जंजीरा दुर्ग का अद्भुत इतिहास

यह दुर्ग नहीं, रणनीति का विशिष्ट रूप था....

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Janjira Fort History in Hindi: हम भारतीयों की एक अजब समस्या है। हम विदेश में रॉक ऑफ जिब्राल्टर देखने जा सकते हैं, परंतु अपने देश के अद्भुत दुर्ग को देखने में नाक भौं सिकोड़ते हैं। आगरा के दुर्ग पर वाह वाह करेंगे, परंतु महरानगढ़ का दुर्ग जब तक किसी हॉलीवुड की फिल्म में न आ जाए, उसकी ओर देखेंगे भी नहीं। ऐसे ही एक विशिष्ट दुर्ग है, जो रणनीति और नौसैनिक परिप्रेक्ष्य से एक अद्भुत कलाकृति है, परंतु जिसके इतिहास से आज भी लोग अपरिचित है।

इस लेख में पढिये जंजीरा दुर्ग (Janjira Fort History in Hindi) और उसकी विशिष्टता के बारे में, और कैसे इस दुर्ग को पाने के लिए भीषण से भीषण युद्ध लड़े गए थे।

Janjira Fort History in Hindi: ये कोई आम दुर्ग नहीं

लोग कहते हैं कि अभेद्य दुर्ग जैसा कुछ नहीं होता। परंतु शायद मुंबई के द्वीप नगर से कुछ ही दूरी पर स्थित मुरुद जंजीरा दुर्ग को देखकर उन्हे पुनः इस पर विचार करना पड़े। यह भारत के पश्चिमी तट का एक मात्र किला हैं, जो की कभी भी जीता नही जा सका था। यह किला 350 वर्ष पुराना (Janjira Fort History in Hindi) है। स्‍थानीय लोग इसे अजेय किला कहते हैं, जिसका शाब्दिक अर्थ अजेय होता है।

वैसे जंजीरा की उत्पत्ति अरबी भाषा से हुई है, जिसमें जंजीरा का अर्थ बंदरगाह यानि पोर्ट है। इस बंदरगाह पर पहले एक मेढेकोट था। उस समय राजपुरी में मुख्यतः कोली समुदाय की बस्ती थी, जो पेशे से मछुआरे थे।

इन्हे लुटेरों से विशेष दिक्कत होती थी। तब इन परेशानी पर प्रतिबंध करने के लिए इस बंदरगाह पर मेढेकोट बनाया गया। मेढेकोट मतलब लकडी के बड़े ‘ओंडके'(बुंदा)एक के पास एक गाडकर तयार की हुई तटबंदी।

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इस तटबंदी में कोली लोग सुरक्षित रहते थे। उस समय उनका प्रमुख थे राजा रामराव पाटिल। इस मेढेकोट बनाने के लिए उस समय निजामी ठाणेदार की सहमति लेनी पड़ी थी। यूं कहिए तो इस दुर्ग द्वीप की नींव मछुआरों ने रखी थी।

जंजीरा  का यह किला समुद्र तल से 90 फीट ऊंचा है। इसकी नींव 20 फीट गहरी है। यह किला सिद्दीकी जौहर द्वारा बनवाया गया था। इस किले का निर्माण 22 वर्षों में हुआ था। यह किला 22 एकड़ में फैला हुआ है। इसमें 22 सुरक्षा चौकियां है। ये दुर्ग नहीं, अपने आप में इतिहास का वह भाग है, जिसका सम्पूर्ण अन्वेषण अभी बाकी है।

बड़े से बड़े आक्रांता इस दुर्ग को जीतने में रहे असफल

राजा राम रावपाटिल कई विधाओं में निपुण थे, परंतु उनकी एक कमज़ोरी थी : मदिरा। इसी का लाभ उठाते हुए पिरमखान नामक आक्रांता [जो अहमदनगर सल्तनत में उच्चाधिकारी थे] ने मेढेकोट देखने की इच्छा व्यक्त की। पिरमखान मेढेकोट गए। रात् को सब कोली दारू पिकर झूम रहे थे तभी पिरमखान ने बाकी की जगह के अपने सैनिक बुलाकर मेढेकोट के सब लोगों की कत्तल करके मेढेकोट अपने हाथों लिया।

इसके बाद पिरमखान की जगह बुर्‍हानखान की नियुक्ती हुई । उसने वहीं पर भक्कम दुर्ग बनाने की अनुमति निजाम से ली और अभी जो दुर्ग है वह बुर्‍हाणखान ने ही बांधा हुआ है। इस दुर्ग को इथियोपिया से आए सिद्दियों ने अपने नियंत्रण में लिया था, और इसे एक अभेद्य दुर्ग में विकसित किया।

दुर्ग के हर छोर पर तोप, दुर्ग के निकट के जलक्षेत्र में ऐसे ऐसे जीव जंतुओं की उपस्थिति, जो किसी भी आक्रमणकारी को भगाने के लिए पर्याप्त था, ये सब वहाँ पर उपस्थित था। 3 शताब्दियों तक अजिंक्य यानि अजेय इस दुर्ग की विशिष्टता ऐसी थी, कि कोई यूरोपियन इसे चाहकर भी इसपर स्वामित्व नही प्राप्त कर सके।

जंजीरा किले पर मुख्यता एक ही द्वार है जो सबके सामने आपको देखने को मिलेगा इसी प्रमुख और अकेले दरवाजे से आप किले के अंदर प्रवेश कर सकते है लेकिन जंजीरा किले पर एक गुप्त द्वार भी है, जहां से एक सुरंग समुद्र के ६० फीट नीचे से होकर राजापुरी गाँव तक जाती है।

जब इस किले का निर्माण कराया गया था। उस वक्त भविष्य की सोचते हुए कि भविष्य में कभी किले पर हमला करके दुश्मन किले पर कब्जा करता है तो किले का राजा अपने परिवार के साथ इस चोर रास्ते से बचकर निकल सकता है और अपनी जान बचा सकता है। हालाकि 1975 के बाद इस रास्ते को भारत सरकार द्वारा बंद कर दिया गया। लेकिन अभी भी आप यह दरवाजा देख सकते है।

1947 तक ये दुर्ग था “अभेद्य”

यह दुर्ग 1617 से 1947 तक लगभग अजेय रहा। बाहर से तो छोड़िए, अंदर से भी इसे जीतने में अच्छे अच्छों के पसीने छूट गए। इस दुर्ग पर विजय पाना कितना कठिन था, इसका अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि छत्रपति शिवाजी महाराज को भी इस दुर्ग को जीतने में पसीने छूट गए।

जब छत्रपति संभाजी महाराज को यह बात ज्ञात हुई, तो उन्होंने दुर्ग  हस्तगत करने के लिए इसके निकट पाच छ: किलोमीटर अंतर पर पद्मदुर्ग नाम का मजबूत किला बनाया था। यहाँ से उन्होंने आक्रमण भी किया, और वे दुर्ग को जीतने ही वाले थे, कि मराठा राजधानी पर मुगलों ने आक्रमण कर दिया और उन्हे विवश होकर पीछे हटना पड़ा।

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इस दुर्ग पर आखिरकार मराठाओं ने सफलता प्राप्त की, जब सिद्दियों ने मराठा साम्राज्य पर आक्रमण किया। वर्ष था 1736, और तब मराठा शासन पेशवा बाजीराव के हाथ में था।

नाजी सुर्वे और चिमाजीराव अप्पा के नेतृत्व में मराठाओं ने न केवल सिद्दियों को परास्त किया, अपितु जंजीरा दुर्ग में भी प्रवेश किया। परंतु परिस्थितियों ऐसी हुई कि मराठा विजयी होकर भी जंजीरा दुर्ग को प्राप्त नहीं कर पाए, क्योंकि सिद्दियों से शांति वार्ता में जंजीरा, गोवलकोट और अंजनवेल के दुर्ग सौंपे गए। कुछ ऐसा ही 1965 में भारतीय सेना के साथ हाजी पीर क्षेत्र में भी हुआ, परंतु उस बारे में फिर कभी।

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