आपने ‘राजा और बंदर’ की कहानी तो सुनी ही होगी, उद्धव और राउत बस इसे रीक्रिएट कर रहे हैं

संजय राउत ने बालासाहेब की 'नाक' कटा दी

Uddhav and Raut

SOURCE TFIPOST.COM

आप सबने राजा और बंदर की कहानी तो सुनी ही होगी, जब राजा के आदेश का पालन करते हुए बंदर मक्खी को मारने के चक्कर में राजा की नाक ही तलवार से काट डालता है। आज वही कहानी महाराष्ट्र में दो जोगा-बोगा की जोड़ी फिर से दोहरा रहे हैं, जहां राजा का पात्र उद्धव ठाकरे तो वहीं बंदर का किरदार संजय राउत निभा रहे हैं। पार्टी की दिशा और दशा बदलने का जिम्मा जिस उद्धव ठाकरे पर होना चाहिए था वो उद्धव पर न होकर संजय राउत के हाथ में है।

इस लेख में हम जानेंगे कि कैसे संजय राउत ने शिवसेना के समूल नाश की नींव उसी दिन रख दी थी जिस दिन महाविकास अघाड़ी सरकार का गठन हुआ था। जानेंगे कि कैसे शिवसेना के पतन का सबसे बड़ा कारक अगर कोई है तो वो संजय राउत हैं।

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शिवसेना की धनिया बोने में संजय राउत सबसे आगे हैं

दरअसल, बालासाहेब ठाकरे ने जिस संजय राउत की अंगुली पकड़ उन्हें राजनीति का क, ख, ग सिखाया आज उसी शिवसेना की धनिया बोने में संजय राउत सबसे आगे खड़े हुए दिख रहे हैं। लेखन में राउत की निपुणता को देखते हुए बालासाहेब ठाकरे ने 1992 में संजय राउत को मुखपत्र “सामना” का कार्यकारी संपादक बना दिया। बाल ठाकरे सामना के संपादक हुआ करते थे परंतु सारे संपादकीय लेख यही संजय राउत लिखा करते थे। जो यह बताता है कि कैसे राउत बालासाहेब ठाकरे की पसंद बन चुके थे, बस एक इसी आशीर्वाद के कारण उन्हें सामना में लिखते-लिखते शिवसेना की नीति-निर्माण करने की शक्ति मिल गईं।

अब वर्तमान परिदृश्य को ही देखें तो पता चलता है कि किस बुद्धिहीन व्यक्ति को ठाकरे परिवार ने अपने कंधे पर चढ़कर आग बरसाने के लिए स्वतंत्रता दे दी। महाराष्ट्र की वर्तमान राजनीतिक स्थिति की भी बात की जाए तो यह कोई बागी विधायकों के कारण नहीं, संजय राउत जैसे बड़बोले नेताओं के कर्मों का ही प्रतिफल है। इसी का सबसे बड़ा उदाहरण महाविकास अघाड़ी सरकार का गठन है जिसको परिलक्षित करना इन्हीं संजय राउत की उपज थी। यूं तो राउत हमेशा से ही भाजपा को अपनी प्रतिद्वंद्वी पार्टी मानते थे, जबकि भाजपा के साथ लंबे समय से शिवसेना की युति चली आ रही थी। बावजूद इसके राउत के विषैले बोल कभी शिवसेना के मुखपत्र “सामना” के द्वारा बाहर आते तो कभी बयानों के माध्यम से वो अपनी वेदना निकलते।

वैचारिक दृष्टि से इतर निजी संबंध भी राजनीति में सबसे अहम बिंदु होते हैं पर ऐसे निजी संबंध जो मात्र राजनीति से प्रेरित हों उससे तो यही प्रदर्शित होता है कि उक्त व्यक्ति अपने परिवार अर्थात अपनी पार्टी के प्रति लेश मात्र भी वफादार नहीं है। संजय राउत उसी खेत की मूली हैं जो शिवसेना में रहते हुए उस एनसीपी से गठबंधन कराने के प्रपंच रचते रहे जिसे बालसाहेब ठाकरे गाली देते नहीं थकते थे। वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में राउत ने कुछ ऐसा ही करने का प्रयास तो किया था पर शिवसेना और एनसीपी का गठबंधन हो नहीं पाया था।

अब आते हैं उसी भाजपा पर जिसके लिए राउत के मुख से कभी पुष्पों की वर्षा नहीं हुई जबकि दोनों दशकों पुराने गठबंधन के साथीदार थे। 2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तबसे संजय राउत का बीजेपी पर हमला बढ़ गया। उस समय महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भाजपा को शिवसेना से अलग होकर चुनाव लड़ना पड़ा था। चुनाव के बाद बीजेपी को शिवसेना से अधिक सीटें आयीं, तब शिवसेना को दोबारा गठबंधन में लौटना पड़ा और देवेंद्र फडणवीस युति सरकार के मुख्यमंत्री बने। बेशर्मी की पराकाष्ठा ऐसी कि “सामना” में बीजेपी के खिलाफ आग उगलने वाले लेख फिर भी लिखे जाते रहे।

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वर्ष 2019 के समय पुनः बुद्धि खिसकी

अब वर्ष 2019 के समय पुनः बुद्धि खिसकने पर शिवसेना ने कम सीट प्राप्त करने के बाद भी मुख्यमंत्री बनने की इच्छा जताई और स्वयं 56 सीटें जीतने के बाद 106 सीट जीतने वाली भाजपा को धोखा देते हुए इन्हीं संजय राउत के कर्मों के फलस्वरूप महाविकास अघाड़ी का गठन हुआ। लेकिन वही है न कि झूठ के पैर नहीं हो सकते इसलिए अधिक देर तक चल नहीं सकता,  कुछ ऐसा ही हाल इस अघाड़ी गठबंधन का था जो ढाई साल के भीतर ही गिरने के पड़ाव पर आ पहुंची है।

इसके बाद भी संजय राउत के विषैले बोल कम नहीं हुए। एकनाथ शिंदे के साथ जो विधायक हैं उनके प्रति अपनी कुंठा सार्वजनिक रूप से गालियों और अपशब्दों के माध्यम से निकालकर संजय राउत ने सिद्ध कर दिया कि वो शिवसेना का नाश करने के लिए ही पैदा हुए थे। हाल ही के बयानों में से कुछ बयान इस प्रकार है कि, “जब गुवाहाटी से 40 बागी विधायकों के शव मुंबई आएंगे तब हम सीधे पोस्टमार्टम के लिए मुर्दाघर भेजेंगे।” उन्होंने बागियों को भैंसा बताते हुए कहा कि, “गुवाहाटी में एक मंदिर है जहां भैंसों की बलि दी जाती है। ये 40 भैंसें वहां बलि देने के लिए गए हुए हैं।” यही नहीं,  ‘बाला साहेब ठाकरे के नाम पर नहीं अपने बाप के नाम पर पार्टी बनाओ’, जैसी भद्दी भाषा के इस्तेमाल से लेकर ‘कब तक छिपोगे गुवाहाटी में, आना ही पड़ेगा चौपाटी में’, ‘शिवसैनिक सड़कों पर हैं, बस इशारे का इंतजार है’ की धमकी तक राउत ने अपनी बेशर्मी और नीच सोच का नंगा नाच कर शिवसेना को अवश्य मटियामेट कर दिया।

आज शिवसेना के कार्यकर्ता उद्धव ठाकरे के हर निर्णय को संदेह की नज़र से इसलिए देखते हैं क्योंकि उन्हें यह विदित है कि “बोल उद्धव रहे हैं, पर शब्द राउत के हैं।” ऐसे परिप्रेक्ष्य में अगर पार्टी में अविश्वास का भाव पैदा हो जाए तो समझ आता है कि बंदर तो बंदर यहां राजा भी बेवकूफ है जो खुली आंखों से अपनी बर्बादी को देख रहा है और बंदर को और बढ़ावा भी दे रहा है कि जा मेरे शेर, खेला कर।

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