटिव ताश के पत्तों की तरह ढह जाता है।

वास्तव में 1925 में स्थापित आरएसएस ने ज़मीनी स्तर पर चुपचाप काम किया है-समाज में चरित्र, अनुशासन और सेवाभाव का निर्माण। इसका दृष्टिकोण हमेशा राष्ट्रीय एकता और हिंदू पुनर्जागरण का रहा है। ऐसे संगठन पर हत्या का आरोप लगाना न केवल ऐतिहासिक रूप से ग़लत था, बल्कि नैतिक रूप से भी घृणित था।

2014 से 2025 तक: हमला करने की राहुल की आदत

सबसे ज़्यादा परेशान करने वाली बात यह है कि राहुल गांधी इतिहास से सबक नहीं ले पा रहे हैं। अगर 2014 में आरएसएस ज़िम्मेदार था, तो 2025 में चुनाव आयोग (ईसी) ज़िम्मेदार होगा। “वोट चोरी” का आरोप लगाकर उन्होंने एक बार फिर भारतीय लोकतंत्र की आधारभूत संस्था को निशाना बनाया है, ठीक उसी तरह जैसे एक दशक पहले उन्होंने आरएसएस पर बेपरवाह हमला किया था।

जैसा कि कुलकर्णी कहते हैं ये निराधार बयान जनता के विश्वास को कम करते हैं, कलह फैलाते हैं और भारत विरोधी ताकतों को बढ़ावा देते हैं। 2014 में आरएसएस और 2025 में चुनाव आयोग के बीच तुलना बहुत कुछ कहती है: यह उस मानसिकता को उजागर करती है जो वंशवादी अधिकार के आगे न झुकने वाली हर संस्था को अवैध ठहराने के लिए प्रशिक्षित है। राहुल गांधी के लिए जब लोग उन्हें अस्वीकार करते हैं तो यह कभी उनकी गलती नहीं होती। इसके लिए हमेशा आरएसएस, ईवीएम, चुनाव आयोग, न्यायपालिका या मीडिया ज़िम्मेदार होता है। दोष-स्थानांतरण के इस तंत्र में सबसे पहले सत्य ही शिकार होता है।

ऐतिहासिक समानताएं: असली “वोट चोरी”

कुलकर्णी का पत्र सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना—1946 के कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव का भी ज़िक्र करता है। 15 प्रदेश कांग्रेस समितियों में से 12 ने सरदार वल्लभभाई पटेल के लिए मतदान किया था। लेकिन महात्मा गांधी के दबाव में जवाहरलाल नेहरू को अध्यक्ष पद पर थोप दिया गया। इस एक फैसले ने इतिहास की दिशा बदल दी। भारत के लौह पुरुष पटेल, जिनके पास भारत को और मज़बूती से एकीकृत करने की दूरदर्शिता थी, को दरकिनार कर दिया गया। इसके बजाय नेहरू की दोषपूर्ण नीतियों ने आज़ादी के बाद के भारत को आकार दिया।

अगर भारत के राजनीतिक इतिहास में कभी “वोट चोरी” का कोई उदाहरण था, तो वह यही क्षण था। यह कितनी बड़ी विडंबना है कि उस वंश का उत्तराधिकारी अब वोट चोरी का रोना रो रहा है। यह सिर्फ़ पाखंड नहीं, ऐतिहासिक विस्मृति है।

आरएसएस: राष्ट्रीय एकता का संरक्षक

राहुल गांधी के झूठे आरोपों को कांग्रेस की वास्तविक ऐतिहासिक विकृतियों के साथ जोड़कर, कुलकर्णी अप्रत्यक्ष रूप से भारत के दो दृष्टिकोणों के बीच के अंतर को उजागर करते हैं: एक तरफ, एक वंशवादी कांग्रेस, जो संस्थाओं को बदनाम करके और षड्यंत्र रचकर अपना अस्तित्व बचाए हुए है। दूसरी तरफ आरएसएस, जिसने लगातार बदनामी के बावजूद सामाजिक एकता, अनुशासन और राष्ट्रवाद को मज़बूत करने के लिए चुपचाप काम किया है।

यहां तक कि महात्मा गांधी ने भी अपने मतभेदों के बावजूद स्वयंसेवकों की देशभक्ति को स्वीकार किया था।1934 में वर्धा में जब आरएसएस को बदनाम करने की कोशिश की गई, तो गांधीजी ने कहा कि मैं आरएसएस शिविर में गया था। मैं उनके अनुशासन, अस्पृश्यता के अभाव और एकता की भावना से बहुत प्रभावित हुआ। ये शब्द आज भी प्रासंगिक हैं। ये हमें याद दिलाते हैं कि आरएसएस को बदनाम करना न केवल राजनीति से प्रेरित है, बल्कि राष्ट्रीय एकता के लिए भी खतरनाक है।

राहुल गांधी के लिए आईना है यह पत्र

श्रीकृष्ण कुलकर्णी का खुला पत्र फटकार से कहीं बढ़कर है। यह राहुल गांधी के सामने एक आईना है। और यह आईना क्या दिखाता है? एक ऐसा राजनेता जिसे विरासत में अधिकार मिले हैं, लेकिन बुद्धि नहीं। एक ऐसा नेता जो अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए 2014 में आरएसएस से लेकर 2025 में चुनाव आयोग तक, हर संस्था को कमज़ोर करता है। एक ऐसा वंशवादी जो जनता द्वारा अस्वीकार किए जाने पर खुद को छोड़कर बाकी सभी को दोषी ठहराता है।

ऐसी राजनीति कांग्रेस को भले ही कुछ समय के लिए चर्चा का विषय बना दे, लेकिन भारत के लिए यह विनाशकारी है। संस्थाएं भरोसे पर टिकी रहती हैं और झूठ का कारोबार करने वाले नेता उस भरोसे को खत्म कर देते हैं। अगर महात्मा गांधी के परपोते ने खुद खड़े होकर कहा है कि “बस, बहुत हो गया”, तो अब समय आ गया है कि राहुल गांधी वही विनाशकारी गलतियां दोहराना बंद करें। आरएसएस चुपचाप और निस्वार्थ भाव से भारत की सेवा करता रहेगा, जैसा कि उसने एक सदी से किया है। वंशवादी इतिहास से सीखें या नहीं, राष्ट्र निर्माण में संघ का काम हर राजनीतिक दुष्प्रचार से ज़्यादा समय तक चलेगा।

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