मैनपुरी के गणेशपुर गांव में खुदाई से मिले हथियार हिंदुओं की अत्याधुनिकता का प्रमाण देते हैं

हड़प्पा सभ्यता के समय विश्व भर में केवल सनातन धर्म ही सर्वव्यापी था !

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Source- TFIPOST.in

कहते हैं कि इतिहास किंवदंतियां बन जाएंगे और किंवदंतियां मिथक बन जाएंगी। लेकिन इन मिथकों को ही एक बार फिर इतिहास सिद्ध करने के लिए प्रमाणों की आवश्यकता पड़ जाएगी. भारत के प्राचीन ग्रंथों, किस्से कहानियों में कई वीर और वीरांगनाओं का ज़िक्र मिलता है. उनकी वीरता और बहादुरी के किस्से सुनने में मिलते हैं और उनके युद्ध कौशल का जमकर बखान किया जाता है लेकिन क्या कभी सोचा है कि वे वीर किस तरह के अस्त्र – शस्त्र का उपयोग करते थे?

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खेत के नीचे मिले 4,000 साल पुराने तांबे के हथियार 

हाल ही में उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में एक खेत के नीचे 4,000 साल पुराने तांबे के हथियार मिले हैं. जून माह की शुरुआत में मैनपुरी के गणेशपुर गांव में एक किसान जब अपने दो बीघा खेत को समतल कर रहा था, तभी उसे मिट्टी के नीचे तांबे की तलवारें और हार्पून मिले। वह उन सभी को घर ले गया क्योंकि उसे लगा कि ये सोने या चांदी से बनी कीमती वस्तुएं हैं। हालांकि पुलिस को जब इसकी खबर लगी तो  भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) भी हरकत में आया।

बड़ी-बड़ी तलवारें, धारदार और परिष्कृत आकृतियों वाले हथियारों ने विशेषज्ञों को अचंभित और रोमांचित कर दिया. पुरातत्वविद को छानबीन में ताम्बे से बने विभिन्न अस्त्र- शस्त्र जैसे तलवारें, भाले, त्रिशूल, छुरियां और कटारें मिलीं जिन्हे वे “एंटीना तलवारें और हार्पून” कह रहे हैं. इन तलवारों के नीचे एक हुक है. विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में एक खेत के नीचे संयोगवश खोजे गए ये तांबे के हथियार ताम्रपाषाण युग यानी कॉपर ऐज के हैं जो कि बताता है कि ये लगभग 4,000 साल पुराने हैं. कांसा हड़प्पा काल में सबसे अधिक उपयोग में लाया जाता था हालाँकि एक अध्ययन से पता चला है कि उस समय इस प्रकार के हथियार मुख्य रूप से ताम्बे से बने होते थे.

संयोगवश मिले इन 77 हथियारों में कटारों के अलावा बड़ी तलवारें जो कि लगभग 4 फ़ीट लम्बी हैं और स्टारफिश के आकार के शस्त्र भी शामिल हैं. मैनपुरी में मिले ये हथियार सिद्ध करते हैं कि भारत हमेशा से ही योद्धाओं का देश रहा है क्यूंकि विशेषज्ञों का भी मानना है कि ऐसे हथियार किसी आम मनुष्य के पास नहीं हो सकते और न ही ये किसी आम व्यक्ति के लिए बनाये गए लगते हैं. ये सभी हथियार युद्ध में प्रयोग में लाये जाने वाले हैं. साथ ही इनकी संरचना, भार और आकार न केवल उस समय के लोगों के हथियार बनाने की कौशलता को दर्शाता है बल्कि इन्हे चलाने वाले योद्धाओं की कहानी भी कहता है.

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संरक्षण निदेशक और एएसआई के प्रवक्ता के अनुसार

आज तक जमीन के नीचे गड़े धन और सोने के सिक्कों की कहानियाँ सबने सुनी थीं लेकिन यह पहली बार था जब ज़मीन में से हथियार निकलते दिखे। हालाँकि यह पहली बार नहीं था जब मैनपुरी की धरती से ऐसी कोई पुरातन वस्तु मिली हो. यहाँ गेरू रंग के बर्तन भी मिले जो कि 2,000 और 1,500 ईसा पूर्व के बीच की है। संरक्षण निदेशक और एएसआई के प्रवक्ता वसंत स्वर्णकार ने कहा कि ऐसी कई खोजें हुई हैं जो साबित कर सकती हैं कि मैनपुरी में मिली हथियार सामग्री लगभग 3,800-4,000 साल पुरानी थी।

उन्होंने बताया कि सनौली (बागपत), मदारपुर (मुरादाबाद), और सकटपुर (सहारनपुर) साइटों से लिए गए नमूनों पर एक कार्बन डेटिंग परीक्षण भी किया गया था और वे 2,000 ईसा पूर्व (4,000 साल पहले) के साबित हुए हैं. 4500 वर्षों से भी अधिक पुरातन हड़प्पा सभ्यता इतनी पुरानी है कि उस समय विश्व भर में केवल सनातन धर्म ही सर्वव्यापी था. उस समय के मिले ये हथियार यह सिद्ध करते है कि उस समय के हिन्दू हथियार बनाने और चलने की कला में बहुत निपुण थे. ज़ंग लगे ये हथियार बताते हैं की उस समय भी भारत के लड़ाकों के पास उन्नत हथियार हुआ करते थे.

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