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फिरोज़ाबाद चूड़ी उद्योग के पीछे जो स्याह अंधेरा है, उसे समझना आवश्यक है

चूड़ी उद्योग को भी रेगुलेट करने की आवश्यकता है!

Animesh Pandey द्वारा Animesh Pandey
6 August 2022
in प्रीमियम
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दम घोंटू वातावरण, काले, संकरे मकान, रहने खाने को पर्याप्त सुविधा भी नहीं, नर्क भी जिसे देख अपनी परिभाषा बदल ले। कहने को आप इसे पूर्वी जर्मनी या 1990 के कश्मीर का एक अंश मान सकते हैं परंतु नहीं, यहां चर्चा हो रही है उत्तर प्रदेश के एक शहर की, जहां के एक उद्योग के बारे में बहुत कम बात की जाती है। हम बात कर रहे हैं फ़िरोज़ाबाद के चूड़ी उद्योग के बारे में।

चूड़ी उद्योग पर कम होती है बात

भारत को पूर्व में तीन बातों के लिए विशेष रूप से जाना जाता था– गांधी, गरीबी और ताजमहल। परंतु भारत की एक और चीज विशेष है जिसके बारे में कम ही चर्चा होती थी और वो है कांच की चूड़ियां। ये चूड़ियां अक्सर विभिन्न रंगों में और विभिन्न धातुओं से तैयार होती हैं, जैसे स्वर्ण, चांदी, लकड़ी, लोहा, प्लेटिनम, यहां तक कि ये चूड़ियां प्लास्टिक से भी निर्मित होती हैं। परंतु जो सबसे अधिक चर्चित मटेरियल है, वो है कांच की चूड़ियां जिसके लिए भारत एक प्रमुख केंद्र है।

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अब चूड़ियों के लिए भारत एक प्रमुख केंद्र है तो निर्माण के लिए कुछ स्थान भी अवश्य होंगे। निस्संदेह ऐसे कुछ स्थान हैं भी– फिरोजाबाद, मुरादाबाद, बनारस इत्यादि। परंतु जो स्थान फ़िरोज़ाबाद ने इस समय ग्रहण किया है उसकी कोई तुलना नहीं की जा सकती है। इसके अनेक कारण हैं, और तो और इसमें गर्व करने योग्य कोई बात तो कतई नहीं है।

फ़िरोज़ाबाद में चूड़ी उद्योग तो है पर न कोई मानक है, न कोई मापदंड। यूं मानिए कि हर घर में आप एक चूड़ी उत्पादन विभाग पा सकते हैं। 2021 में न्यूज 18 द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के अंश अनुसार, “फिरोजाबाद में मंगलवार को एयर क्वालिटी इंडेक्स 489 दर्ज किया गया था, जो देश में सबसे ज्यादा था। हैरान करने वाली बात तो ये है कि प्रदूषण विभाग के अफसरों को भी ये समझ में नहीं आ रहा है कि अचानक ऐसा क्या हो गया। ये हाल तब है जब चूड़ी उद्योग में जलने वाली भट्ठियां दिवाली की छुट्टियों के चलते ठण्डी पड़ी हुई हैं।

दूसरी चौकाने वाली बात ये भी है कि फिरोजाबाद जिले का ज्यादातर हिस्सा ताज ट्रैपेजियम ज़ोन (टीटीजेड) में आता है। इस कारण पहले से ही वहां प्रदूषण के स्तर को कम रखने के प्रयास चलते रहते हैं। मसलन 15 साल से ज्यादा पुरानी गाड़ियों पर रोक है। इसके अलावा तीन टन वजन से कम छोटी कॉमर्शियल गाड़ियों पर भी फिरोजाबाद के काफी बड़े इलाके में रोक है। चूड़ी उद्योग की सभी भट्ठियां गैस संचालित हैं। फिर प्रदूषण का ये स्तर कैसे बढ़ा हुआ आया है”।

इसी रिपोर्ट में आगे यह भी बताया गया, “पर्यावरणविद डॉ. शरद गुप्ता ने आगरा और फिरोजाबाद में प्रदूषण के बढ़े स्तर का एक अलग ही कारण बयां किया। उन्होंने कहा कि फिरोजाबाद में गांव-गांव में शीशे के छोटे-छोटे उद्योग खुल गये हैं। इन तक ग्रीन गैस की सप्लाइ नहीं पहुंच पायी है। ऐसे में भट्ठियों को चलाने के लिए बड़े पैमाने पर इन उद्योगों में जूते की कतरन धड़ल्ले से जलाई जा रही हैं। आगरा में जूते का बड़ा कारोबार है। सिंथेटिक मटीरियल से बने इन कतरनों से बहुत प्रदूषण होता है।”

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बालश्रम है बड़ी परेशानी

परंतु केवल इसीलिए फ़िरोज़ाबाद विवादों के घेरे में नहीं है। फ़िरोज़ाबाद में चूड़ी उद्योग में सबसे अधिक श्रमिक नन्हें बच्चे ही पाए जाते हैं। विश्वास नहीं होता तो सरकारी आंकड़ों पर ही ध्यान दीजिए। एक निजी विश्लेषण के अनुसार, फिरोजाबाद में बाल श्रम के विरुद्ध अनेक अभियान चलाए गए, लेकिन वह केवल कागजों तक सिमटकर रह गए। फिरोजाबाद में अभी भी 1,474 बच्चे ऐसे हैं, जो स्कूल नहीं जा रहे हैं। इन बच्चों को अब स्कूल भेजने के लिए शिक्षा विभाग तैयारियों में जुटा है। एक निजी संस्था द्वारा किए गए सर्वे में शहर के सभी 70 वार्डों में कुल 8,864 बाल श्रमिक काम करते मिले हैं। सरकारी आंकड़ों के हिसाब से यह संख्या वर्ष 2017 में कराए सर्वे से 1,474 अधिक है।

वित्तीय वर्ष 2021-22 में औद्योगिक नगरी फिरोजाबाद में स्कूल ड्रॉप आउट बच्चों को चिह्नित कर सर्वे कराया गया। कानपुर की सोशल डेवलपमेंट एंड मैनेजमेंट सोसायटी (एसडीएमएस) के सर्वे में नगर निगम एरिया के सभी 70 वार्डों में कुल 8,864 बच्चे घरों अथवा अन्य जगहों पर तरह-तरह के काम करते मिले। छह से आठ वर्ष के बच्चों की संख्या 2,216, नौ से 13 वर्ष आयु वर्ग के 5,390 बच्चे हैं। संस्था की सर्वे रिपोर्ट में स्कूल नहीं जाने वाले 14 से 17 वर्षीय 1,258 किशोरों के नाम भी शामिल हैं। ये हाल तब है जब उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार है। सोचिए, जब उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव एवं मायावती की सरकार थी, जिन्हें शासन प्रशासन से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था तब इन भोले-भाले बच्चों का क्या हाल होता होगा?

और पढ़ें- गुमनाम नायक: रासबिहारी बसु भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के ‘गॉड फादर’

आपको स्मरण है, 2009 में एक शो आया था सोनी पर, ‘जीत जाएंगे हम’? नहीं याद होगा, परंतु यह इसी विषय पर आधारित था और यह इस विषय पर प्रकाश भी डालता था कि कैसे चूड़ी उद्योग के नाम पर लोगों से, विशेषकर बच्चों से जबरन काम कराया जाता था, जिससे उनके स्वास्थ्य, उनकी मानसिक अवस्था इत्यादि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। पता है बच्चों का उपयोग क्यों किया जाता है? क्योंकि चूड़ियों के निर्माण में जो सफाई और चतुराई चाहिए, उसके लिए कठोर हाथ सदैव उपयोगी नहीं होते और ऐसे में बालश्रम बहुत काम आता है। दुर्भाग्यवश यही फ़िरोज़ाबाद के चूड़ी उद्योग का कड़वा सत्य है।

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