कांग्रेस का चिंतन शिविर- जब राहुल को ही कांग्रेस अध्यक्ष बनाना है तो चिंतन मनन का सवाल ही नहीं है

ऐसा स्कैम कही और नहीं!

Rahul Gandhi

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‘हारकर जीतने वाले को बाजीगर कहते हैं’ और जो हमेशा हार का स्वाद चखे उसे राहुल गांधी कहते हैं। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के उत्तराधिकारी राहुल गांधी का राजनीतिक जीवन अंधकारमय हो गया है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की प्रचंड लहर के सामने परास्त हो चुकी कांग्रेस आज भी उस हार से उबर नहीं पाई है। लगातार हार के कारण घटते जनाधार ने कांग्रेस को राष्ट्र की राजनीति से विलुप्त होने के कगार पर खड़ा कर दिया है। कांग्रेस की इस हालत की असली जिम्मेदार उनकी कमज़ोर नीति और केंद्रीय नेतृत्व है। देश में मोदी लहर में कांग्रेस ही नहीं बल्कि कांग्रेस के राजकुमार राहुल गांधी की राजनीति भी उड़ गई।

वर्ष 2013 में जब डॉ मनमोहन सिंह की सरकार केंद्र में थी तब से ही एक बात का प्रचार काफी ज्यादा किया गया कि मनमोहन सिंह के बाद राहुल गांधी देश के प्रधानमंत्री बनेंगे, लेकिन कांग्रेस का सपना धरा का धरा ही रह गया। कांग्रेस पार्टी 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद 2019 का लोकसभा चुनाव राहुल गांधी के नेतृत्व में हार गई और तब उन्होंने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से भी इस्तीफा दे दिया था। लेकिन आपको ज्ञात होगा कि उनके इस्तीफा देने के कुछ महीने बाद से ही उन्हें फिर से कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने की बात उठने लगी थी, जो अभी तक उठ ही रही है।

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जब देखो तब- राहुल को अध्यक्ष बनाओ

दरअसल, राजस्थान के उदयपुर में 13 मई से कांग्रेस का तीन दिवसीय ‘चिंतन शिविर’ शुरू होने वाला है, जिसमें पार्टी की किस्मत के पुनरुद्धार के लिए एक रोडमैप पर विचार-मंथन किया जाएगा और इसमें राहुल गांधी को फिर से कांग्रेस का राष्ट्रीय चेहरा यानी पार्टी अध्यक्ष बनाने को लेकर मांग उठाई जा सकती है। खबरों के अनुसार संगठन के कुछ लोगों  द्वारा यह मांग उठाने की संभावना है। मीडिया में यह खबर काफी चर्चा में है और वामपंथी मीडिया पोर्टलों की ओर से भी यह बात जोर-शोर से उठाई जा रही है।

ध्यान देने वाली बात है कि हाल ही में हुए CWC की बैठक में भी औपचारिक रूप से राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने की मांग उठाई गई थी। अध्यक्ष के रूप में उनकी वापसी के लिए कांग्रेस के वफादार या यूं कहें कि राहुल गांधी के वफादार कांग्रेस शासित राज्यों के दो मुख्यमंत्री अशोक गहलोत (राजस्थान) और भूपेश बघेल (छत्तीसगढ़) के अलावा रणदीप सुरजेवाला, केसी वेणुगोपाल आदि अक्सर आवाज उठाते रहे हैं।

हालांकि, चिंतन शिविर में राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने वाली बात उठने की संभावना मात्र से ही ‘कांग्रेस के चिंतन-शिविर’ का छलावा भी उजागर हो गया है। इस चिंतन शिविर का मकसद कांग्रेस को उभरना नहीं, बल्कि राहुल गांधी को फिर से कांग्रेस पर थोपना है और राजस्थान में यह चिंतन शिविर होना यह भी दर्शाता है कि गहलोत आने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर राहुल गांधी को मनाने में लगे हैं। क्योंकि अब गहलोत को एहसास हो गया है कि उनका मुकाबला आने वाले चुनाव में भाजपा से ही नहीं, बल्कि सचिन पायलट से भी होने वाला है और इसलिए अध्यक्ष पद के लिए राहुल गांधी के नाम को उछालकर वो अपनी दावेदारी मजबूत करना चाहते हैं।

राहुल गांधी एक कंफ्यूज्ड नेता हैं!

आपको ज्ञात होगा कि थ्री इडियट्स फिल्म के एक गाने के बोल हैं कि confusion ही confusion है सॉलूशन का कुछ पता नहीं। यह बोल राहुल गांधी के लिए सटीक बैठता है और ऐसा इसलिए क्योंकि राहुल गांधी भी राजनीति के क्षेत्र में एक कन्फ्यूज्ड नेता हैं, उनको पता ही नहीं कि कब और क्या बोलना है। राजनीतिक पंडित तो राहुल गांधी को भाजपा का राष्ट्रीय प्रचारक तक कह चुके हैं वो इसलिए क्योंकि राहुल बाबा कुछ न कुछ ऐसा तर्कहीन बयान दे देते हैं जिससे दूसरी पार्टियों को चुनाव में लाभ मिल जाता है। ध्यान देने वाली बात है कि राहुल गांधी ने 16 दिसंबर, 2017 से 3 जुलाई, 2019 तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। उन्होंने 2019 के लोकसभा चुनावों में पार्टी की करारी हार के बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उनके नेतृत्व में यूपीए गठबंधन मात्र 91 सीटों पर सिमट गई थी।

राहुल गांधी के अटपटे बयानों ने तो कोहराम ही मचा दिया था, जिसका अन्य राजनीतिक दलों ने जमकर फायदा उठाया। ऐसे में अगर यह कहा जाए कि राहुल गांधी ने अपने दम पर अपनी पार्टी के विनाश की पटकथा लिख दी थी, तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। आज भी सोशल मीडिया पर राहुल गांधी के हास्यास्पद तर्क और बेतुके बयान वायरल होते दिख जाते हैं। राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की बर्बादी के बाद भी उनके ‘वफादार’ अभी भी उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष बनाने का सपना देख रहे है। और सपने देखे भी क्यों न कांग्रेस के लिए हर सिक्के का एक ही पहलु है और वो है राहुल गांधी यानी ‘हेड’ भी राहुल गांधी और ‘टेल’ भी राहुल गांधी। सत्य यह है कि परिवारवाद में लिप्त कांग्रेस को राहुल गांधी के अलावा कुछ नहीं दीखता और इसी क्रम में फिर से एक बार राहुल गांधी को कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने की मांग उठने लगी है।

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