कथा उन भीमबेटका गुफाओं की जिनमें अज्ञातवास दौरान रुके थे भीम

सनातन धर्म से जुड़े कुछ ऐसे धरोहर हैं जिन्हें देखकर आश्चर्य होता है। इस लेख में हम जानेंगे ऐसे ही एक धरोहर के बारे में जिसका नाम है भीमबेटका।​

Bhimbetka rock shelters

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Bhimbetka rock shelters: सनातन धर्म का इतिहास इतना विराट है कि उससे जुड़ी कहानियों और घटनाओं से कुछ न कुछ सीखने को ही मिलता है। सनातन धर्म से जुड़े कुछ ऐसे धरोहर हैं जिन्हें देखकर आश्चर्य होता है, तो कुछ ऐसे धरोहर हैं जिनसे जुड़ी अपनी एक कथा है। इस लेख में हम बात करेंगे ऐसे ही एक धरोहर के बारे में जिसका नाम है भीमबेटका। जिसका संबंध महाभारत काल के वीर पांडवों में से एक महाबली भीम से संबंध बताया जाता है। चलिए इस बारे में विस्तार से जानते हैं।

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Bhimbetka rock shelters: हजारों साल पुरानी गुफाएं

भीमबेटका मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में स्थित है, जिसे हम भीमबेटका रॉक शेल्टर (Bhimbetka rock shelters) के नाम से भी जानते हैं। भीमबेटका अपनी हजारों साल पुरानी गुफाओं की वजह से जाना जाता है। यह असल में एक गुफा नहीं है बल्कि इसके अंतर्गत कई गुफाएं हैं जो कि एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं। ये गुफाएं (Bhimbetka rock shelters) भोपाल से 46 किलोमीटर की दूरी पर दक्षिण में पाई जाती हैं। गुफाएं चारों तरफ से विंध्य पर्वतमालाओं से घिरी हुईं हैं, जिनका संबंध ‘नव पाषाण काल‘ से माना गया है। भीमबेटका गुफाएं मध्य भारत के पठार के दक्षिणी किनारे पर स्थित विंध्याचल की पहाड़ियों के निचले छोर पर हैं। इसके दक्षिण में सतपुड़ा की पहाड़ियां शुरू हो जाती हैं।

Bhimbetka rock shelters को लेकर कहा जाता है कि महाभारत काल के पांडवों में से एक भीम के नाम पर भीमबेटका का नाम रखा गया। कुछ स्थानीय लोगों का मानना है कि भीम ने अपने भाइयों के साथ निर्वासित होने के बाद यहां विश्राम किया था। लोगों का यह भी कहना है कि वह इन गुफाओं के बाहर और पहाड़ियों के ऊपरी क्षेत्र में लोगों के साथ बैठकर लोगों से बातचीत किया करते थे। कहते हैं कि जब पांडवों को वनवास के साथ ही अज्ञातवास मिला तो वे अपनी पहचान छिपाकर रहते थे जिससे कौरवों को उनके बारे में पता न चल सकें और इसके लिए वे इन गुफाओं में रहा करते थे।

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शैलचित्र और शैलाश्रय

भीमबेटका (Bhimbetka rock shelters) आदिमानव द्वारा निर्माण किए गए शैलचित्रों और शैलाश्रयों के लिए प्रसिद्ध है। इस गुफा में बनाए गए शैलचित्र भारतीय महाद्वीप में मानव जीवन के सबसे प्राचीनतम चिह्न हैं। साथ ही यहां पर अन्य पुरातात्विक अवशेष भी मिले हैं जिनमें प्राचीन किले की दीवार, पाषाण काल में निर्मित भवन, शुंग-गुप्त कालीन अभिलेख, लघुस्तूप, शंख के अभिलेख और परमार कालीन मंदिर के अवशेष आदि शामिल हैं।

Bhimbetka rock shelters paintings

यहां की लगभग 3000 वर्ष पुरानी प्राचीन किले की दीवार, पाषाण निर्मित भवन, शंख गुप्त कालीन अभिलेख, परमार कालीन मंदिर, जो यह बताती हैं कि भीमबेटका कभी आदिमानवों के रिहायशी जगह हुआ करती थी। साथ ही भीमबेटका में प्रवेश करते ही कई ऐसे पाषाण युग के अवशेषों के बारे में गुफा की दीवारों पर लिखे गये लेखों से जानकारी मिलती है।

भीमबेटका में मिले शैलचित्रों की बात करें तो इसमें सामूहिक नृत्य, शिकार, पशु पक्षियों से प्रेम, प्राचीन काल के युद्ध, आखेट, आदिमानव के रहन-सहन, हाथी, घोड़े की सवारी के शैलचित्र, जंगली सूअर शैलचित्र, बाघ, शेर शैलचित्र, कुत्ते घड़ियाल शैलचित्र, प्राचीन आभूषण शैलचित्र, शहद जमा करने के स्थान मिले हैं। इन सभी चित्रों को लाल, गेरुआ, सफ़ेद, पीला और हरे रंग से चिह्नित किया गया है। भीमबेटका की गुफाओं की दीवारें प्राचीन सभ्यता को दर्शाती हैं जो उस समय के कलाकारों के लिए लोकप्रिय हुआ करती थीं।

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दुनिया की सबसे प्राचीन गुफा

भीमबेटका दुनिया की सबसे प्राचीन गुफा मानी जाती हैं, यहां पत्थर की दीवार और फर्श बने होने के सबूत भी मिले हैं। भीमबेटका में एक बड़ी सी चट्टान है जिसे चिड़िया रॉक चट्टान के नाम से जाना जाता है। इस चट्टान पर हिरन, बाइसन, हाथी और बारहा सिंघा को चिह्नित किया गया है। इसके बाद एक दूसरी चट्टान हैं, जिस पर मोर, साप, सूरज और हिरण की एक और तस्वीर को चिह्नित किया गया है। शिकार करने के दौरान शिकारियों को तीर, धनुष, ढोल, रस्सी के साथ तो वहीं एक सूअर का भी चित्र मौजूद है। इस तरह की और भी कई चट्टानें और गुफाएं यहां स्थित हैं, जिन्‍हें देखकर 3000 वर्ष पुराने रहस्यों का प्रमाण मिलता हैं।

भीमबेटका गुफाओं (Bhimbetka rock shelters) की पहचान देश के सबसे बड़े प्रागैतिहासिक कला के खजाने के रूप में किया जाता है। भारत के प्रसिद्ध पुरातत्‍व विशेषज्ञ डॉ. वीएस वाकांकर ने इन गुफाओं की खोज की थी। भीमबेटका नाम भीम और वाटिका ये दो शब्दों से मिल कर बना है। यह पूरी जगह पत्थरों और गुफ़ाओं के साथ–साथ सागवन और सखुआ पेड़ों से घिरी हुई हैं। इन गुफाओं की विशेषता यह है कि यहां कि चट्टानों पर हजारों साल पहले बनी चित्रकारी आज भी पाई जाती है। आज भी यहां लगभग 500 गुफाएं मौजूद हैं। साथ ही इस क्षेत्र को भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण, भोपाल मंडल ने अगस्त 1990 में राष्ट्रीय महत्त्व का स्थल घोषित किया था। इसके बाद जुलाई 2003 में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया था।

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भीमबेटका मध्य भारत के पुराने स्थलों में से एक है, यह स्थान लिखित इतिहास के समय से भी पहले का है। मान्यता है कि यह पुरापाषाण और मध्यपाषाण काल के समय से है। पुरापाषाण वह समय था जब मानव ने पत्थरों से औजार बनाना शुरू किए थे। मध्यपाषाण काल में इंसान ने आग की खोज की थी और धीरे–धीरे खेती भी करने लगा था और यहीं से आधुनिक मानव का भी विकास हुआ था। इन बातों से हम यह तो अंदाज़ा लगा ही सकते हैं कि भीमबेटका की गुफाएं हमारे इतिहास की बेहद पुरानी धरोहर हैं।

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जीवनशैली और सांसारिक गतिविधियां

भीमबेटका गुफाओं (Bhimbetka rock shelters) में बनी चित्रकारियां यहां रहने वाले पाषाणकालीन मनुष्यों के जीवन को दर्शाती है। यहां के पत्थर और गुफाएं सांस्कृतिक विकास, कृषि, शिकारी और शुरुआती जीवन का प्रमाण देते हैं। यहां दस किलोमीटर में सात पहाड़ियां और 750 से अधिक रॉक शेल्टर है। जिनमें से कुछ तो 10,000 साल पहले से ही बसे हुए हैं।

इन गुफाओं में बहुत से चित्र लाल और सफ़ेद रंग के हैं जिनमें दैनिक जीवन की घटनाओं से ली गई विषय वस्‍तुएं चित्रित हैं, जो हजारों साल पहले के जीवन को दिखाती हैं। असल में गुफाओं में बने चित्र ही यहां के प्रमुख आकर्षण हैं। खोजकर्ताओं द्वारा यह भी बताया गया कि भीमबेटका की गुफाओं के चित्र ऑस्ट्रेलिया के सवाना क्षेत्र और फ्रांस के आदिवासी शैलचित्रों से मिलते हैं जो कालीहारी मरुस्थल के बौनों द्वारा बनाया गया था। इन गुफाओं का इस्तेमाल अलग–अलग समय में आदिमानवों ने अपने घर के रूप में किया था। इसलिए यहां उकेरे गए चित्र उनकी जीवनशैली और सांसारिक गतिविधियों को दर्शाते हैं।

भीमबेटका हमारे लिए न केवल पुरातात्विक रूप से अहमियत रखता है बल्कि महाभारत काल से जुड़ी इसकी मान्यताएं इसे धार्मिक रूप से भी अधिक महत्वपूर्ण बना देती हैं। यह ASI की देखरेख में हैं, अहम बात यह है कि यहां के पर्यटन में विस्तार हो रहा है लेकिन दुखद यह है कि इन पर्यटन स्थलों को अभी तक उस स्तर पर प्रचारित और प्रसारित किया ही नहीं गया जिससे यह वैश्विक स्तर पर प्रसिद्ध हो।

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वैश्विक मान्यता मिलना अलग बात है किन्तु आवश्यकता यह है कि इन धरोहरों के बारे में प्रचार-प्रसार अधिक हो जिससे  पर्यटन तो विस्तार मिले, साथ ही जो गोरे भारत की सभ्यता को सबसे असभ्य मानते हैं, उन्हें भी पता चले कि जब वे खाने को संघर्ष कर रहे थे तो भारतीय महलों में राज कर रहे थे।

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