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प्रिय मुस्लिम भाईजान, गरबा हिंदुओं का पर्व है, इसमें काहे घुसते हैं?

गरबा में घुसने के पीछे होती है 'लव जिहाद' की साज़िश?

Prashant Srivastava द्वारा Prashant Srivastava
4 October 2022
in चर्चित, संस्कृति
गरबा

Source: TFI

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भारतवर्ष अपनी समृद्ध संस्कृति और पर्व के लिए जाना जाता है, जितने त्योहार भारत में मनाए जाते हैं उतना विश्व के किसी भी देश में शायद ही मनाया जाता होगा। लगभग प्रत्येक माह में भारत के लोग कोई न कोई त्योहार मनाते ही हैं। इसी क्रम में देशभर में नवरात्रि के पर्व को धूमधाम से मनाया जा रहा है, पूरे नौ दिन चलने वाले इस पर्व में लोग आस्था से भरकर देवी की पूजा अर्चना करते हैं।

शारदीय नवरात्रि

पंचांग के अनुसार वैसे तो पूरे साल में कुल चार प्रकार की नवरात्रि होती है, ये दो गुप्त नवरात्रि, एक चैत्र नवरात्रि और एक शारदीय नवरात्रि कहलाती हैं। चैत्र और आश्विन माह में पड़ने वाली नवरात्रि प्रमुख होती है। शारदीय नवरात्रि की शुरुआत आश्विन माह के प्रतिपदा तिथि से शुरू होकर दशमी तिथि तक होती है। इस वर्ष यह नवरात्रि की तिथि सोमवार 26 सितंबर 2022 से शारदीय नवरात्रि शुरू होकर 05 अक्टूबर 2022 को संपन्न होगी। देश के अलग-अलग हिस्सों में नवरात्रि अलग-अलग तरीके से मनायी जाती है। इस दौरान मां भगवती के नौ स्वरूपों की पूजा होती है, व्रत-उपवास रखे जाते हैं, गरबा का आयोजन किया जाता है।

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इसी क्रम में भक्त अपनी भक्ति को व्यक्त करने के लिए गरबा करते हैं। हिंदू धर्म में आत्मा से परमात्मा के मिलन के लिए भक्ति को सबसे सरल माध्यम माना गया है। वस्तुतः इस प्रकार से ईश्वर से जुड़ने के लिए हिंदू धर्म के अनुयायी अपना सब कुछ मां भगवती के चरणों में अर्पित करके उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं।

मान्यताओं के अनुसार, माता दुर्गा ने दुष्ट महिषासुर के साथ युद्ध कर उसका वध किया था, यह युद्ध पूरे नौ दिनों तक चला था और दसवें दिन मां दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था। मां दुर्गा ने महिषासुर का वध कर असुरी शक्तियों का विनाश किया। कहा जाता है कि जब मां दुर्गा ने महिषासुर का वध किया तब वह समय आश्विन माह का था, इसलिए हर साल आश्विन माह की प्रतिपदा से लेकर पूरे नौ दिनों कर नवरात्रि का त्योहार मनाया जाता है जिसे शारदीय नवरात्रि कहते हैं। इस शारदीय नवरात्र में गरबा का विशेष महत्व होता है, जो लोग इसे केवल एक नृत्य के रूप में देखते हैं वो घोर अज्ञानता में जी रहे हैं। यह तो पूरी विधि होती है माता को प्रसन्न करने की किंतु हाल ही में कुछ शांतिदूतों ने ऐसा घिनौना कृत्य करने का प्रयास किया है जिससे इस नृत्य की गरिमा को ठेस पहुंची है। गुजरात में गरबा का बड़ा ही विशेष महत्व है, और इस बार भी यहां अपनी ही शैली में नवरात्र के पावन अवसर पर गरबा का जगह-जगह आयोजन हुआ है।

अहमदाबाद में गरबा के दौरान क्या हुआ?

दूसरी तरफ एक ऐसी घटना सामने आयी जिसने शर्मसार करके रख दिया। गुजरात के अहमदाबाद में एक गरबा कार्यक्रम के दौरान चार मुस्लिम युवक घुस आए, इसका पता चलते ही बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने उन मुस्लिम युवकों को पहले समझाया किंतु जब वे नहीं माने तो उन्हें पीटकर आयोजन से बाहर कर दिया। अब तमाम सेक्युलर लोग, कांग्रेसी, कथित मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने लड़कों को भगाए जाने की इस घटना का विरोध करना शुरू कर दिया है। भारत में प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म को विधिवत मानने की पूरी स्वतंत्रता है, किंतु ऐसा क्यों होता है कि जब कोई हिंदू अपने धर्म का पालन पूरी प्रतिष्ठा के साथ करता है तो सो कॉल्ड सेक्युलर लोगों के पेट में दर्द होने लगता है। अब हाल के मामले को ही ले लीजिए, गुजरात के अहमदाबाद में हुई इस घटना के विरोध में जो लोग उतर रहे हैं उन्हें यह बात समझ लेनी चाहिए की गरबा कोई आम नृत्य नहीं हैं जिसका लुत्फ उठाने के लिए कोई भी पहुंच जाए। उस पूरे प्रांगण में माताएं, बहनें मां भगवती की आराधना कर रही थीं।

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ऐसे में किसी अन्य धर्म कि लोगों का उस कार्यक्रम में आना उन्हें असहज कर रहा था। जिस कारण उन्हें वहां से जाने के लिए भी कहा गया किंतु ये विशेष धर्म के शांतिदूत अपने पर अड़े रहे। अब जब गहमा गहमी हो गयी तो सेक्युलर बुद्धिजीवियों ने सारा दोष हिंदुओं के मत्थे ही मढ़ दिया। खैर यह कोई नई बात नहीं है योजनाबद्ध रूप से ऐसा होता आया है और सो कॉल्ड सेक्युलर चीखते रहे हैं।

ध्यान देने वाली बात है कि मध्य प्रदेश में पहली बार राज्य सरकार ने नवरात्रि गरबा के आयोजकों को निर्देश दिया है कि वे पहचान पत्रों की जांच के बाद ही प्रवेश की अनुमति दें। कुछ जगहों पर गरबा पंडालों के बाहर ‘गैर-हिंदुओं को प्रवेश करने की अनुमति नहीं है’ के पोस्टर भी लगाए गए हैं।  पिछले दो दिनों में 8 मुस्लिम युवकों को छुपकर गरबा पंडालों में घुसने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। मुस्लिम युवकों पर हिंदू लड़कियों की तस्वीरें क्लिक करने और अश्लील कमेंट करने का आरोप भी है।

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पहचान पत्रों की जांच

राज्य सरकार के निर्देशों का पालन करते हुए प्रतिभागियों के पहचान पत्रों की जांच की जा रही है और उज्जैन में प्रवेश करने वालों केमाथे पर तिलक लगाया जाता है।  गरबा स्थलों के बाहर पोस्टर लगाए गए हैं जिसमें कहा गया है कि पंडाल में गैर-हिंदुओं की अनुमतिनहीं है, और स्वयंसेवक प्रतिभागियों के ड्राइविंग लाइसेंस, आधार कार्ड आदि जैसे आईडी दस्तावेजों की जांच कर रहे हैं।

बीते 8 सितंबर को संस्कृति राज्य मंत्री उषा ठाकुर ने स्पष्ट करते हुए कहा था कि गरबा पंडाल लव जिहाद का माध्यम बन गया है। इस प्रकार, गरबा पंडालों में प्रवेश की अनुमति आईडी जांच के बाद ही दी जानी चाहिए। आगे अपने वक्तव्य में उन्होंने यह भी कहा कि गरबा नृत्य मां भगवती और गैर-हिंदुओं की पूजा का एक रूप है और विशेष रूप से हिंदू महिलाओं से छेड़छाड़ करने के दुर्भावनापूर्ण इरादे वाले लोगों को गरबा पंडालों में प्रवेश करने की अनुमति किसी भी सूरत में नहीं दी जाएगी।

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किंतु इन असामाजिक तत्वों का मन इतना बढ़ां हुआ है कि उन्हें इस बात से अंतर नहीं पड़ता कि यह हिंदुओं की आस्था का विषय है। हां उन्हें तब बुरा अवश्य लग जाता है जब उनकी आस्था पर प्रश्न भी उठा दे। यह दोहरा मापदंड क्यों? इस पूरे घटना पर नई-नई सॉफ़्ट हिंदुत्व का झंडा उठाने वाली कांग्रेस एवं आम आदमी पार्टी भी चुप्पी साधे हुए हैं।  इसके उलट स्वयं को बुद्धिजीवी समझने वाले भी हिंदुओं को ही दोष दे रहे हैं कि बेचारे बच्चों के साथ गलत हुआ, सोचिए कि इनकी मति इस प्रकार से मारी गई है कि ये क़ानून को भी भूल गए हैं। जहां पर स्पष्ट तौर से यह कहा गया है कि किसी महिला की चुपके से तस्वीर लेना उसके साथ अभद्रता करना क़ानूनी अपराध है।

यह बात ध्यान देने योग्य है कि बार-बार ये एक कौम के लोग ही क्यों हिंदुओं के पवित्र स्थल, उनके धार्मिक अनुष्ठान स्थल पर पहुंच जाते हैं? बार-बार स्पष्ट रूप से माना करने के बाद भी वे बाज क्यों नहीं आते हैं। इसके असल दोषी वे लोग हैं जो अहमदाबाद में हुई इस घटना के बाद जो लोग गंगा जमुनी तहजीब जैसे चोचलेबाजी की दुहाई देते हैं, वे वही लोग हैं जो अपनी बातों से मनचलों के मनोबल को बढ़ाते हैं।

इस बात को समझना होगा कि यदि आपके मन में हिंदू देवी देवताओं के प्रति आस्था है या आप कोई हिंदू त्योहार मनाना चाहते हैं तो मनाइए, प्रसन्नता के साथ मनाइए, आप एक स्वतंत्र देश में रहते हैं लेकिन इस बात को भली भांति समझ लेना होगा कि गरबा न तो सेक्युलर है और न ही मनचलों और कुत्सित सोच रखने वाले लंपटों के लिए ऐसा पवित्र नृत्य उपलब्ध है।

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